पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 24 / 42
अय्यूब 24
1“सर्वशक्तिमान् ने न्याय का समय निश्चित क्यों नहीं किया, और जो उसको जानते हैं वे उसके दिन क्यों देखने नहीं पाते?
2कुछ लोग भूमि-सीमा सरका देते, वे भेड़-बकरियों को छीन कर हड़प जाते है।
3वे अनाथों के गदहे हांक ले जाते, वे विधवा का बैल बन्धक रखते है।
4वे दरिद्रों को मार्ग से ढकेल देते हैं; देश के कंगालों को छिप जाना ही पड़ता है।
5देखो, जैसे जंगली गदहे जंगल में वैसे ही वे अपने भोजन की खोज में भटकते फिरते हैं जंगल से ही उनके बाल-बच्चों को रोटी मिलती है।
6वे खेत में अपना चारा काटते, और दुष्ट की बारी में बचे हुए दाख बटोरते है।
7वे तो नंगे और निर्वस्त्र रहकर रात बिताते हैं, और शीत से बचने को उनके पास कोई ओढ़ना नहीं होता।
8वे पहाड़ों पर की वर्षा से भीग जाते हैं, और शरण के अभाव में चट्टान से लिपट जाते है।
9कुछ लोग अनाथ बच्चे को छाती से छीन लेते, और कंगाल से बन्धक लेते हैं,
10जिससे इन्हें निर्वस्त्र नंगे फिरना पड़ता है, और वे भूखे से पूले भी छीन लेते है।
11वे दूसरों के आंगनों में तेल पेरते, और कुंडों में दाख रौंदते, पर स्वयं प्यासे रह जाते है।
12नगरों में से लोग कराहते, और घायलों के प्राण पुकार उठते हैं, फिर भी परमेश्वर मूर्खता पर ध्यान नहीं देता।
13“फिर अन्य लोग प्रकाश से विद्रोह करते हैं; वे न तो उसका मार्ग जानना चाहते, न ही उसके पथों पर बने रहना चाहते है।
14हत्यारा पौ फटते ही उठता है; वह दीन-दरिद्र की हत्या करता, और रात को चोर के समान रहता है।
15व्यभिचारी की आंखे संध्या की प्रतीक्षा करती है। वह सोचता है किसी की दृष्टि मुझ पर न पड़ेगी, वह अपना रूप बदल लेता है।
16कुछ लोग अन्धियारे में घरों में सेंध लगाते, और दिन को छिपे रहते हैं; उजियाले को वे जानते भी नही।
17इन्हें भोर का प्रकाश घोर अन्धकार- सा जान पड़ता है, क्योंकि वे घोर अन्धकार से निकट सम्बन्ध रखते है।
18“वे जल की सतह पर हल्की वस्तु के समान है। पृथ्वी पर उनका भाग शापित है, वे दाख की बारियों के मार्ग पर जाते भी नही।
19जैसे अनावृष्टि और गर्मी से हिम का जल, वैसे ही अधोलोक में पापी सूख जाते है।
20माता भी उसे भूल जाती है, कीड़े उसे चाव से खाते है। भविष्य में उसका स्मरण न रहेगा, और वृक्ष के समान दुष्टता काट डाली जाएगी।
21वह बांझ को, हानि पहुंचाता है, और विधवा की कुछ भी भलाई नहीं करता।
22परन्तु परमेश्वर अपने सामर्थ्य से शूरवीरों को घसीट ले जाता है; वे उठते हैं पर जीवन का भरोसा किसी को नही।
23वह उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है और उन्हें सहारा मिल जाता है; और उसकी आंखें उनके मार्गों पर लगी रहती है।
24वे थोड़े समय के लिए बढ़ते तो हैं, फिर लुप्त हो जाते हैं; वे गिराए जाते, और हर वस्तु के समान बटोर लिए जाते हैं और अनाज की बालों के समान काट लिए जाते हैं
25यदि यह ऐसा नहीं तो, कौन मुझे झूठा प्रमाणित करेगा? कोैन मेरी बातें निकम्मी ठहराएगा?”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)