पुराना नियम · न्यायियों · अध्याय 16 / 21
न्यायियों 16
1तब शिमशोन गाज़ा को गया और वहां एक वेश्या को देखकर उसके पास गया।
2जब गािज़यों को इसका समाचार मिला, “शिमशोन यहां आया है” तो उन्होंने उस स्थान को घेर लिया और रात भर नगर के फाटक पर उसकी घात में लगे रहे। और यह कहकर रात भर चुपचाप रहे, “आओ, हम भोर तक ठहरें फिर उसे घात करेंगे।”
3परन्तु शिमशोन ने आधी रात तक पड़े रहने के बाद उठकर नगर के फाटक के दोनों पल्लों और दोनों बाजुओं को पकड़ कर बेड़ों समेत उखाड़ लिया और उन्हें अपने कंधों पर रखकर उस पहाड़ की चोटी पर ले गया जो हेब्रोन के सामने है।
4इसके बाद वह सोरेक की घाटी में रहने वाली एक स्त्री से प्रेम करने लगा जिसका नाम दलीला था।
5तब पलिश्तियों के सरदार उस स्त्री के पास गए और उन्होंने उससे कहा, “उसे फुसला कर पूछ ले कि उसके महाबल का भेद क्या है और उसे यातना देने के लिए हम कैसे उसे वश में कर सकते है। तब हम में से हर एक तुझे चांदी के ग्यारह सौ सिक्के देगा।”
6अतः दलीला ने शिमशोन ने उसे से कहा, “कृपा कर के मुझे बता कि तेरे महाबल का भेद क्या है और किस प्रकार तुझे वश में कर के यातना दी जा सकती है?”
7और शिमशोन ने उसे से कहा, “यदि वे मुझे ऐसी सात नई तांतों से बांधें जो सुखाई न गई हों तो मैं बलहीन होकर साधारण मनुष्य के समान हो जाऊँगा।”
8तब पलिश्तियों के सरदार उस स्त्री के पास ऐसी सात नई तांते ले आए जो सुखाई नहीं गई थीं और उसने उसे उनसे बांध दिया।
9उसके पास कुछ लोग भीतर की कोठरी में घात लगाए बैठे थे। और उसने उससे कहा, “शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” परन्तु उसने उन तांतों को ऐसे तोड़ दिया जैसे सन का धागा आग छूते ही टूट जाता है। अतः उसकी शक्ति का भेद न खुला।
10तब दलीला ने शिमशोन से कहा, “देख, तू ने मुझ से छल किया और झूठ कहा है, अब कृपा करके बता कि तू कैेसे बँध सकता है।”
11और उसने स्त्री से कहा, “यदि वे मुझे ऐसी नई रस्सियों से कस कर बांधें जो कभी काम में न लाई गई हों तो मैं बलहीन होकर साधारण मनुष्य के समान हो जाऊँगा।”
12तब दलीला ने नई रस्सियां लेकर उसे उनसे बांधा और उससे कहा, “शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” क्योंकि लोग भीतर की कोठरी में उसकी घात लगाए बैठे थे। परन्तु उसने अपनी भुजाओं पर की रस्सियों को धागे के समान तोड़ दिया।
13तब दलील ने शिमशोन से कहा, “अब तक तू ने मुझे धोखा दिया और मुझ से झूठ कहा है; मुझे बता कि तू कैसे बांधा जा सकता है?” और उसने उस स्त्री से कहा, “यदि तू मेरे सिर पर की सातों लटों को ताने में बुने और उसे एक खूँटी से बांधे तो मैं बलहीन होकर साधारण मनुष्य के समान हो जाऊँगा।”
14अतः जब वह सो रहा था तो दलीला ने उसके सिर की सातों लटों को ताने में बुना।ह् और उसने उसे एक खूँटी से जकड़ दिया और उससे कहा, “शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” तब उसने नींद से उठकर बल्ली के खूँटे को ताने के साथ उखाड़ दिया।
15तब उस स्त्री ने उससे कहा, “तू कैसे कह सकता है, ‘मैं तुझ से प्यार करता हूँ,’ जबकि तेरा मन मुझ से नहीं लगा है! तू ने इन तीनों बार मुझे धोखा दिया है और अपने महाबल का भेद मुझे नहीं बताया।”
16फिर ऐसा हुआ कि उसने प्रतिदिन बातें करते हुए उससे इतना आग्रह किया कि उसके नाक में दम आ गया।
17तब जो कुछ उसके मन में था उसने उस स्त्री से कहा दिया, “मेरे सिर पर उस्तरा कभी नहीं फिरा है क्योंकि मैं अपनी माता के गर्भ ही से परमेश्वर का नाज़ीर हूँ। यदि मेरा सिर मुड़ा दिया जाए तो मेरा बल जाता रहेगा और मैं बलहीन होकर साधारण मनुष्य-सा हो जाऊँगा।”
18जब दलीला ने देखा कि उसने अपने मन का भेद मुझ से कह दिया है तो उसने पलिश्तियों के सरदारों के पास कहला भेजा, “एक बार फिर आओ, क्योंकि उसने अपने मन का सब भेद मुझे बता दिया है। तब पलिश्तियों के सरदार अपने हाथों में रुपये लिए हुए उसके पास आए।
19उस स्त्री ने उसे अपने घुटनों पर सुला दिया और एक मनुष्य को बुलवाकर उसके सिर की सातों लटें मुड़वा डाली। तब वह उसको सताने लगी क्योंकि उसका बल जाता रहा।
20तब उसने कहा, “हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” तब उसने नींद से जाग कर कहा, “मैं पहले की तरह बाहर जाकर झटकूँगा और स्वतन्त्र हो जाऊँगा। परन्तु वह न जानता था कि यहोवा उसके पास से चला गया है।
21तब पलिश्तियों ने उसे पकड़कर उसकी आंखें निकाल डालीं फिर वे उसे गाज़ा को ले गए और उसे पीतल की ज़ंजीरों से जकड़ दिया। और बन्दीगृह में वह चक्की पीसने लगा।
22फिर भी उसके सिर के बाल मूड़े जाने के बाद फिर बढ़ने लगे।
23तब पलिश्तियों के सरदार अपने देवता दागोन के लिए एक बड़ा बलिदान चढ़ाने और आनन्द मनाने के लिए एकत्रित हुए क्योंकि उन्होंने कहा, “हमारे देवता ने हमारे शत्रु शिमशोन को हमारे हाथ में कर दिया है।”
24जब लोगों ने उसे देखा तो अपने देवता की बड़ाई की और कहा, “हमारे देवता ने हमारे शत्रु को और हमारे देश के नाश करने वाले को जिसने हम में से बहुतों को मार भी डाला, हमारे हाथों में कर दिया है।
25और ऐसा हुआ कि जब वे बहुत मग्न हो गए तो उन्होंने कहा, “शिमशोन को बुलाओ कि वह हमारा मनोरंजन करे।” अतः उन्होंने बन्दीगृह से शिमशोन को बुलाया और वह उनका मनोरंजन करने लगा। और उन्होंने उसे खम्भों के बीच में खड़ा कर दिया।
26तब शिमशोन ने उस लड़के से जो उसका हाथ पकड़े हुए था, कहा, “मुझे उन खम्भों को छूने दे जिन पर यह घर सम्भला हुआ है जिससे कि मैं उन पर टिक सकूँ।”
27वह घर तो स्त्री-पुरुषों से भरा हुआ था और पलिश्तियों के सब सरदार वहां पर थे। और छत पर से लगभग तीन हज़ार स्त्री-पुरुष शिमशोन को तमाशा करते हुए देख रहे थे।
28तब शिमशोन ने यहोवा को पुकार कर कहा, “हे यहोवा परमेश्वर, मेरी सुधि ले और इस बार मुझे बल दे कि हे परमेश्वर मैं पलिश्तियों से अपनी दोनों आंखों का बदला एक ही बार में ले सकू।”
29तब शिमशोन ने बीच के उन दोनों खम्भों को जिन पर घर सम्भला हुआ था एक को दाहिने हाथ से और दूसरे को बाएं हाथ से पकड़ कर ढकेला।
30तब शिमशोन ने कहा, “पलिश्तियों के साथ मैं भी मरूं!” और उसने मुड़कर अपना सम्पूर्ण बल लगा दिया जिससे कि वह घर सब सरदारों और उन लोगों पर गिर गया जो उसमें थे। अतः जिनको उसने मरते समय मार डाला वे उन से अधिक थे जिनको उसने अपने जीवनकाल में मारा था।
31तब उसके भाई और उसके पिता के घराने के सब लोग आए और उसे उठाकर ले गए और उसे सोरा और एशताओल के मध्य उसके पिता मानोह की क़ब्र में मिट्टी दी। इस प्रकार उसने बीस वर्ष तक इस्राएल का न्याय किया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)