पुराना नियम · यिर्मयाह · अध्याय 17 / 52
यिर्मयाह 17
1यहूदा का पाप लोहे की शलाका से लिखा हुआ है और हीरे की नोक से उनके हृदयरूपी पटियों पर और उनकी वेदियों के सींगों पर खुदा हुआ है,
2जैसे वे अपने बच्चों को स्मरण करते हैं वैसे ही वे ऊंची पहाड़ियों पर हरे झुरमुट के समीप अपनी वेदियों और अशेरा देवियों को स्मरण करते है।
3हे मेरे पर्वत तू जो मैदान में है, मैं तेरी सारी सम्पत्ति और तेरा सारा खजाना, तेरे उस पाप के कारण जो तूने अपनी सारी सीमाओं और ऊंचे स्थानों में किए लुट जाने दूंगा।
4तू स्वयं ही उस मीरास को जिसे मैंने तुझे दिया है अपने हाथों से जाने देगा, और मैं तुझसे उस देश में जिसे तू नहीं जानता तेरे अपने ही शत्रुओं की सेवा कराऊंगा; क्योंकि तूने मेरे क्रोध की अग्नि को ऐसे भड़काया है कि वह सदा जलती रहेगी।
5यहोवा यों कहता है, ”शापित है वह व्यक्ति जो मनुष्य पर भरोसा रखता और उसे अपना सहारा बनाता है और उसका हृदय यहोवा के विरफ़द्ध हो जाता है।
6वह मरफ़भूमि में उगी झाड़ी के समान होगा और सम्पन्नता को कभी न देखने पाएगा वह जंगल में पथरीली, उजाड़ और खारी भूमि पर बसेगा।
7धन्य है वह मनुष्य जो यहोवा पर भरोसा रखता है और जिसका भरोसा यहोवा ही है।
8क्योंकि वह उस वृक्ष के समान होगा जो नदी के किनारे लगाया गया हो और जिसकी जड़ें जल तक फैली हों; जब गर्मी पड़ेगी तो उसे कुछ भय न होगा, परन्तु उसके पत्ते हरे-भरे रहेंगे; और सूखे के वर्ष में भी उसे कुछ चिन्ता न होगी और वह निरन्तर फलता रहेगा।
9मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखेबाज होता है, और असाध्य रोग से ग्रस्त है; उसे कौन समझ सकता है?
10मैं यहोवा हृदय की खोजबीन करता हूं और मन को जांचता हूं कि प्रत्येक को उसके चाल-चलन के अनुसार और उसके कार्यों के फल के अनुसार बदला दू।
11जिस प्रकार मादा तीतर उन अण्डों को सेती है, जिन्हें उसने नहीं दिए उसी प्रकार वह मनुष्य भी है जो अन्याय से धन बटोरता है और उसकी आधी आयु में ही धन छोड़ जाता है और अन्त में वह मूर्ख ही ठहरता है।”
12आदिकाल से ऊंचे स्थान पर स्थापित महिमामय सिंहासन ही हमारी आराधना का पवित्र-स्थान है।
13हे यहोवा, इस्राएल की आशा, वे सब जो तुझे त्याग देते हैं लज्जित होंगे। वे जो तुझसे दूर भटक जाते हैं उनके नाम पृथ्वी पर से मिट जाएंगे, क्योंकि उन्होंने जीवन जल के सोते यहोवा ही को त्याग दिया है।
14हे यहोवा, मुझे चंगा कर और मैं चंगा हो जाऊंगा मुझे बचा ले और मैं बच जाऊंगा, क्योंकि तू ही मेरी स्तुति है।
15देख, वे मुझसे कहते रहते हैं, “यहोवा का वचन कहां है? वह अभी पूरा हो जाए।”
16जहां तक मेरा प्रश्न है, मैने तेरे पीछे चलते हुए उतावली में चरवाहे का कार्य नहीं छोड़ा और न उस संकटमय दिन की लालसा की, तू स्वयं जानता है कि जो कुछ मैंने कहा वह तेरी ही उपस्थिति में कहा।
17तू मेरे लिए आतंक न बन, संकट के दिन तू ही मेरा शरणस्थान है।
18वे जो मुझे सताते हैं लज्जित किए जाएं, जहां तक मेरा सम्बन्ध है, मुझे लज्जित न होने दे; उन्हें निराश होने दे परन्तु मुझे नहीं; उन पर घोर विपत्ति का दिन ले आ और दुगुने विनाश से उन्हें चकनाचूर कर दे!
19यहोवा ने मुझसे इस प्रकार कहा, “जाकर सार्वजनिक फाटक पर जहां से यहूदा के राजा आते-जाते हैं साथ ही यरूशलेम के सब फाटकों पर खड़ा हो जा;
20और उनसे कह, ‘हे यहूदा के राजाओ और सब यहूदियो, हे यरूशलेम के सब निवासियो तुम जो इन फाटकों से आया करते हो, यहोवा का वचन सुनोः
21यहोवा यों कहता है, “सावधान रहो और विश्राम के दिन कोई बोझ न उठाओ, न यरूशलेम के फाटकों से कुछ भीतर ले आओ।
22तुम विश्राम के दिन अपने-अपने घर में से कोई बोझ बाहर न ले जाओ और न कोई कार्य करो, परन्तु विश्राम के दिन को पवित्र मानो, जैसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को आज्ञा दी थी।
23फिर भी उन्होंने न तो सुना और न अपना कान लगाया, परन्तु हठी बने रहे कि न तो सुनें और न ताड़ना से माने।”
24यहोवा की वाणी है,“यदि तुम ध्यान से मेरी सुनो, अर्थात् विश्राम के दिन इस नगर के फाटकों से कोई बोझ न लाओ और विश्राम दिन को पवित्र मानने के लिए कोई कार्य न करो,
25तब दाऊद के सिंहासन पर विराजमान राजा और अधिकारी रथों और घोड़ों पर सवार होकर, वे और उनके अधिकारी, यहूदा के लोग और यरूशलेम के निवासी इस नगर के फाटकों से आया-जाया करेंगे और यह नगर सदा-सर्वदा बसा रहेगा।
26और लोग यहूदा के नगरों से, यरूशलेम के आसपास से, बिन्यामीन के देश से, निचले प्रदेश से, पहाड़ी प्रदेशों से, और दक्षिण से होमबलि, मेलबलि, अन्नबलि, धूप और धन्यवाद-बलि यहोवा के भवन में लेकर आएंगे।
27परन्तु यदि तुम मेरी न सुनो और विश्राम के दिन यरूशलेम के फाटकों से कोई बोझ लाया या ले जाया करो और विश्राम दिन को पवित्र न मानो तो मैं उसके फाटकों में आग सुलगाऊंगा, और वह यरूशलेम के महलों को भस्म कर देगी और आग फिर न बुझेगी”।’”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)