पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 37 / 50
उत्पत्ति 37
1याकूब तो कनान देश में रहता था जहां उसका पिता परदेशी होकर रहा था।
2याकूब की सन्तान का वर्णन यह हैः यूसुफ जब सत्तरह वर्ष का था और जब वह नवयुवक ही था तो अपने भाइयों, अर्थात् अपने पिता की पत्नियों बिल्हा और जिल्पा के पुत्रों के साथ रह कर भेड़-बकरियां चराता था। और यूसुफ उनकी बुराइयों का समाचार अपने पिता के पास पहुंचाया करता था।
3इस्राएल अपने सब पुत्रों से अधिक यूसुफ से प्रेम करता था क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र थाः और उसने उसके लिए एक रंगबिरंगा अंगरखा बनवाया।
4जब उसके भाइयों ने देखा कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रेम करता है तो वे उससे बैर रखने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे।
5फिर यूसुफ ने एक स्वप्न देखा और जब उसने अपने भाइयों से उसका वर्णन किया तो वे उससे और भी अधिक बैर रखने लगे।
6उसने उनसे कहा, “मेरा स्वप्न सुनो जिसे मैंने देखा हैः
7हम लोग खेत में पूले बांध रहे थे और देखो, मेरा पूला उठकर सीधा खड़ा हो गया। तब तुम्हारे पूले मेरे पूले के चारों ओर खड़े हुए और उन्होंने उसे दण्डवत् किया।”
8तब उसके भाइयों ने उससे कहा, “क्या तू सचमुच हम पर राज्य करने वाला है? क्या तू निश्चय हम पर शासन करने वाला है?” इसलिए वे उसके स्वप्नों और उसकी बातों के कारण उससे और भी अधिक बैर करने लगे।
9फिर उसने एक और स्वप्न देखा और अपने भाइयों से उसका भी वर्णन कियाः “मैंने एक और स्वप्न देखा है। देखो, सूर्य और चन्द्रमा, और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत् कर रहे है।”
10उसने इस स्वप्न का वर्णन अपने पिता और अपने भाइयों से किया और उसके पिता ने झिड़क कर उससे कहा, “तूने यह कैसा स्वप्न देखा है? क्या मैं और तेरी माता और तेरे भाई सचमुच तेरे आगे भूमि पर झुककर तुझे दण्डवत् करेंगे?”
11उसके भाई तो उससे डाह करते थे, पर उसके पिता ने इन बातों को मन में रखा।
12और उसके भाई अपने पिता की भेड़-बकरियों को चराने शकेम को गए।
13तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, “क्या तेरे भाई शकेम में भेड़-बकरियां नहीं चरा रहे हैं? आ, मैं तुझे उनके पास भेजता हू।” और उसने उससे कहा, “मैं जाऊंगा।”
14तब उसने उससे कहा, “जा, अपने भाइयों और भेड़-बकरियों का कुशल-क्षेम देख आ और मुझे समाचार दे।” अतः उसने उसको हेब्रोन की तराई से विदा कर दिया, और वह शकेम पहुंचा।
15और एक मनुष्य ने उसे मैदान में इधर-उधर भटकते हुए पाकर उससे पूछा, “तू क्या ढूंढ़ता है?”
16और उसने कहा, “मैं अपने भाइयों को ढूंढ़ रहा हू। कृपया, मुझे बता कि वे भेड़-बकरियां कहां चरा रहे है।”
17तब उस मनुष्य ने कहा, “वे यहां से चले गए हैं; मैंने उन्हें यह कहते सुना, ‘आओ, हम दोतान चलें’।” अतः यूसुफ अपने भाइयों की खोज में चला, और वे उसे दोतान में मिले।
18जब उन्होंने उसे दूर से देखा तो उसके निकट आने से पहले ही उसे मार डालने का षड्यंत्र रचा।
19और वे एक दूसरे से कहने लगे, “देखो, वह स्वप्न-दर्शी आ रहा है।
20तो आओ, हम उसे घात करके किसी गड्हे में डाल दें, फिर कहेंगे कि कोई हिंसक पशु उसे खा गया। तब हम देखेंगे कि उसके स्वप्नों का क्या होगा।”
21परन्तु रूबेन ने यह सुना और उसे उनके हाथ से बचा लिया। उसने कहा, “हम उसे घात न करे।”
22रूबेन ने उनसे यह भी कहा, “लहू मत बहाओ, उसको जंगल में इस गड्हे में डाल दो परन्तु उस पर हाथ मत उठाओ।” वह तो उसको उनके हाथ से छुड़ाकर फिर पिता के पास पहुंचाना चाहता था।
23तब ऐसा हुआ कि जब यूसुफ अपने भाइयों के पास पहुंचा तो उन्होंने उसका रंगबिरंगा अंगरखा जिसे वह पहने हुए था, उतार लिया;
24और उसे पकड़ कर गड़हा में फेंक दिया। वह गड़हा तो सूखा था, उसमें कुछ भी पानी न था।
25तब वे भोजन करने बैठ गए। और जब उन्होनें आंखें उठाकर देखा कि इश्माएलियों का एक दल ऊंटों पर सुगन्ध-द्रव्य, बलसान, और गन्धरस लादे हुए, गिलाद से मिस्र को चला जा रहा है,
26तब यहूदा ने अपने भाइयों से कहा, “अपने भाई को घात करने और उसका खून छिपाने से हमें क्या लाभ होगा?
27आओ, हम उसे इश्माएलियों के हाथ बेच डालें, और अपना हाथ उस पर न उठाएं क्योंकि वह हमारा भाई और हमारा ही हाड़-मांस है।” और उसके भाइयों ने उसकी बात मान ली।
28तब कुछ मिघानी व्यापारी उधर से निकले। अतः उन्होंने उसको गड्हे में से खींच कर बाहर निकाला और उसे चांदी के बीस शेकेल में इश्माएलियों के हाथ बेच डाला। इस प्रकार वे यूसुफ को मिस्र में ले गए।
29जब रूबेन गड्हे की ओर लौटा तो उसने देखा कि यूसुफ गड्हे में नहीं है, अतः उसने अपने वस्त्र फाड़ डाले
30और उसने लौट कर अपने भाइयों से कहा, “लड़का तो नहीं है; अब मैं किधर जाऊं?”
31इसलिए उन्होंने यूसुफ का अंगरखा लिया और एक बकरे को मार कर उसके लहू में उसे डुबो दिया।
32और उन्होंने उस रंग-बिरंगे अंगरखे को अपने पिता के पास पहुंचा कर कहा, “हम को यह मिला है। कृपया इसे देख ले कि यह तेरे पुत्र का अंगरखा है या नही।”
33उसने पहचान लिया और कहा, “यह मेरे ही पुत्र का अंगरखा है। किसी जंगली पशु ने उसको खा लिया है; निःसन्देह यूसुफ फाड़ डाला गया है।”
34अतः याकूब ने अपने कपड़े फाड़े और कमर में टाट लपेटा और अपने पुत्र के लिए बहुत दिनों तक शोकित रहा।
35तब उसके सब बेटे-बेटियों ने उसे शान्ति देने का प्रयत्न किया पर उसको शान्ति न मिली। और उसने कहा, “मैं तो अपने पुत्र के लिए विलाप करता हुआ अधोलोक में उतर जाऊंगा।” इस प्रकार उसका पिता उसके लिए रोता रहा।
36इसी बीच मिघानियों ने यूसुफ को मिस्र में ले जाकर पोतीपर नामक फि़रौन के एक हाकिम के हाथ जो अंगरक्षकों का प्रधान था बेच डाला।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)