पुराना नियम · यिर्मयाह · अध्याय 18 / 52
यिर्मयाह 18
1यहोवा की ओर से यिर्मयाह के पास यह वचन पहुंचा,
2“उठ, और कुम्हार के घर जा, वहां मैं तुझे अपने वचन सुनाऊंगा।”
3तब मैं कुम्हार के घर गया और वह चाक पर कुछ बना रहा था।
4परन्तु मिट्टी का जो बर्तन वह बना रहा था उसके हाथों में ही बिगड़ गया अतः जैसा उसे भाया उसने उससे दूसरा बर्तन बना डाला।
5तब यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचाः
6“हे इस्राएल के घराने, क्या मैं भी इस कुम्हार की तरह तुम्हारे साथ व्यवहार नहीं कर सकता?” यहोवा कहता है, “हे इस्राएल के घराने, जिस प्रकार मिट्टी कुम्हार के हाथ में है, उसी प्रकार तुम भी मेरे हाथ में हो।
7यदि किसी क्षण मैं किसी जाति या किसी राज्य को उखाड़ डालने, ढा देने या नष्ट करने के लिए कहूं,
8यदि वह जाति जिसके विरफ़द्ध मैंने यह बात कही, अपनी दुष्टता से फिर जाए तो उस विपत्ति के विषय में जो मैंने उस पर डालने की ठानी थी, मैं पछताऊंगा।
9अथवा दूसरे क्षण यदि मैं किसी जाति या किसी राज्य को बनाने व स्थापित करने के लिए कहूं,
10यदि वह मेरी आज्ञा का पालन न करके मेरी दृष्टि में दुष्टता के कार्य करे, तो मैं उस भलाई के विषय में जिसको करने की मैंने प्रतिज्ञा की थी पछताऊंगा।
11अतः अब तू यहूदा के लोगों और यरूशलेम के निवासियों के विरफ़द्ध कह, ‘यहोवा यों कहता है; “देखो, मैं तुम्हारे विरुद्ध विपत्ति का उपाय कर रहा हूं और योजना बना रहा हूं। इसलिए तुम में से प्रत्येक अपने दुष्टता के कार्यों से फिरे और अपनी चाल और अपने कार्यों को सुधारे।”’
12परन्तु वे कहेंगे, ‘यह व्यर्थ है! क्योंकि हम तो अपनी ही योजना के अनुसार चलेंगे और हममें से प्रत्येक अपने दुष्ट मन की हठीली चाल के अनुसार ही चलेगा।’
13“इसलिए यहोवा यों कहता हैः ‘जाति जाति से पूछ कि क्या किसी ने कभी इस प्रकार की बातें सुनीं हैं? इस्राएल की कुंवारी ने अत्यंत भयानक कार्य किया है।
14क्या लेबनोन का हिम खुले प्रदेश की चट्टानों से पिघल सकता है? या दूर देश से बहने वाला शीतल जल कभी सूख सकता है?
15परन्तु मेरे लोग मुझे भूल गए हैं, वे निकम्मे ईश्वरों के लिए धूप जलाते हैं और उन्होंने अपने मार्गों में अर्थात् प्राचीनकाल के मार्गों में ठोकर खाई है कि राजमार्गों में न चलकर पगडंडियों में भटकें,
16कि उनका देश उजड़ जाए और लगातार उपहास का विषय बन जाए; हर व्यक्ति जो उसके पास से निकलेगा अचम्भित होकर अपना सिर हिलाएगा।
17पूर्वी हवा की भांति मैं उनको शत्रु के सामने तितर-बितर कर दूंगा, मैं उनकी विपत्ति के दिन उन्हें अपना मुंह नहीं पर अपनी पीठ दिखाऊंगा।”
18तब उन्होंने कहा, “आओ, हम यिर्मयाह के विरफ़द्ध योजना बनाए। निश्चय न तो याजक से व्यवस्था, न ज्ञानी से सम्मति और न नबी से ईश्वरीय वचन कहीं दूर होने वाला है! आओ, हम अपने वचन से उसे घायल करें और उसकी बातों पर कोई ध्यान न दे।“
19हे यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मेरे शत्रु जो कुछ कह रहे हैं उसे सुन!
20क्या भलाई का बदला बुराई से चुकाया जाए? स्मरण कर कि मै किस प्रकार उनकी भलाई के लिए प्रार्थना करने तेरे सम्मुख खड़ा हुआ कि तू उनके विरफ़द्ध अपनी क्रोधाग्नि को उन से दूर करे। परन्तु उन्होंने मेरे प्राण के लिए एक गड्ढा खोद डाला है।
21इसलिए तू उनके बच्चों को अकाल और तलवार के वश में कर दे; और उनकी स्रियां निर्वंश और विधवा हो जाए। उनके पुरफ़ष भी मारे जाएं और उनके जवान भी युद्ध में तलवार के घाट उतार दिए जाए।
22जब तू उन पर अचानक आक्रमणकारियों को ले आए तो उनके घरों से चिल्लाहट सुनाई पड़े; क्योंकि उन्होंने मुझे फंसाने के लिए गड्ढे और मेरे पांवों के लिए जाल बिछाए है।
23फिर भी हे यहोवा, तू तो उनकी सारी योजनाओं को जो मेरे प्राण लेने के लिए हैं जानता है; उनके अधर्म को क्षमा न कर न उनके पाप को अपनी दृष्टि से मिटा दे। परन्तु वे तेरे सम्मुख ठोकर खाकर गिर पड़ें; अपने क्रोध के समय तू उनसे ऐसा ही व्यवहार कर।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)