पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 24 / 66
यशायाह 24
1देखो, यहोवा पृथ्वी को उजाड़ करके नष्ट कर देगा। वह उसकी सतह को उलट-पुलट कर देगा और उस पर रहने वालों को तितर-बितर कर देगा।
2और प्रजा के लोग याजक के समान होंगे, दास अपने स्वामी के समान; उधार देने वाला उधार लेने वाले के समान; दासी अपनी स्वामिनी के समान; खरीदने वाला बेचने वाले के समान; और ट्टणी, साहूकार के समान हो जाएगा।
3पृथ्वी पूर्णतः सूनी, और उजाड़ हो जाएगी, क्योंकि यहोवा की यही वाणी है।
4पृथ्वी विलाप करेगी और मुर्झाएगी, जगत कुम्हलाएगा और मुर्झाएगा और पृथ्वी के महान् लोग भी कुम्हला जाएंगे।
5पृथ्वी अपने निवासियों के कारण दूषित हो गई है क्योंकि उन्होंने व्यवस्था का उल्लंघन किया, विधियों को भंग किया, तथा सनातन वाचा को तोड़ दिया है।
6इस कारण पृथ्वी को शाप निगल जाएगा और उसमें रहने वाले दोषी ठहरेंगे। अतः पृथ्वी के निवासी भस्म हो जाएंगे और थोड़े ही लोग बचे रहेंगे।
7नया दाखमधु विलाप करेगा, दाखलता सड़ जाएगी, सब मौज-मस्ती करने वाले आहें भरेंगे।
8डफ बजाने का हर्ष जाता रहेगा, मौज उड़ाने वालों का कोलाहल बन्द हो जाएगा, वीणा बजाने का उल्लास समाप्त हो जाएगा।
9उनका गा-गाकर दाखमधु पीना बन्द हो जाएगा, पीने वालों को मदिरा कड़वी लगेगी।
10अस्तव्यस्त नगरी उजड़ जाएगी, उसका प्रत्येक घर ऐसा बन्द किया जाएगा कि उसमें कोई प्रवेश न कर सके।
11सड़कों में मदिरा के लिए चिल्लाहट मचेगी। सारा आनन्द उदासी में बदल जाएगा। पृथ्वी का हर्षोन्माद जाता रहेगा।
12नगर में विध्वंस ही विध्वंस रहेगा और फाटक तोड़कर चूर-चूर किए जाएंगे।
13जैसे जैतून का वृक्ष झाड़ने के समय व अंगूर की फसल तोड़ लेने के पश्चात् कुछ ही शेष रह जाता है वैसा ही पृथ्वी पर जाति-जाति के मध्य होगा।
14वे अपनी आवाज उठाएंगे और आनन्द से जय-जयकार करेंगे। वे यहोवा के वैभव के विषय में पश्चिम से ललकारेंगे।
15इसलिए तुम पूर्व में यहोवा की, और समुद्र के तटीय देश में इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम की महिमा करो।
16पृथ्वी के छोर-छोर से हमें ये गीत सुनाई पड़ते हैं, “उस धर्मी की महिमा हो!” परन्तु मैंने कहा है, “हाय, हाय! मैं नष्ट हुआ! विश्वासघाती विश्वासघात करते हैं, वे बड़ा ही विश्वासघात करते है।”
17हे पृथ्वी के निवासी, आतंक, गड्हे और फंदे तेरे सामने है।
18उस समय जो कोई आतंक का समाचार सुनकर भागेगा वह गड्हे में गिरेगा, और जो गड्हे में से बाहर निकल आएगा वह फंदे में फंसेगा; क्योंकि आकाश के झरोखे खुल जाएंगे और पृथ्वी की नींवें डोल उठेंगी।
19पृथ्वी फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगी, पृथ्वी विखंडित हो जाएगी, पृथ्वी अत्यन्त कांप उठेगी।
20पृथ्वी मतवाले के समान लड़खड़ाएगी, वह झोपड़ी के समान डगमगाएगी, क्योंकि उस पर उसके अपराधों का भारी बोझ होगा वह गिरेगी और फिर कभी न उठेगी।
21उस दिन ऐसा होगा कि यहोवा आकाश की सेना को आकाश में तथा पृथ्वी के राजाओं को पृथ्वी पर दण्ड देगा।
22और वे कारागार में बन्द किए गए बन्दियों के समान इकट्ठे किए जाएंगे तथा बन्दीगृह में बन्द रखे जाएंगे, तब बहुत दिनों के पश्चात् उनको दण्ड दिया जाएगा।
23तब चन्द्रमा लज्जित होगा और सूर्य शर्माएगा, क्योंकि सेनाओं का यहोवा सिय्योन पर्वत और यरूशलेम में राज्य करेगा, और उसका तेज उसके प्राचीनों पर प्रकट होगा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)