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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 6 / 50

उत्पत्ति 6

1फिर ऐसा हुआ कि जब मनुष्य पृथ्वी पर बढ़ने लगे और उनकी पुत्रियां उत्पन्न हुईं,

2तब परमेश्वर के पुत्रों ने मनुष्य की पुत्रियों को देखा कि वे सुन्दर हैं, और उन्होंने जिस-जिस को चाहा उस-उस को अपनी पत्नी बना लिया।

3तब यहोवा ने कहा, “मेरा आत्मा मनुष्य के साथ सदा विवाद करता न रहेगा, क्योंकि वह तो शरीर है। अब उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।”

4उन दिनों में पृथ्वी पर नफिली रहा करते थे और बाद में उस समय भी थे जब परमेश्वर के पुत्रों ने मनुष्यों की पुत्रियों के पास जाकर उनसे सन्तान उत्पन्न की। ये प्राचीन काल के शूरवीर और सुप्रसिद्ध मनुष्य थे।

5तब यहोवा ने देखा कि पृथ्वी पर मनुष्य की दुष्टता बहुत बढ़ गई है, और उसके मन का प्रत्येक विचार निरन्तर बुरा ही होता है।

6और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाकर पछताया-और वह मन में अत्यन्त खेदित हुआ।

7तब यहोवा ने कहा, “मैं मनुष्य को जिसकी मैंने सृष्टि की है पृथ्वी पर से मिटा डालूंगा- मनुष्य, पशु, रेंगने वाले जन्तु, आकाश के पक्षी- सबको मिटा दूंगा, क्योंकि मैं उनको बनाने से पछताता हू।”

8परन्तु यहोवा की कृपा-दृष्टि नूह पर बनी रही।

9नूह की वंशावली यह है। नूह तो धर्मी और अपने समय के लोगों में निर्दोष व्यक्ति था। नूह परमेश्वर के साथ-साथ चला करता था।

10और नूह से तीन पुत्र उत्पन्न हुए, अर्थात् शेम, हाम, और येपेत।

11और परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी भ्रष्ट हो गई थी और हिंसा से भर गई थी।

12परमेश्वर ने पृथ्वी पर दृष्टि की, और देखो, वह भ्रष्ट हो गई थी, क्योंकि पृथ्वी पर सब प्राणियों ने अपना-अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।

13तब परमेश्वर ने नूह से कहा, “मेरे सामने सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न आ गया है, क्योंकि पृथ्वी उनके कारण हिंसा से भर गई है; और देख, मैं उनको पृथ्वी समेत नष्ट, करने वाला हू।

14तू अपने लिए गोपेर की लकड़ी का एक जहाज बना; उस जहाज में कोठरियां बनाना, और उसमें भीतर-बाहर राल लगाना।

15और तू उसे इस प्रकार बनानाः उसकी लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ हो।

16जहाज में एक खिड़की बनाना और उसके एक हाथ ऊपर से छत डालना, और जहाज में एक ओर दरवाजा रखना। और उसमें पहला, दूसरा, और तीसरा खंड बनाना।

17और सुन, मैं स्वयं आकाश के नीचे के सब प्राणियों को जिनमें जीवन का श्वास है, नष्ट करने के लिए पृथ्वी पर जलप्रलय करने वाला हूं; और पृथ्वी पर जो कुछ है वह सब नष्ट हो जाएगा।

18पर मैं तेरे साथ वाचा बांधता हूं; इसलिए तू अपने पुत्रों, अपनी पत्नी और बहुओं के साथ जहाज में प्रवेश करना।

19और सब जीवित प्रिाणयों में से तू प्रत्येक जाति के दो-दो अर्थात् नर और मादा अपने साथ जहाज में ले जाना कि वे तेरे साथ जीवित बचे।

20प्रत्येक जाति के पक्षी और प्रत्येक जाति के पशु और भूमि पर रेंगने वाले प्रत्येक जाति के जन्तुओं का एक-एक जोड़ा तेरे पास आएगा कि वे जीवित बचे।

21और तू सब प्रकार की खाघ-सामग्री लेकर अपने पास इकट्ठा कर लेना जो तेरे और उनके भोजन के लिए होगी।”

22जैसी परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, नूह ने ऐसा ही किया। उसने सब कुछ वैसा ही किया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)