पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 7 / 50
उत्पत्ति 7
1तब यहोवा ने नूह से कहा, “तू अपने समस्त घराने सहित जहाज में प्रवेश कर, क्योंकि इस पीढ़ी में तू ही मुझे धर्मी दिखाई देता है।
2तू अपने साथ शुद्ध पशु की प्रत्येक जाति में से नर और उसकी मादा के सात-सात जोड़े लेना; और जो अशुद्ध पशु हैं उनमें से एक जोड़ा लेना, अर्थात् नर और उसकी मादा।
3आकाश के पक्षियों में से भी नर और मादा के सात-सात जोड़े लेना कि उनका वंश सारी पृथ्वी पर बचा रहे।
4क्योंकि सात दिन के बाद मैं पृथ्वी पर चालीस दिन और चालीस रात तक जल बरसाता रहूंगा, और मैं प्रत्येक प्राणी को जिसे मैंने सृजा है, पृथ्वी पर से मिटा दूंगा।”
5और यहोवा ने नूह को जैसी आज्ञा दी थी, उसने सब कुछ वैसा ही किया।
6जब जलप्रलय पृथ्वी पर आया, उस समय नूह की आयु छः सौ वर्ष की थी।
7तब जलप्रलय के कारण नूह ने अपने पुत्रों, अपनी पत्नी और अपनी बहुओं के साथ, जहाज़ में प्रवेश किया।
8शुद्ध और अशुद्ध पशु-पक्षियों और भूमि पर रेंगने वाले प्रत्येक प्रकार के
9जन्तुओं में से दो-दो अर्थात् नर और मादा करके नूह के साथ जहाज में गए, जैसी परमेश्वर ने नूह को आज्ञा दी थी।
10तब सात दिन के पश्चात् ऐसा हुआ कि प्रलय का जल पृथ्वी पर आ गया।
11नूह के जीवन के छः सौवें वर्ष के दूसरे महीने के ठीक सत्रहवें दिन गहरे जल के सब सोते फूट पड़े और आकश के झरोखे खुल गए।
12और पृथ्वी पर चालीस दिन और चालीस रात वर्षा होती रही।
13ठीक उसी दिन नूह और उसके पुत्र, शेम, हाम, और येपेत, और नूह की पत्नी, तथा उसके पुत्रों के साथ उनकी तीनों पत्नियां, जहाज में गए-
14वे तथा प्रत्येक जाति के सब बनैले पशु और प्रत्येक जाति के पालतू पशु, और पृथ्वी पर रेंगने वाले प्रत्येक जाति के जीव-जन्तु, तथा प्रत्येक जाति के सब पक्षी भी।
15इस प्रकार सब प्राणी जिनमें जीवन का श्वास था, दो-दो करके नूह के पास जहाज में गए।
16और जिन्होंने प्रवेश किया, जैसा कि परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, वे सब प्राणियों में से नर और मादा थे। तब यहोवा ने जहाज को बाहर से बन्द कर दिया।
17तब चालीस दिन तक पृथ्वी पर जलप्रलय होता रहा, और जल बढ़ता गया और जहाज ऊपर उठता गयाः इस प्रकार वह पृथ्वी से ऊपर उठ गया।
18और पृथ्वी पर जल बढ़ते-बढ़ते बहुत बढ़ गया, तथा जहाज जल की सतह पर तैरने लगा।
19जल पृथ्वी पर इतना अधिक बढ़ गया कि उसने आकाश के नीचे के सभी ऊंचे से ऊंचे पर्वतों को भी ढंक लिया।
20जल पन्द्रह हाथ और ऊंचा उठ गया और पहाड़ डूब गए।
21और पृथ्वी पर चलने वाले प्राणी, क्या पक्षी, क्या पशु, क्या जंगली जानवर, और सारे कीड़े-मकोड़े जो पृथ्वी पर झुंडों में रहते हैं, और समस्त मनुष्य-जाति-सबके सब नष्ट हो गए।
22और जितने सूखी भूमि पर थे तथा जिनके नथनों में जीवन का श्वास था, सब मर मिटे।
23इस प्रकार परमेश्वर ने भूमि पर से प्रत्येक जीवित प्राणी को मिटा डाला। मनुष्य से लेकर, जानवर, रेंगनेवाले जीव-जन्तु, तथा आकाश के पक्षी तक-ये सब पृथ्वी पर से मिटा दिए गए। केवल नूह तथा जितने उसके साथ जहाज में थे, वे ही बचे।
24और जल पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)