नया नियम · यूहन्ना · अध्याय 6 / 21
यूहन्ना 6
1इन बातों के पश्चात् यीशु गलील सागर अर्थात् तिबिरियास झील के उस पार चला गया।
2और एक विशाल भीड़ उसके पीछे चल रही थी, क्योंकि वे उन आश्चर्यकर्मोंं को देखते थे जिन्हें वह बीमारों पर करता था।
3यीशु पहाड़ पर चढ़कर अपने शिज्यों के पास बैठ गया।
4यहूदियों का पर्व फसह निकट था।
5जब यीशु ने अपनी आँखें उठाकर एक विशाल भीड़ को अपने पास आते हुए देखा, तो फिलिप्पुस से पूछा, “इनके भोजन के लिए हम कहां से रोटी मोल लें?”
6वह उसे परखने के लिए यह कह रहा था, क्योंकि स्वयं वह जानता था कि वह क्या करने को था।
7फिलिप्पुस ने उत्तर दिया, “दो सौ दीनार की भी रोटियाँ उनके लिए पर्याप्त न होंगी कि प्रत्येक को थोड़ी-थोड़ी मिल सके।”
8उसके चेलों में से एक अर्थात् शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा,
9“यहां एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटियाँ और दो मछलियां हैं, परन्तु इतने लोगों के लिए वे क्या हैं?”
10यीशु ने कहा, “लोगों को बैठा दो।” उस स्थान पर बहुत घास थी। इसलिए पुरुष, जो गिनती में लगभग पांच हजार थे, बैठ गए।
11तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके, उन्हें जो बैठे थे बांट दीं; उसी तरह मछलियों को भी जितनी वे चाहते थे बांट दी।
12जब वे तृप्त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, “बचे हुए टुकड़ों को बटोर लो कि कुछ भी नष्ट न हो।”
13इसलिए उन्होंने उसे बटोरा और जौ की पांच रोटियों के टुकड़ों से, जो खाने वालों से बच गए थे, बारह टोकरियाँ भरी।
14जब लोगों ने उस आशचर्यकर्म को जिसे उसने किया था देखा तो उन्होंने कहा, “सचमुच यहीं वह नबी है जो जगत में आने वाला था।”
15इसलिए यीशु यह जानकर कि वे उसे बलपूर्वक राजा बनाने के लिए ले जाना चाहते हैं, फिर पहाड़ पर अकेला चला गया।
16जब संध्या हुई, तो उसके चेले झील के किनारे गए,
17और नाव पर चढ़ने के पश्चात् वे कफरनहूूम को जाने के लिए झील पार करने लगे। अंधेरा हो चुका था और यीशु अभी तक उनके पास नहीं आया था।
18तेज़ आंधी चलने के कारण झील में लहरें उठने लगी।
19जब वे पांच या छः किलोमीटर तक खेते चले गए, तो उन्होंने यीशु को झील पर चलते और नाव के समीप आते हुए देखा, और वे डर गए।
20परन्तु उसने उनसे कहा, “मैं हूँ, डरो मत।”
21अतः वे उसे नाव में चढ़ा लेने को तैयार हुए और तुरन्त नाव उस स्थान पर जा पहुँची जहां वे जा रहे थे।
22दूसरे दिन उस भीड़ ने जो झील के उस पार रह गई थी यह देखा कि एक को छोड़ और कोई छोटी नाव वहाँ न थी, और यह भी कि यीशु चेलों के साथ उस नाव पर नहीं चढ़ा था, परन्तु केवल चेले ही उस पार गए थे।
23तब तिबिरियास से दूसरी छोटी नावें उस स्थान के निकट आईं जहां उन्होंने प्रभु के धन्यवाद देने के पश्चात् रोटी खाई थी।
24इसलिए जब भीड़ ने देखा कि वहां यीशु नहीं है, और न ही उसके चेले, तो वे स्वयं छोटी-छोटी नावों पर चढ़ गए और यीशु को ढूँढते हुए कफरनहूम आ पहुँचे।
25जब उन्होंने उसे झील के दूसरी ओर पाया, तो उससे कहा, “रब्बी, तू यहां कब आया?”
26यीशु ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा, “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, तुम मुझे इसलिए नहीं ढूँढते कि तुमने चिह्न देखे, परन्तु इसलिए कि तुमने रोटियाँ खाईं और तृप्त हुए।
27उस भोजन के लिए परिश्रम न करो जो नशवर है, परन्तु उस भोजन के लिए जो अनन्त जीवन तक बना रहता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता अर्थात् परमेश्वर ने उसी पर अपनी छाप लगाई है।”
28इसलिए उन्होंने उससे कहा, “परमेश्वर के कार्य कर पाने के लिए हम क्या करें?”
29यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, “परमेश्वर का कार्य यह है कि जिसे उसने भेजा है तुम उसपर विश्वास करो।”
30इसलिए उन्होंने उससे कहा, “तो फिर कौन-सा चिह्न तू दिखाता है कि हम उसे देखकर तुझपर विश्वास करें? तू कौन-सा कार्य करता है?
31हमारे पूर्वजों ने जंगल में मन्ना खाया, जैसा लिखा है, ‘उसने उन्हें खाने के लिए स्वर्ग से रोटी दी’।”
32इसलिए यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, मूसा ने तुम्हें वह रोटी स्वर्ग से नहीं दी, परन्तु वह मेरा पिता है जो स्वर्ग से तुम्हें सच्ची रोटी देता है।
33क्योंकि परमेश्वर की रोटी वह है जो स्वर्ग से उतरती है, और जगत को जीवन देती है।“
34इसलिए उन्होंने उससे कहा, “प्रभु, यह रोटी हमें सर्वदा दिया कर।”
35यीशु ने उनसे कहा, “जीवन की रोटी मैं हूँ; जो मेरे पास आता है, भूखा न होगा, और वह जो मुझ पर विश्वास करता है, कभी प्यासा न होगा।
36परन्तु मैंने तुमसे कहा था कि तुमने मुझे देख लिया है परन्तु फिर भी विश्वास नहीं करते।
37वह सब जो पिता मुझे देता है, मेरे पास आएगा, और जो कोई मेरे पास आएगा मैं निशचत रूप से उसे न निकालूँगा।
38क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से उतरा हूँ।
39जिसने मुझे भेजा उसकी इच्छा यह है, कि वह सब जो उसने मुझे दिया है, उसमें से कुछ भी न खोऊँ, परन्तु अन्तिम दिन उसे जिला उठाऊँ।
40क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है कि प्रत्येक जो पुत्र को देखता है, और उसपर विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन पाए, और मैं स्वयं अन्तिम दिन उसे जिला उठाऊंगा।”
41इसलिए यहूदी उस पर कुड़कुड़ाने लगे, क्योंकि उसने कहा, “वह रोटी जो स्वर्ग से उतरी, मैं हूँ।”
42और वे कहने लगे, “क्या यह यूसुफ का पुत्र यीशु नहीं, जिसके माता-पिता को हम जानते हैं? अब वह कैसे कहता है कि ‘मैं स्वर्ग से उतरा हूँ’?”
43यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, “आपस में मत कुड़कुड़ाओ।
44मेरे पास कोई नहीं आ सकता, जब तक पिता जिसने मुझे भेजा उसे अपने पास खींच न ले; और मैं अन्तिम दिन उसे जिला उठाऊंगा।
45नबियों के लेखों में यह लिखा है, ‘और वे सब परमेश्वर की ओर से सिखाए हुए होंगे।’ हर एक जिसने पिता से सुना और सीखा है वह मेरे पास आता है।
46यह नहीं कि किसी ने पिता को देखा है, परन्तु जो परमेश्वर की ओर से है, केवल उसी ने पिता को देखा है।
47मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि जो विश्वास करता है, अनन्तजीवन उसी का है।
48जीवन की रोटी मैं हूँ।
49तुम्हारे पूर्वजों ने जंगल में मन्ना खाया, और वे मर गए।
50यह वह रोटी है जो स्वर्ग से उतरती है कि कोई उसमें से खाए और न मरे।
51वह जीवित रोटी जो स्वर्ग से उतरी, मैं हूँ। यदि कोई इस रोटी में से खाए तो वह सर्वदा जीवित रहेगा; और जो रोटी मैं जगत के जीवन के लिए दूँगा वह मेरा मांस है।”
52इस पर यहूदी आपस में यह कह कर विवाद करने लगे, “यह मनुष्य हमें अपना मांस खाने को कैसे दे सकता है?”
53यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ और उसका लहू न पियो, तुममें जीवन नही।
54जो मेरा मांस खाता और मेरा लहू पीता है, अनन्तजीवन उसका है, और मैं अन्तिम दिन उसे जिला उठाऊँगा।
55क्योंकि मेरा मांस तो वास्तविक भोजन है और मेरा लहू वास्तविक पीने की वस्तु है।
56जो मेरा मांस खाता और मेरा लहू पीता है, वह मुझमें बना रहता है और मैं उसमे।
57जिस प्रकार जीवित पिता ने मुझे भेजा, और मैं पिता के कारण जीवित हूँ, उसी प्रकार वह भी जो मुझे खाता है मेरे कारण जीवित रहेगा।
58यही वह रोटी है जो स्वर्ग से उतरी है-वैसी नहीं जो पूर्वजों ने खाई और मर गए-इस रोटी को जो खाता है वह सर्वदा जीवित रहेगा।”
59उसने ये बातें कफरनहूम के आराधनालय में शिक्षा देते समय कही।
60इसलिए उसके चेलों में से बहुतों ने जब यह सुना तो कहा, “यह तो एक कठोर कथन है; इसे कौन सुन सकता है?”
61परन्तु यीशु ने यह जानकर कि उसके चेले इसपर कुड़कुड़ा रहे हैं, उनसे कहा, “क्या तुम्हें इससे ठोकर लगती है?
62यदि तुम मनुष्य के पुत्र को ऊपर जाते देखो जहां वह पहले था, तो क्या करोेगे?
63आत्मा ही है जो जीवन देता है, शरीर से कुछ लाभ नही। जो वचन मैंने तुमसे कहे हैं, वे आत्मा और जीवन है।
64परन्तु तुममें से कुछ हैं जो विश्वास नहीं करते।” क्योंकि यीशु आरम्भ से जानता था कि विश्वास न करने वाले कौन है, और वह कौन है, जो उसे पकड़वाएगा।
65और उसने कहा, “इसीलिए मैंने तुमसे कहा है कि कोई मेरे पास नहीं आ सकता, जब तक कि यह पिता की ओर से न हो।”
66इसके परिणाम-स्वरूप उसके शिज्यों में से बहुत-से वापस चले गए और फिर उसके साथ न चले।
67इसलिए यीशु ने उन बारहों से कहा, “क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?”
68शमौन पतरस ने उसे उत्तर दिया, “प्रभु, हम किसके पास जाएं? अनन्त जीवन के वचन तो तेरे पास है।
69हमने विश्वास किया है और जान लिया है कि परमेश्वर का पवित्र जन तू ही है।”
70यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या स्वयं मैंने तुम बारहों को नहीं चुना? परन्तु फिर भी तुममें से एक शैतान है।”
71उसका अर्थ शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदा से था, क्योंकि उन बारहों में से वही एक उसे पकड़वाने को था।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)