पुराना नियम · यिर्मयाह · अध्याय 11 / 52
यिर्मयाह 11
1यहोवा का वह वचन जो यिर्मयाह के पास पहुंचा,
2“इस वाचा के वचनों को सुन और यहूदा के पुरफ़षों और यरूशलेम के निवासियों से कह
3और उन्हें सुना, ‘इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, श्रापित है वह मनुष्य जो इस वाचा के वचनों को नहीं मानता
4जिसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को उस दिन दिया था जब मैं उनको मिस्र देश से अर्थात् लोहे की भट्टी में से यह कहते हुए निकाल लाया था, ‘मेरी वाणी सुनो और उन सब बातों का पालन करो जिनकी मैंने तुम्हें आज्ञा दी थी तब तुम मेरी प्रजा ठहरोगे और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूंगा।’
5जिससे कि मैं उस शपथ को पूरी करूं जो मैंने तुम्हारे पूर्वजों से खाई थी अर्थात् उनको ऐसा देश दूंगा जिसमें दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, और वह आज पूरी भी हो गई है।” तब मैंने उत्तर देकर कहा, “हे यहोवा, ऐसा ही हो।”
6तब यहोवा ने मुझसे कहा, “इन वचनों का यहूदा के नगरों और यरूशलेम की गलियों में यह कहते हुए प्रचार कर, ‘इस वाचा के वचन सुनो और उनका पालन करो।
7क्योंकि मैं जिस दिन से तुम्हारे पूर्वजों को छुड़ा कर लाया, उस दिन से आज तक गम्भीरतापूर्वक दृढ़ता से चिताता आया हूं, “मेरी वाणी सुनो।”
8फिर भी उन्होंने न माना और न अपने कान लगाए, परन्तु प्रत्येक जन अपने बुरे मन के हठ पर ही चलता रहा, इस लिए मैंने उन पर इस वाचा की वे सब बातें पूरी की हैं जिनको करने की आज्ञा मैंने उनको दी थी; परन्तु उन्होंने न माना।’”
9तब यहोवा ने मुझसे कहा, “यहूदियों और यरूशलेमवासियों में एक षड्यंत्र पाया गया है।
10इन्होंने अपने उन पूर्वजों के अधर्म का अनुसरण किया जिन्होंने मेरा वचन सुनने से इनकार किया और अन्य देवताओं के पीछे चलकर उन्हीं की उपासना की; इस्राएल और यहूदा के घरानों ने मेरी उस वाचा को जिसे मैंने उनके पूर्वजों से बांधी थी तोड़ डाला।”
11इसलिए यहोवा यों कहता है, “देखो, मैं उन पर ऐसी विपत्ति डालने पर हूं जिससे वे बच नहीं सकेंगे; यघपि वे मुझे पुकारेंगे फिर भी मैं उनकी नहीं सुनूंगा।
12तब यहूदा के नागरिक और यरूशलेमवासी उन देवताओं को पुकारेंगे जिनको वे धूप जलाते थे, पर विपत्ति के समय वे उन्हें कभी बचा न सकेंगे।
13क्योंकि हे यहूदा, जितने तेरे नगर हैं उतने ही तेरे देवता और यरूशलेम की जितनी गलियां हैं उतनी ही वेदियां तुमने उस लज्जाजनक वस्तु के लिए स्थापित की हैं कि उन वेदियों पर बाअल के लिए धूप जलाओ।
14“इसलिए तू इस प्रजा के लिए प्रार्थना न करना, न उनके लिए विनती करना और न दोहाई देना; क्योंकि जब वे अपनी विपत्ति के कारण मुझे पुकारें तो मैं उनकी न सुनूंगा।
15मेरी प्रिया, तुझे मेरे घर में क्या अधिकार है जबकि तू ने बहुत से कुकर्म किए हैं? क्या बलिदान का मांस तेरी विपत्ति को तुझसे दूर कर सकता है कि तू आनन्द मना सके?”
16यहोवा ने तो तेरा नाम, “मनोहर, जैतून वृक्ष फलवन्त और हरा भरा रखा था,” परन्तु उसने बड़े कोलाहल का शब्द होते ही तुझमें आग लगाई, और उसकी डालियां व्यर्थ हो गईं।
17जिस सेनाओं के यहोवा ने, तुझे रोपा था उसी ने इस्राएल और यहूदा के घराने की दुष्टता के कारण जो उन्होने बाअल के आगे बलिदान चढ़ा कर मुझे कुपित किया, तुम पर यह विपत्ति डाली है।
18इसके अतिरिक्त, यहोवा ने मुझ पर प्रकट किया और मैं जान गया; तब तूने मुझ पर उनके कार्यों को प्रकट किया।
19परन्तु मैं तो उस भोले मेमने के समान था जो वध के लिए ले जाया जाता है। और मैं न जानता था कि उन्होंने यह कहकर मेरे विरफ़द्ध षड्यन्त्र रचा है़; “आओ हम इस वृक्ष को फल समेत काट डालें और जीवितों की भूमि से उसे मिटा डालें कि उसका नाम फिर स्मरण न किया जाए।”
20परन्तु हे सेनाओं के यहोवा तू जो धार्मिकता से न्याय करता और भावनाओं और हृदय को जांचता है, तू उनका बदला ले और मुझे दिखा क्योंकि मैंने अपना मुकद्दमा तुझे सौंप दिया है।
21इसलिए उन अनातोतियों के सम्बन्ध में यहोवा यों कहता है जो तेरे प्राण के खोजी हैं और तुझसे कहते हैं, “यहोवा के नाम से नबूवत मत कर कि तू हमारे हाथों मरे”;
22अतः सेनाओं का यहोवा यों कहता है, “देख, मैं उन्हें दण्ड देने पर हू। युवा तलवार से और उनके लड़के-लड़कियां अकाल से मरेंगे;
23और उनमें से कोई भी नहीं बचेगा क्योंकि मैं अनातोत के लोगों पर विपत्ति लाऊंगा-यह उनके दण्ड का वर्ष होगा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)