पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 15 / 42
अय्यूब 15
1तब तेमानी एलीपज ने कहा,
2“क्या यह उचित है कि बुद्धिमान व्यक्ति अज्ञानतापूर्ण उत्तर दे, और पूर्वी पवन से अपना पेट भरे?
3क्या उसे निष्फल वचनों से या व्यर्थ बातों से तर्क करना चाहिए?
4वास्तव में तू तो परमेश्वर का भय मानना छोड़ता ही है, औरों की भक्ति में भी बाधा डालता है।
5क्योंकि तेरा अधर्म तेरे मुंह को बोलने के लिए प्रेरित करता है, और तू धूर्त की भाषा बोलता है।
6मैं नहीं, पर तेरा ही मुंह तुझे दोषी ठहराता है। और तेरे ही होंठ तेरे विरुद्ध साक्षी देते है।
7“क्या सबसे पहले तू ही उत्पन्न हुआ? अथवा, क्या तू पहाड़ों से पहले बनाया गया था?
8क्या तू परमेश्वर की गुप्त सलाह सुनता है, क्या बुद्धि का ठेका तू ही ने ले रखा है?
9तू ऐसा क्या जानता है जो हम नहीं जानते? तुझमें ऐसी कौन सी समझ है जो हम में नहीं?
10हमारे बीच पके बाल वाले और पुरनिए दोनों हैं, जो तेरे पिता से भी अधिक आयु के है।
11परमेश्वर के शान्तिदायक वचन और तुझसे कहे गए कोमल वचन, क्या तेरे लिए तुच्छ हैं?
12तेरा मन तुझे क्यों बहका ले जाता है तेरी आंखों से क्रोध क्यों झलकता है,
13कि तू अपनी आत्मा को परमेश्वर के विरुद्ध करे और अपने मुख से ऐसे वचन निकलने दे?
14मनुष्य क्या है कि वह निर्दोष हो, या वह जो स्त्री से जन्मा है, कि वह धार्मिक हो?
15देख, वह अपने पवित्र जनों पर भी विश्वास नहीं करता, और आकाश भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं है,
16तो फिर मनुष्य कितना घिनौना और भ्रष्ट है, जो अधर्म को पानी के समान पीता है!
17“मैं तुझे बताऊंगा, मेरी सुन ले; जो मैंने देखा है, उसी का वर्णन करूंगा;
18वे बातें जो बुद्धिमानों ने बताई हैं, और अपने पूर्वजों से पाकर नहीं छिपाईं।
19केवल उन्हीं को देश दिया गया था, और कोई परदेशी उनके बीच आता-जाता नहीं था।
20दुष्ट मनुष्य जीवन भर पीड़ा में छटपटाता है, और क्रूर व्यक्ति के वर्ष ठहराए हुए है।
21उसके कानों में भयानक आवाज गूंजती रहती है, और शान्ति के समय भी विनाश करने वाला उस पर आ पड़ता है।
22उसे अन्धियारे में से फिर लौट आने का विश्वास नहीं, और तलवार से उसका मारा जाना निश्चित है।
23वह रोटी के लिए यह कहकर मारा-मारा फिरता है, कि ‘वह कहां मिलेगी?’ वह जानता है कि अन्धकार का दिन निकट है।
24संकट और क्लेश उसको भयभीत करते हैं, और आक्रमण के लिए तत्पर राजा के समान उस पर प्रबल होते हैं,
25क्योंकि उसने परमेश्वर के विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाया, और सर्वशक्तिमान के विरुद्ध उद्दण्डता करता है।
26वह अपनी भारी ढाल लेकर उस पर सीधे झपट पड़ता है।
27क्योंकि उसके चेहरे पर चर्बी चढ़ गई है, और मांस चढ़ने से उसकी जांघें भारी हो गई है।
28वह उजाड़ नगरों में बस चुका है, वरन् ऐसे घरों में जो रहने योग्य नहीं, जिसका खंडहर हो जाना निश्चित है।
29वह धनवान् नहीं होगा, और न उसकी सम्पत्ति बनी रहेगी, उसके अनाज की बालें भूमि तक नहीं झुकेंगी।
30वह अन्धियारे से बचने नहीं पाएगा, लपट उसकी टहनियों को झुलसा देगी, और परमेश्वर के मुंह के श्वास से वह उड़ जाएगा।
31वह खोखलेपन पर भरोसा करके अपने आपको धोखा न दे, क्योंकि उसके बदले में खोखलापन ही मिलेगा।
32यह उसके नियत समय से पहले पूरा हो जाएगा, और उसकी डाली हरी न रहेगी।
33दाखलता के कच्चे फल के समान उसके फल गिर जाएंगे, और जैतून के समान उसके फूल झड़ जाएंगे।
34विधर्मियों की मंडली तो निष्फल रहती है, और घूसखोर के तम्बुओं को अग्नि भस्म कर देती है।
35वे उत्पात का गर्भ धारण करते और अधर्म को जन्म देते हैं, और उनके पेट में धोखाधड़ी पलती है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)