पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 14 / 66
यशायाह 14
1जब यहोवा याकूब पर दया करेगा तथा इस्राएल को पुनः अपनाकर उन्हें उनके देश में बसाएगा, तब परदेशी उनसे मिल जाएंगे और याकूब के घराने के साथ-साथ रहेंगे।
2और अन्य जातियों के लोग उन्हें अपने साथ लेकर उनके स्थान को लौटा ले आएंगे तथा इस्राएल का घराना यहोवा के देश में उन पर अधिकारी होकर उनको दास और दासियां बनाएगा; और वे अपने बन्दी बनाने वालों को बन्दी बनाएंगे और अपने ऊपर अत्याचार करने वालों पर शासन करेंगे।
3जिस दिन यहोवा तुझे तेरी पीड़ा और घबराहट से और उस कठिन श्रम से जिसमें तू दास था, विश्राम देगा,
4उस दिन ऐसा होगा कि तू बेबीलोन के राजा पर ताना मारकर कहेगा, “अत्याचारी कैसे रुक गया! उसकी जलजलाहट कैसे जाती रही!
5यहोवा ने दुष्टों के सोंटे को तथा शासकों के उस राजदण्ड को तोड़ डाला है
6जिससे जाति-जाति को जलजलाहट में लगातार मारा जाता था और राष्ट्रों का दमन रोष और हिंसा से किया जाता था।
7अब सारी पृथ्वी शान्त है, वह चैन से है, लोग आनन्द से जय-जयकार करते है।
8सनौवर और लेबनोन के देवदार भी तेरे कारण आनन्द मनाकर कहते हैं, ‘जब से तू गिरा दिया गया तब से कोई हमें काटने नहीं आता।’
9अधोलोक तेरे आगमन पर तुझसे मिलने को आतुर है; वह तेरे लिए मृतकों की आत्माओं को अर्थात् पृथ्वी के सब पुराने शासकों को जगाता है; वह जाति-जाति के सब राजाओं को उनके सिंहासनों पर से उठा खड़ा करता है।
10वे सब तुझे देखकर कहेंगे, ‘तू भी हमारे तुल्य निर्बल कर दिया गया है, तू भी हमारे समान बन गया है।
11तेरा वैभव और तेरी सारंगियों का संगीत नीचे अधोलोक में पहुंचा दिया गया है; कीड़े तेरा बिछौना और केंचुए तेरा ओढ़ना है।
12हे भोर के तारे, हे उषाकाल के पुत्र, तू आकाश से कैसे नीचे गिरा! तू जिसने जाति-जाति को निर्बल बना दिया अब कैसे काटकर भूमि पर गिरा दिया गया है!
13परन्तु तूने अपने मन में कहा था, ‘मैं आकाश पर चढूंगा, मैं परमेश्वर के तारों से भी ऊपर अपना सिंहासन स्थापित करूंगा, मैं दूर उत्तर दिशा के छोर पर सभा के पर्वत पर विराजूंगा।
14मैं बादलों से भी ऊंचे स्थान पर चढूंगा, मैं सर्वोच्च परमेश्वर के तुल्य बनूंगा।’
15फिर भी तू अधोलोक में, हां उस गड्हे की सतह तक उतारा जाएगा।
16जो तुझे देखेंगे वे तुझे ताकेंगे, वे तेरे विषय में सोचकर कहेंगे, ‘क्या यही वह पुरुष है जिसने पृथ्वी को थरथरा दिया था, राज्यों को हिला दिया था,
17जगत को निर्जन स्थान-सा बना दिया, उसके नगरों को उलट-पुलट कर दिया, और जिसने अपने बन्दियों को उनके घर पर जाने नहीं दिया?’
18जाति-जाति के सब राजा अपनी-अपनी कब्र में वैभव सहित पड़े है।
19परन्तु तू निकम्मी शाख के समान अपनी कब्र में से निकाल फेंका गया है। तू तलवार से बेधे हुओं की उन लाशों से लिपटा है जो उस गड्हे के पत्थरों में लताड़ी हुई लोथ के समान फेंक दिए गए हो।
20तुझे उनके साथ मिट्टी न दी जाएगी, क्योंकि तूने अपने देश को उजाड़ दिया, तूने अपनी प्रजा का वध किया है। कुकर्मियों के वंशजों का नाम भी फिर कभी लिया न जा सकेगा।
21उनके पूर्वजों के अधर्म के कारण उनके पुत्रों के वध का स्थान तैयार करो। ऐसा न हो कि वे फिर उठकर पृथ्वी के अधिकारी हो जाएं और उसकी सतह को नगरों से भर दे।”
22सेनाओं के यहोवा की वाणी है, “मैं उनके विरुद्ध उठूंगा और बेबीलोन से उनके नाम को और उनके बचे हुओं तथा पुत्र-पौत्रें को मिटा डालूंगा,” यहोवा की यही वाणी है।
23“मैं उसे साही का स्थान और पानी के दलदल भी बना दूंगा तथा मैं उसे विनाश के झाड़ू से झाड़ डालूंगा,” सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है।
24सेनाओं के यहोवा ने यह शपथ खाई है, “निःसंदेह जैसा मैंने ठाना है, वैसा ही हो जाएगा और जैसी योजना मैंने बनाई है, वैसी ही वह पूरी हो जाएगी,
25कि मैं अश्शूरियों को अपने देश में तोड़ दूंगा और अपने पहाड़ों पर उन्हें कुचल डालूंगा। तब उसका जूआ उन पर से और उसका बोझ उनके कन्धों पर से उतर जाएगा।
26यही योजना समस्त पृथ्वी के लिए ठहराई गई है, और यही वह हाथ है जो सब जातियों केग विरुद्ध बढ़ा हुआ है।
27क्योंकि जिस बात को सेनाओं के यहोवा ने ठाना है उसे कौन रद्द कर सकता है? और उसके उठे हुए हाथ को भला कौन रोक सकता है?”
28जिस वर्ष राजा आहाज की मृत्यु हुई, उसी वर्ष यह नबूवत हुईः
29“हे पलिश्त देश, तू इसलिए आनन्द न मना कि जिस लाठी से तुझे मार पड़ी वह टूट गई है; क्योंकि सर्प के मूल से एक करैत निकलेगा, हां, उससे एक उड़ने वाला विषधर उत्पन्न होगा।
30तब अति कंगाल लोग भोजन खाएंगे और दरिद्र निश्चिंत होकर विश्राम करेंगे। मैं तेरी जड़ को अकाल से नष्ट करूंगा और तेरे बचे हुए लोग घात किए जांएगे।
31हे नगर द्वार, हाय-हाय कर; हे नगर, चिल्ला; हे पलिश्त देश तू सब-का-सब पिघल जा; क्योकि उत्तर दिशा से धुआं उठेगा और उसकी सेना में कोई पीछे न रहेगा।
32तब उस देश के दूतों को क्या उत्तर दिया जाए? यह कि यहोवा ने सिय्योन की नींव डाली है, और इसमें उसकी प्रजा के दीन-दुखी शरण लेंगे।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)