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पुराना नियम · यिर्मयाह · अध्याय 10 / 52

यिर्मयाह 10

1हे इस्राएल के घराने, जो वचन यहोवा तुझसे कहता है उसे सुन।

2यहोवा यों कहता हैः “अन्य जातियों की चाल को मत सीखो, न आकाश के चिह्नों को देखकर भयभीत होओ, यघपि अन्य जातियां उनसे भयभीत होती हैं;

3लोगों की प्रथाएं तो छलावा हैं; क्योंकि यह तो जंगल से काटी गई वह लकड़ी है जो किसी कारीगर के हाथ की हस्तकला है जिसे उसने बसूले से काटकर बनाया।

4वे उसे सोने और चांदी से सजाते और हथौड़े से कीलें ठोंक-ठोंककर कसते हैं कि वह हिल-डुल न सके।

5वे खीरे के खेत में पक्षियों को डराने के लिए खड़े पुतलों के समान हैं, जो बोल नहीं सकते, जिन्हें उठाए फिरना पड़ता है क्योंकि वे चल नहीं सकते। उनसे भयभीत न होओ, क्योकि वे कुछ भी हानि नहीं कर सकते, न ही कुछ भला कर सकते है।”

6हे यहोवा, तेरे समान कोई नहीं है, तू महान् है, और तेरा नाम पराक्रम में है।

7हे सब जातियों के राजा, तुझसे कौन नहीं डरेगा? वास्तव में तू ही इस योग्य है। क्योंकि अन्य जातियों के सब बुद्धिमानों के मध्य और उनके समस्त राज्यों में तेरे समान तो कोई नहीं है।

8परन्तु वे तो पूर्णतः जड़मति और मूर्ख हैं-मूर्तियों से क्या शिक्षा? वे तो काठ ही है!

9तर्शीश से चांदी के पत्तर और ऊाज से सोना लाया जाता है जो कारीगर की कारीगरी और सुनार की हस्तकला है; उनके वस्त्र नीले और बैंजनी होते हैं; ये सब निपुण मनुष्यों के कार्य है।

10परन्तु यहोवा सच्चा परमेश्वर है; वह जीवित परमेश्वर और सदाकाल का राजा है। उसके प्रकोप से पृथ्वी कांपती है और जाति-जाति के लोग उसके क्रोध को सहन नहीं कर सकते।

11तू उनसे यों कहना, “ये देवता जिन्होंने न तो आकाश और न पृथ्वी को बनाया, पृथ्वी पर से और आकाश के नीचे से नष्ट हो जाएंगे।”

12परमेश्वर ही है जिसने अपने सामर्थ्य से पृथ्वी को बनाया, और अपनी बुद्धि से जिसने जगत को स्थिर किया और अपनी समझ से उसने आकाश को तान दिया।

13जब वह बोलता है तो आकाश में जल का सा बड़ा निनाद होता है और वह पृथ्वी के छोर से बादलों को उठाता है; वर्षा के लिए वह बिजली चमकाता है और अपने भंडार से पवन चलाता है।

14प्रत्येक मनुष्य मूढ़ अर्थात् ज्ञानरहित है, अपनी खोदी हुई मूर्ति के कारण प्रत्येक सुनार को लज्जित होना पड़ता है क्योंकि उसकी ढाली हुई प्रतिमाएं धोखा हैं और उनमें सांस है ही नही।

15वे व्यर्थ हैं, हास्यास्पद कार्य हैं, दण्ड पाने के समय वे नष्ट हो जाएंगी।

16याकूब का निज भाग तो इनके समान नहीं, क्योंकि सबका सृजनहार वही है। इस्राएल उसकी मीरास का गोत्र और सेनाओं का यहोवा उसका नाम है।

17तुम जो घेराबन्दी में रहते हो भूमि पर से अपनी गठरी उठा लो!

18क्योंकि यहोवा यों कहता है, “देखो, इस समय मैं इस देश के निवासियों को गोफन में भरकर फेंक दूंगा, और मैं उनको संकट में डालूंगा कि वे बन्दी बना लिए जाए।”

19मेरी चोट के कारण मुझ पर हाय! मेरा घाव असाध्य है। परन्तु मैंने कहा, “सचमुच यह तो एक रोग है, और मुझे सहना पड़ेगा।”

20मेरा तम्बू नष्ट हो गया है, मेरी सब रस्सियां टूट गई हैं; मेरे लड़के वाले मेरे पास से चले गए हैं और वे न रहे। कोई भी न रहा जो मेरे तम्बू को खड़ा करे और मेरी कनातें ताने।

21क्योंकि चरवाहे मूढ़ बन गए, उन्होंने यहोवा को नहीं खोजा; इसीलिए वे फूले-फले नहीं और उनके सारे झुंड तितर-बितर हो गए है।

22एक सूचना! देखो, वह आता है-उत्तर देश की ओर से एक बड़ा हुल्लड़ हो रहा है कि यहूदा के नगरों को उजाड़कर गीदड़ों का निवासस्थान बना डालो।

23हे यहोवा, मैं जानता हूं कि मनुष्य की चाल उसके अपने वश में नहीं और न ही उस मनुष्य के कदम अपनी ओर से संचालित होते है।

24हे यहोवा, मेरी ताड़ना कर परन्तु न्याय के साथ; अपने क्रोध में नहीं, कहीं ऐसा न हो कि तू मुझे नष्ट कर डाले।

25उन जातियों पर अपना कोप उंड़ेल जो तुझे नहीं जानती; और उन परिवारों पर जो तुझसे प्रार्थना नहीं करते; क्योंकि उन्होंने याकूब को खा लिया है और उसे निगल कर चट कर लिया है और उसके निवासस्थानों को उजाड़ डाला है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)