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पुराना नियम · यिर्मयाह · अध्याय 8 / 52

यिर्मयाह 8

1यहोवा की वाणी, “उस समय वे लोग यहूदा के राजाओं, अधिकारियों, याजकों, नबियों और यरूशलेम वासियों की हड्डियों को कब्र से निकालेंगे।

2और वे उनको सूर्य, चन्द्रमा और आकाश के समस्त गणों के सामने फैला देंगे जिनसे उन्होंने प्रेम किया, जिनकी उन्होंने सेवा की, जिनके वे पीछे पीछे चले, जिनकी उन्होंने सेवा की और जिनको उन्होंने दण्डवत् किया। वे शव न तो इकट्ठे किए जाएंगे, न गाड़े जाएंगे; परन्तु वे भूमि पर खाद की तरह पड़े रहेंगे।

3इस दुष्ट कुल के बचे हुए लोग जो उन समस्त स्थानों में जहां से मैंने उन्हें निकाला था शेष रह जाएंगे वे जीवन की अपेक्षा मृत्यु को ही चुनना चाहेंगे,” सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है।

4“तू उनसे कहना कि यहोवा यों कहता हैः जब मनुष्य गिरते हैं तो क्या उठते नहीं? जब कोई भटक जाता है तो क्या वह लौट नहीं आता?

5तो ये यरूशलेमवासी क्यों लगातार ईश्वर-त्याग करके भटके रहते हैं? वे छल को छोड़ते नहीं और लौट आने से इनकार करते है।

6मैंने ध्यान देकर सुना, उन्होंने वह कहा जो उचित नहीं; किसी ने भी यह कहते हुए अपनी दुष्टता से पश्चात्ताप नहीं किया कि मैंने क्या किया है। युद्ध में धावा बोलने वाले घोड़े के समान हर एक अपने-अपने मार्ग पर दौड़ा जा रहा है।

7आकाश में सारस तो अपने मौसम को जानता है, और पंडुकी, सूपाबेनी व अबाबील भी अपने प्रव्रजन के समय का पालन करते है। परन्तु मेरी प्रजा तो यहोवा की विधियों को नहीं जानती।

8“तुम कैसे कह सकते हो, ‘हम बुद्धिमान हैं, और यहोवा की व्यवस्था हमारे साथ है?’ परन्तु देखो, शास्रियों की झूठी लेखनी ने उसे झूठ बना डाला है।

9बुद्धिमान मनुष्य लज्जित कर दिए गए हैं, वे हताश हो गए और पकड़े गए हैं; देखो, उन्होंने यहोवा के वचन को त्याग दिया है, और उनमें कैसी बुद्धि है?

10इस कारण मैं उनकी पत्नियों को दूसरे पुरफ़षों को और उनके खेतों को नए अधिकारियों को दे दूंगा; क्योंकि छोटे से लेकर बड़े तक, प्रत्येक व्यक्ति लालची है; नबी से लेकर याजक तक प्रत्येक व्यक्ति छल का कार्य करता है।

11और वे मेरी प्रजा की पुत्री के घाव को बाहरी रूप से यह कह कर, ‘सब ठीक है, सब ठीक है;’ चंगा करते हैं, परन्तु कुछ भी शान्ति नही।

12अपने किए हुए घृणित कार्यों के कारण क्या वे लज्जित हुए? निश्चय ही वे लज्जित नहीं हुए क्योंकि वे लज्जित होना जानते ही नहीं, इस कारण वे भी गिरने वालों के मध्य गिर पड़ेंगे और उनके दण्डित होने के समय वे भी गिरा दिए जाएंगे।” यहोवा की यह वाणी है।

13यहोवा की यह भी वाणी है, “मैं निश्चय ही सब कुछ झपट लूंगा; उनकी दाखलताओं में कोई दाख नहीं लगेंगी, न अंजीर के पेड़ों पर अंजीर लगेगा, पत्तियां मुर्झा जाएगी और जा कुछ मैंने उन्हें दिया है सब कुछ मिट जाएगा,”

14हम क्यों चुपचाप बैठे हुए हैं? आओ, हम इकट्ठे होकर, गढ़वाले नगरों में जाएं और वहां नष्ट हो जाएं, क्योंकि यहोवा हमारे परमेश्वर ने हमारा सर्वनाश किया है और हमें विषभरा जल पीने को दिया है इसलिए कि हमने यहोवा के विरफ़द्ध पाप किया है।

15हमने शान्ति की प्रतीक्षा की पर शान्ति न मिली चंगाई की आशा लगाई पर आतंक ही मिला।

16दान के प्रदेश से उसके घोड़ों का फुफकार सुनाई पड़ता है और उसके बलवन्त घोड़ोें के हिनहिनाने से सारा प्रदेश थरथरा उठा है; वे आकर सम्पूर्ण देश, तथा उसकी सम्पन्नता को नगर और उसके निवासियों सहित हड़प जाते है।

17यहोवा की वाणी है, “देखो, मैं तुम्हारे मध्य ऐसे सर्प अर्थात् नागों को भेजूंगा जिन पर कोई मंत्र नही चलेगा और वे तुम्हे डसेंगे।”

18हाय! मेरे उत्पीड़न का कोई इलाज नहीं, मेरा हृदय भीतर ही भीतर घुटा जा रहा है!

19ध्यान से सुनो! दूर देश से मेरे लोगों का रोना सुनाई दे रहा हैः “क्या यहोवा सिय्योन में नहीं? क्या उसका राजा उसमें नहीं?” “उन्होंने क्यों मुझे अपनी गढ़ी हुई प्रतिमाओं और पराई मूरतों से क्रोधित किया है?”

20“कटनी का समय बीत चुका है, ग्रीष्मकाल समाप्त हो गया है, परन्तु हमारा उद्धार नहीं हुआ है।”

21अपने लोगों के सन्ताप से मैं सन्तप्त हूं, मैं विलाप करता हूं और निराशा मुझ पर छा गई है।

22क्या गिलाद में इसका कोई मरहम नहीं? क्या वहां कोई वैघ नहीं? क्या बात है कि मेरे लोगों को चंगाई नहीं मिली?

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)