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नया नियम · यूहन्ना · अध्याय 5 / 21

यूहन्ना 5

1इन बातों के पश्चात् यीशु यहूदियों के एक पर्व में यरूशलेम गया।

2यरूशलेम में भेड़ फाटक के पास एक कुण्ड है, जो इब्रानी में बैतहसदा कहलाता है, जिसके पांच ओसारे है।

3इनमें बहुत-से ऐसे लोग पड़े रहते थे जो बीमार, अंधे, लंगड़े व सूखे अंग वाले थे।

4ये जल के हिलने की प्रतीक्षा करते थे, क्योंकि प्रभु का एक स्वर्गदूत किसी निशिचत समय पर कुण्ड में उतर कर जल को हिलाता था। जल के हिलते ही जो भी उसमें पहले उतर जाता था, वह चाहे किसी रोग से पीड़ित क्यों न हो, चंगा हो जाता था।

5वहाँ एक मनुष्य था जो अड़तीस वर्ष से बीमार था।

6जब यीशु ने उसे वहाँ पड़ा हुआ देखा और जाना कि वह वहाँ उस दशा में बहुत दिनों से पड़ा है, तो उसने उससे पूछा, “क्या तू चंगा होना चाहता है?”

7बीमार ने उसे उत्तर दिया, “महोदय मेरे पास कोई मनुष्य नहीं जो मुझे जल के हिलाए जाते ही कुण्ड में उतारे। जब मैं उतरने को होता हूँ तो दूसरा मुझसे पहले उतर जाता है।”

8यीशु ने उससे कहा, “उठ, अपना बिछौना उठा, और चल-फिर।”

9वह मनुष्य तुरन्त चंगा हो गया, और अपना बिछौना उठाकर चलने लगा। उस दिन सब्त का दिन था।

10अतः यहूदी उससे जो चंगा हुआ था कह रहे थे, “आज सब्त है, अतः बिछौना उठाना तेरे लिए उचित नहीं है।”

11परन्तु उसने उन्हें उत्तर दिया, “जिसने मुझे चंगा किया उसी ने मुझसे कहा, ‘अपना बिछौना उठा और चल-फिर’?”

12उन्होंने उससे पूछा, “वह कौन मनुष्य है जिसने तुझसे कहा, ‘अपना बिछौना उठा और चल-फिर’।”

13परन्तु जो चंगा हो गया था, नहीं जानता था कि वह कौन है, क्योंकि वहां भीड़ होने के कारण यीशु उस स्थान से चुपचाप चला गया था।

14इसके पश्चात् यीशु ने उसे मन्दिर में पाकर उससे कहा, “देख, तू स्वस्थ हो गया है, फिर कभी पाप न करना, ऐसा न हो कि इससे भी कोई भारी विपत्ति तुझ पर आ पड़े।”

15उस व्यक्ति ने आकर यहूदियों को बताया कि वह यीशु था जिसने मुझे चंगा किया।

16इस कारण यहूदी लोग यीशु को सताने लगे, क्योंकि वह इन कामों को सब्त के दिन करता था।

17परन्तु उसने उन्हें उत्तर दिया, “मेरा पिता अब तक काम करता है, और मैं स्वयं भी काम करता हूँ।”

18इस बात के कारण यहूदी उसे मार डालने की और भी अधिक खोज में रहने लगे, क्योंकि वह न केवल सब्त के दिन की विधि को तोड़ रहा था वरन् परमेश्वर को अपना पिता कह कर अपने आप को परमेश्वर के बराबर ठहरा रहा था।

19इसलिए यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ कि पुत्र स्वयं कुछ नहंी कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जो कुछ पिता करता है, उन्हीं कामों को पुत्र भी ठीक उसी रीति से करता है।

20क्योंकि पिता पुत्र से प्रेम करता है, और वह उन सब कामों को उसे दिखाता है जिन्हें वह स्वयं करता है, और वह इनसे भी कहीं बड़े कामों को उसे दिखाएगा जिससे कि तुम आशचर्य करो।

21क्योंकि जिस प्रकार पिता मृतकों को जिला उठाता है और उन्हें जीवन प्रदान करता है, उसी प्रकार पुत्र भी जिसे चाहता है, जीवन प्रदान करता है।

22क्योंकि पिता भी किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु उसने न्याय करने का सारा कार्य पुत्र को सौंप दिया है,

23कि सब लोग पुत्र का वैसा ही आदर करें जैसा पिता का आदर करते है। जो पुत्र का आदर नहीं करता वह पिता का भी आदर नहीं करता जिसने उसे भेजा।

24मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले पर विश्वास करता है, अनन्तजीवन उसका है, और उसपर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, पर मृत्यु से पार होकर वह जीवन में प्रवेश कर चुका है।

25मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, वह समय आ रहा है, और अब है, जबकि मृतक लोग परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएंगे।

26क्योंकि जिस प्रकार पिता स्वयं अपने में जीवन रखता है, उसी प्रकार उसने पुत्र को भी स्वयं में जीवन रखने का अधिकार दिया है,

27और उसने उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, क्योंकि वह मनुष्य का पुत्र है।

28इस पर आशचर्य न करो, क्योंकि समय आ रहा है जब कि वे सब जो क़ब्रों में हैं उसकी आवाज़ सुनकर, निकल आएँगे,

29जिन्होंने सुकर्म किए हैं जीवन के पुनरुत्थान के लिए, जिन्होंने कुकर्म किए हैं दण्ड के पुनरुत्थान के लिए।

30“मैं स्वयं अपनी ओर से कुछ नहीं कर सकता। जैसा सुनता हूँ, वैसा न्याय करता हूँ, और मेरा न्याय सच्चा है, क्योंकि मैं अपनी नहीं, वरन् अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूँ।

31यदि मैं केवल अपने विषय में साक्षी दूँ, तो मेरी साक्षी सत्य नही।

32मेरे विषय में साक्षी देने वाला एक और है, और मैं जानता हूँ कि जो साक्षी वह मेरे विषय में देता है वह सत्य है।

33तुमने यूहन्ना से पुछवाया और उसने सत्य की साक्षी दी है।

34परन्तु मैं अपने विषय में मनुष्य की साक्षी नहीं चाहता, पर ये बातें मैं इसलिए कहता हूँ, कि तुम्हें उद्धार प्राप्त हो।

35वह तो जलता एवं चमकता दीपक था और तुम्हें उसकी ज्योति में कुछ समय तक आनन्द मनाना अच्छा लगा।

36परन्तु जो साक्षी मेरी है वह यूहन्ना की साक्षी से बढ़कर है, क्योंकि पिता ने जिन कार्यों को पूर्ण करने के लिए मुझे सौंपा है अर्थात् वे कार्य जो मैं करता हूँ, वे ही मेरे विषय में साक्षी देते हैं कि पिता ने मुझे भेजा है।

37पिता जिसने मुझे भेजा, उसी ने मेरे विषय में साक्षी दी है। तुमने न तो उसका शब्द कभी सुना है और न उसका रूप देखा है।

38और उसका वचन तुममें बना नहीं रहता, क्योंकि जिसे उसने भेजा है, तुम उसका विश्वास नहीं करते।

39तुम पवित्रशास्त्रें में ढूँढ़ते हो क्योंकि तुम सोचते हो कि उनमें अनन्तजीवन मिलता है; और ये वे हैं; जो मेरे विषय में साक्षी देते हैं,

40और तुम मेरे पास आना नहीं चाहते कि जीवन पाओ।

41मैं मनुष्यों से बड़ाई ग्रहण नहीं करता,

42परन्तु मैं तुम्हें जानता हूँ कि तुममें परमेश्वर का प्रेम नही।

43मैं अपने पिता के नाम से आया हूँ और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते। यदि कोई अन्य अपने ही नाम से आए तो तुम उसे ग्रहण करोगे।

44तुम कैसे विश्वास कर सकते हो जबकि तुम एक दूसरे से आदर चाहते हो, और वह आदर जो उस एक और एकमात्र परमेश्वर की ओर से है पाना नहीं चाहते।

45यह न सोचो कि पिता के सम्मुख मैं तुम्हें दोषी ठहराऊंगा; तुम्हें दोषी ठहराने वाला तो मूसा है, जिस पर तुमने आशा रखी है।

46क्योंकि यदि तुम मूसा का विश्वास करते, तो मेरा भी विश्वास करते; इसलिए कि उसने मेरे विषय में लिखा है।

47परन्तु यदि तुम उसके लेखों पर विश्वास नहीं करते तो मेरे वचनों पर कैसे विश्वास करोगे?”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)