पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 28 / 50
उत्पत्ति 28
1तब इसहाक ने याकूब को बुलाकर आशीर्वाद दिया, और आज्ञा दी, “तू किसी कनानी लड़की के साथ विवाह न करना।
2उठ, और पद्दन-अराम में अपने नाना बतूएल के घर जाकर, अपने मामा लाबान की पुत्रियों में से किसी एक को अपनी पत्नी चुन ले।
3सर्वशक्तिमान परमेश्वर तुझे आशीष दे और तुझे इतना फलवन्त करे और बढ़ाए कि तू अनेक जातियों का समूह बन जाए।
4वह तुझे इब्राहीम की-सी आशीष प्रदान करे, हां, तुझे और तेरे साथ तेरे वंशजों को भी, कि तू अपने प्रवास के उस देश का अधिकारी बन जाए जिसे परमेश्वर ने इब्राहीम को दिया था।”
5तब इसहाक ने याकूब को विदा किया और वह पद्दन-अराम में लाबान के पास चला गया जो अरामी बतूएल का पुत्र था और याकूब और एसाव की माता रिबका का भाई था।
6फिर एसाव ने देखा कि इसहाक ने याकूब को आशीर्वाद देकर पद्दन-अराम को भेजा है कि वह वहां जाकर अपने लिये पत्नी चुने और उसे आशीर्वाद देते समय यह आज्ञा भी दी है, “तू किसी कनानी लड़की से विवाह न करना,”
7और यह कि याकूब अपने माता-पिता की आज्ञा मानकर पद्दन-अराम को चला गया है।
8अतः एसाव ने देखा कि कनानी लड़कियां मेरे पिता को बुरी लगती हैं;
9तो वह इब्राहीम के पुत्र इश्माएल के पास गया और इश्माएल की पुत्री महलत को जो नबायोत की बहन थी अपनी अन्य पत्नियों के होते हुए भी ब्याह लाया।
10तब याकूब बेर्शेबा से हारान की ओर चला।
11उसने किसी एक स्थान पर पहुंचकर वहां रात बिताई, क्योंकि सूर्य अस्त हो गया था, अतः उसने उस स्थान के पत्थरों में से एक पत्थर लेकर अपने सिर के नीचे रखा, और उसी स्थान पर सो गया।
12तब उसने स्वप्न में देखा कि एक सीढ़ी पृथ्वी पर खड़ी है जिसका दूसरा सिरा स्वर्ग तक पहुंचा हुआ है; और देखो, परमेश्वर के दूत उस पर से चढ़ और उतर रहे है।
13और देखो, यहोवा उसके ऊपर खड़ा है और कह रहा है, “मैं तेरे दादा इब्राहीम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर यहोवा हू। जिस भूमि पर तू लेटा है उसे मैं तुझे और तेरे वंश को दूंगा।
14तेरा वंश धूलि-कण के सदृश असंख्य होगा, और उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में फैल जाएगा, तथा तेरे और तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के समस्त कुटुम्ब आशीष पाएंगे।
15और सुन, मैं तेरे साथ हूं, और जहां कहीं तू जाएगा, मैं तेरी रक्षा करूंगा, और तुझे इस देश में लौटा ले आऊंगा, क्योंकि जो प्रतिज्ञा मैंने तुझ से की है, जब तक उसे पूरी न कर लूं, तब तक तुझे नहीं छोडूंगा।”
16तब याकूब नींद से जाग उठा और कहने लगा, “निश्चय इस स्थान में यहोवा है, और मैं इस बात को न जानता था।”
17वह डर गया और बोला, “यह स्थान कितना भयानक है। यह परमेश्वर के घर के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता, वरन् यह स्वर्ग का द्वार ही है।”
18सुबह याकूब तड़के उठा, और उस पत्थर को जिसे उसने अपने सिरहाने रखा था, लेकर स्तम्भ के समान खड़ा किया तथा उसके ऊपरी सिरे पर तेल डाला।
19उस स्थान का नाम उसने बेत-एल रखा। पहले तो उस शहर का नाम लूज था।
20तब याकूब ने यह मन्नत मानी, “यदि परमेश्वर मेरे साथ रहे, और जो यात्रा मैं कर रहा हूं, उसमें मेरी रक्षा करे और खाने को रोटी और पहनने को कपड़ा देता रहे,
21और मैं सुरक्षित अपने पिता के घर लौट आऊं, तब यहोवा मेरा परमेश्वर ठहरेगा।
22और वह पत्थर जिसे मैंने स्तम्भ के समान खड़ा किया है वह परमेश्वर का धाम ठहरेगा, और जो कुछ तू मुझे दे उसका दशमांश मैं अवश्य ही तुझे दिया करूंगा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)