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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 8 / 50

उत्पत्ति 8

1परन्तु परमेश्वर ने नूह की तथा जितने वन-पशु और घरेलू पशु उसके साथ जहाज में थे उन सबकी सुधि ली। और परमेश्वर ने पृथ्वी पर हवा चलाई, और पानी थम गया।

2और अथाह समुद्र के स्रोत और आकाश के झरोखे बन्द कर दिए गए, और आकाश से वर्षा रोक दी गई।

3तब पृथ्वी से जल धीरे-धीरे घटने लगा और एक सौ पचास दिन के बीतने पर जल घट गया।

4और सातवें महीने के सत्रहवें दिन जहाज अरारात पर्वत पर जा टिका।

5और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहले दिन पर्वतों की चोटियां दिखाई देने लगी।

6तब ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात् नूह ने अपने बनाए हुए जहाज की खिड़की खोली,

7और उसने एक कौवा उड़ा दिया। और जब तक पृथ्वी पर से जल सूख न गया, तब तक वह इधर-उधर उड़ता फिरा।

8फिर उसने अपने पास से एक कबूतरी को उड़ा दिया कि देखे कि जल भूमि पर से घट गया कि नही।

9पर उस कबूतरी को अपने पैर रखने के लिए कोई आधार न मिला, इसलिए वह जहाज पर उसके पास लौट आई, क्योंकि समस्त पृथ्वी पर जल ही जल था। तब उसने हाथ बढ़ाकर उसे ले लिया और अपने पास जहाज में रख लिया।

10तब सात दिन और ठहरकर उसने उस कबूतरी को फिर उड़ाया।

11वह कबूतरी संध्या समय उसके पास लौट आई; और देखो, उसकी चोंच में जैतून की नई पत्ती थी। इससे नूह को मालूम हो गया कि जल भूमि पर से घट गया है।

12तब सात दिन और ठहरकर उसने उस कबूतरी को फिर उड़ाया, पर वह उसके पास फिर न लौटी।

13और ऐसा हुआ कि छः सौ एक वर्ष के पहले महीने के पहले दिन, पृथ्वी पर से जल सूख गया। तब नूह ने जहाज की छत खोलकर बाहर दृष्टि की, और देखो, भूमि की सतह सूख गई थी।

14और दूसरे महीने के सत्ताईसवें दिन तक पृथ्वी सूख चुकी थी।

15तब परमेश्वर ने नूह से यह कहाः

16“तू जहाज में से बाहर निकल आ, अर्थात् तू, और तेरे साथ तेरी पत्नी, तेरे पुत्र और तेरी बहुएं भी।

17अपने साथ प्रत्येक शरीर धारी प्राणी को, अर्थात् अपने साथ के समस्त पशुओं, पक्षियों और पृथ्वी पर रेंगने वाले जंतुओं को बाहर निकाल ले आ, कि पृथ्वी पर अत्यधिक फैलें, फूलें-फलें और पृथ्वी पर बढ़ जाए।”

18तब नूह अपने पुत्रों, अपनी पत्नी, और बहुओं सहित बाहर निकल आया।

19और सब जंगली पशु, सब रेंगने वाले जन्तु, तथा पक्षी, और पृथ्वी पर चलने-फिरने वाले सब जीव-जन्तु अपनी-अपनी जाति के अनुसार जहाज में से निकल आए।

20तब नूह ने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई और प्रत्येक शुद्ध पशु और प्रत्येक शुद्ध पक्षी की जाति में से लेकर वेदी पर होमबलियां चढ़ाईं।

21और यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर अपने मन में कहा, “मैं फिर कभी मनुष्य के कारण पृथ्वी को शाप न दूंगा, यघपि बचपन से मनुष्य के मन में जो कुछ उत्पन्न होता है वह बुरा ही होता है। जैसा मैंने प्रत्येक प्राणी को अब नष्ट किया है, वैसा फिर कभी न करूंगा।

22जब तक पृथ्वी बनी रहेगी, तब तकः बोनी और कटनी, सर्दी और गर्मी, ग्रीष्म और शरद, दिन और रात, समाप्त न होंगे।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)