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नया नियम · इब्रानियों · अध्याय 6 / 13

इब्रानियों 6

1इसलिए हम मसीह के विजय में प्रारम्भिक शिक्षा को छोड़ कर सिद्धता की ओर बढ़ते जाएं और मरे हुए कार्यों से मन फिराने, परमेश्वर पर विश्वास करने,

2बपतिस्मों और हाथ रखने तथा मरे हुओं के जी उठने और अनन्त न्याय की शिक्षा की नींव फिर से न डाले।

3यदि परमेश्वर चाहे तो हम ऐसा ही करेंगे।

4क्यांकि जो लोग एक बार ज्योति पा चुके हैं और स्वर्गिक वरदान का स्वाद चख चुके हैं तथा पवित्र आत्मा के भागी बनाए गए हैं,

5और परमेश्वर के उत्तम वचन का तथा आने वाले युग की सामर्थ का स्वाद चख चुके हैं,

6यदि वे भटक जाएं तो उन्हें मन-परिवर्तन के लिए फिर से नया बनाना असम्भव है, क्योंकि वे अपने लिए परमेश्वर के पुत्र को पुनः क्रूस पर चढ़ाते हैं और खुले आम उसका अपमान करते है।

7जो भूमि बार बार होने वाली वर्षा के पानी को पीती और जोतने-बोने वालों के लिए लाभदायक साग-पात उपजाती है, वह परमेश्वर से आशिज पाती है।

8परन्तु यदि वह कांटे और ऊंटकटारें उपजाए तो वह निकम्मी और शापित होने पर है, और उसका अन्त जलाया जाना है।

9परन्तु प्रियो, यघपि हम इस प्रकार कहते हैं, फिर भी हमें तुम्हारे विजय में इस से भी उत्तम बातों का अर्थात् उद्धार सम्बन्धी बातों का निश्चय है।

10क्योंकि परमेश्वर अन्यायी नहीं कि तुम्हारे काम और उस प्रेम को भूल जाए जो तुमने उसके नाम के प्रति इस प्रकार दिखाया कि पवित्र लोगों की सेवा की-और अब भी कर रहे हो।

11हमारी इच्छा है कि तुम में से प्रत्येक अपनी आशा की पूर्ण निश्चयता को प्राप्त करने के लिए अन्त तक प्रयत्नशील रहे,

12जिस से कि तुम आलसी न हो जाओ परन्तु उनका अनुकरण करो जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के उत्तराधिकारी है।

13इब्राहीम से प्रतिज्ञा करते समय जब परमेश्वर ने शपथ खाने के लिए अपने से बड़ा कोई न पाया तो उसने यह कहते हुए अपनी ही शपथ खाई,

14“निश्चय मैं तुझे आशिज दूंगा, और निश्चय ही मैं तुझे बढ़ाऊंगा।”

15और इस प्रकार धीरज से प्रतीक्षा करके उसने प्रतिज्ञा प्राप्त की।

16क्योंकि मनुष्य तो अपने से किसी बड़े की शपथ खाते हैं, और उस बात को निशिचत करने वाली यह शपथ उनके हर एक विवाद को समाप्त कर देती है।

17इसी प्रकार जब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर अपने अटल उद्देशय को और अधिक प्रकट करना चाहा तो उसने शपथ का उपयोग किया,

18कि हमें दो अटल बातों के द्वारा, जिनमें परमेश्वर का झूठ बोलना असम्भव है, दृढ़ प्रोत्साहन मिले-अर्थात् हमें जो शरण पाने के लिए दौड़ पड़े हैं कि उस आशा को प्राप्त करें जो सामने रखी है।

19यह आशा मानो हमारे प्राण के लिए लंगर है-ऐसी आशा जो निशिचत और दृढ़ है, और जो परदे के भीतर तक पहुंचती है,

20जहां यीशु ने हामरे लिए अग्रदूत बन कर और मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए महायाजक होकर प्रवेश किया है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)