पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 57 / 66
यशायाह 57
1धर्मी जन नष्ट होता है और कोई इसकी चिन्ता नहीं करता। भक्तजन उठा लिए जाते हैं जबकि कोई समझ नहीं पाता। धर्मी जन तो इसलिए उठा लिया जाता है कि बुराई से बच जाए,
2वह चिर-शान्ति में प्रवेश पाता है। प्रत्येक जो खरी चाल चलता है अपने बिछौने पर विश्राम पाता है।
3“परन्तु तुम, हे जादूगरनी के पुत्रों, हे व्यभिचारी और वेश्या की सन्तान, यहां आओ।
4तुम किसकी हंसी उड़ाते हो? तुम मुंह खोलकर किसे जीभ दिखाते हो? क्या तुम विद्रोह की सन्तान और झूठ के वंशज नहीं हो-
5तुम, जो बांज और प्रत्येक फैलने वाले वृक्ष के तले कामातुर होते हो, तुम जो घाटियों और चट्टानों की दरारों में अपने बच्चों का वध करते हो?
6तंग घाटियों के चिकने पत्थर ही तेरा भाग, हां, तेरी नियति ठहरे हैं; तूने तो उन्हीं के लिए तर्पण उंडेला है और अन्नबलि चढ़ाई है। क्या मैं इन बातों के होते हुए भी शान्त हो जाऊं?
7एक ऊंचे और विशाल पर्वत पर तूने अपना बिछौना बिछाया है। वहां भी तू बलि करने के लिए चढ़ गई।
8तूने अपना भक्ति-चिह्न द्वार और चौखट के पीछे रखा। निश्चय ही तूने मुझसे दूर जाकर अपने आपको निर्वस्त्र किया, और ऊपर चढ़कर अपनी सेज सजाई। और तूने उनके साथ अपने लिए वाचा बांध ली। उनका तेरे साथ लेटना तुझे पसंद आया और तूने उनके पुरुषत्व को देखा।
9सुगन्धित तेल लिए हुए तू यात्रा करके राजा के पास गई, और अत्यधिक इत्रें से तूने अपने आपको सजाया। तूने अपने दूतों को दूर-दूर तक वरन् अधोलेाक तक भेजा।
10तू अपनी लम्बी यात्रा के कारण थक गई, फिर भी तूने यह न कहा कि यह व्यर्थ है। तूने नया बल प्राप्त किया, इसलिए तू मूर्च्छित नहीं हुई।
11“तू किसके कारण चिन्तित और भयभीत है कि तूने झूठ बोला और मुझे स्मरण ही न रखा, न मुझ पर ध्यान दिया? क्या मैं एक लम्बे समय से चुप नहीं रहा, जिससे तू मेरा भय नहीं मानती?
12मैं तेरी धार्मिकता और तेरे कार्यों का वर्णन करूंगा, पर उनसे तुझे कुछ लाभ न होगा।
13जब तू दुहाई दे, तब तेरी जमा की हुई मूर्तियां ही तुझे छुड़ाए। वे तो सब-की-सब वायु से वरन् सांस के एक ही झोंके से उड़ा दी जाएंगी। परन्तु जो मेरी शरण लेता है वह देश का उत्तराधिकारी होगा, और मेरे पवित्र पर्वत का भी अधिकारी होगा।”
14और यह कहा जाएगा, “बनाओ, बनाओ, राजमार्ग बनाओ! मेरी प्रजा के मार्ग की प्रत्येक बाधा दूर करो।”
15क्योंकि जो अति महान् और महिमामय है जो अनन्तकाल तक बना रहता है, और जिसका नाम पवित्र है, वह यों कहता हैः “मैं ऊंचे पर और पवित्रस्थान में निवास करता हूं, और उसके संग भी रहता हूं जो आत्मा में नम्र और दीन है, जिससे कि दीन की आत्मा और नम्र हृदय को पुनर्जीवित करू।
16मैं सर्वदा प्रतिवाद करता न रहूंगा, न सदा क्रोधित रहूंगा कहीं ऐसा न हो कि जिनकी मैंने सृष्टि की है उनकी आत्मा तथा उनके प्राण मेरे सामने मूर्छित हो जाए।
17उसके लोभ की दुष्टता के कारण मैंने क्रोधित होकर उसको मारा था, क्रोध ही के कारण मैंने अपना मुख छिपा लिया था, परन्तु वह अपने मनमाने मार्ग पर भटकता चला गया।
18मैंने उसकी चाल को देखा है, परन्तु मैं उसे चंगा करूंगा, उसकी अगुवाई करूंगा। और उसको तथा उसके लिए शोक करने वालों को शान्ति दूंगा
19और उनके हाेंठों से स्तुति उत्पन्न करूंगा।” यहोवा ने कहा है, “जो दूर है उसे शान्ति मिले और जो निकट है उसे भी शान्ति मिले, और मैं उसको चंगा करूंगा।”
20परन्तु दुष्ट तो अशान्त समुद्र के समान है; क्योंकि वह चुप रह ही नहीं सकता, और उसकी लहरें कूड़ा-करकट और कीचड़ उछालती है।
21“दुष्टों के लिए शान्ति है ही नही।” मेरे परमेश्वर का यही वचन है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)