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नया नियम · लूका · अध्याय 1 / 24

लूका 1

1बहुत-से लोगों ने उन बातों का विवरण लिखने का कार्य अपने हाथों में लिया जो हमारे बीच में घटित हुई हैं-

2ठीक वही बातें जो हमें उन लोगों से प्राप्त हुईं हैं, जिन्होंने इन बातों को प्रारम्भ से ही देखा था और जो वचन के सेवक थे।

3इसलिए, हे अति मान्यवर थियोफिलुस, आरम्भ से इन सब बातों को सावधानी से और ठीक-ठीक जांचने के पश्चात्, मुझे यह उचित जान पड़ा कि मैं भी इनको तेरे लिए क्रमानुसार लिखूं

4जिससे कि तू उन बातों की वास्तविकता को जान ले जिनकी तुझे शिक्षा दी गई है।

5यहूदियों के राजा हेरोदेस के राज्यकाल में जकरयाह नाम का एक याजक था जो अबिय्याह के दल का था और उसकी पत्नी का नाम इलीशिबा था जो हारून के वंश की थी।

6वे दोनों परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी थे और उनका आचरण प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों के अनुसार निर्दोष था।

7उनकी कोई सन्तान न थी, क्योंकि इलीशिबा बांझ थी और दोनों ही बूढ़े हो गए थे।

8ऐसा हुआ कि जब वह अपने दल की बारी आने पर परमेश्वर के सम्मुख याजक का कार्य कर रहा था,

9तो याजकों की रीति के अनुसार वह चिट्ठी डालकर चुन लिया गया कि प्रभु के मन्दिर में प्रवेश करके धूप जलाए।

10धूप जलाने के समय सारा जनसमूह बाहर प्रार्थना कर रहा था

11और उसे धूप की वेदी की दाहिनी ओर प्रभु का एक दूत खड़ा दिखाई दिया।

12उसे देखकर जकरयाह घबरा गया और भय ने उसे जकड़ लिया।

13पर स्वर्गदूत ने उससे कहा, “हे जकरयाह, भयभीत न हो, क्योंकि तेरी प्रार्थना सुन ली गई है; तेरी पत्नी इलीशिबा से तेरे लिए एक पुत्र उत्पन्न होगा और तू उसका नाम यूहन्ना रखना।

14तुझे आनन्द और हर्ष होगा, और उसके जन्म पर बहुत-से लोग आनन्द मनाएंगे,

15क्योंकि प्रभु की दृष्टि में वह महान् होगा; वह दाखरस और मदिरा नहीं पीएगा, और अपनी माता के गर्भ से ही पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जाएगा।

16वह इस्राएल की सन्तानों में से बहुतों को उनके प्रभु परमेश्वर की ओर लौटा ले आएगा।

17और वह उसके आगे-आगे एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य में होकर चलेगा, कि पिताओं का हृदय बाल-बच्चों की ओर फेर दे, और आज्ञा न मानने वालों को धर्मियों की समझ पर ले आए, जिससे कि वह प्रभु के लिए एक योग्य प्रजा तैयार करे।”

18जकरयाह ने स्वर्गदूत से पूछा, “मैं इसे निशिचत रूप से कैसे जान सकता हूँ? क्योंकि मैं तो बूढ़ा हूँ और मेरी पत्नी भी बूढ़ी हो गई है।”

19स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, “मैं जिब्राइल हूँ जो परमेश्वर के सामने खड़ा रहता हूँ। मुझे इसलिए भेजा गया है कि मैं तुझसे बातें करूं और तुझे यह सुसन्देश सुनाऊ।

20देख, जिस दिन तक ये बातें पूरी न हो जाएं तू गूंगा रहेगा और बोल न सकेगा, क्योंकि तूने मेरी बातों पर विश्वास नहीं किया जो ठीक समय पर पूरी होंगी।”

21लोग जकरयाह की प्रतीक्षा कर रहे थे, और उन्हें आशचर्य हो रहा था कि उसे मन्दिर में इतनी देर क्यों लग रही है?

22परन्तु जब वह बाहर आया तो उनसे बोल न सका, और वे जान गए कि उसको मन्दिर में कोई दर्शन मिला है, और वह संकेत करता रहा और गूंगा बना रहा।

23और ऐसा हुआ कि जब उसके याजकीय सेवा के दिन पूरे हुए तो वह अपने घर लौटा।

24इन दिनों के पश्चात् उसकी पत्नी इलीशिबा गर्भवती हुई और उसने यह कहकर अपने आप को पांच महीने तक छिपाए रखाः

25“इन दिनों में मुझ पर कृपा-दृष्टि करके, मनुष्यों में मेरे अपमान को दूर करने के लिए ही प्रभु ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया है।”

26छठे महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत नासरत नामक गलील के नगर में,

27एक कुँवारी के पास भेजा गया जिसकी मंगनी यूसुफ नामक एक पुरुष से हुई थी जो दाऊद के वंश का था, और उस कुँवारी का नाम मरियम था।

28और भीतर आकर स्वर्गदूत ने उससे कहा, “हे प्रभु की कृपापात्री, सलाम! प्रभु तेरे साथ है।”

29इस कथन को सुनकर वह अत्यन्त घबरा गई और सोच में पड़ गई कि यह किस प्रकार का अभिवादन हो सकता है।

30तब स्वर्गदूत ने उससे कहा, “हे मरियम, भयभीत न हो! क्योंकि तुझपर परमेश्वर का अनुग्रह हुआ है।

31देख, तू गर्भवती होगी और एक पुत्र को जन्म देगी, और तू उसका नाम यीशु रखना।

32वह महान् होगा, और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा। प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उसे देगा,

33और वह याकूब के घराने पर अनन्तकाल तक राज्य करेगा, और उसके राज्य का अन्त न होगा।”

34मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, “यह कैसे हो सकता है, क्योंकि मैं तो कुँवारी ही हूँ?

35स्वर्गदूत ने उससे कहा, “पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा और परमप्रधान का सामर्थ्य तुझपर आच्छादित होगा। इसी कारण वह पवित्र जो उत्पन्न होगा, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

36देख, तेरी कुटुम्बिनी इलीशिबा से भी इस बुढ़ापे में एक पुत्र होने वाला है और यह उसका, जो बांझ कहलाती थी, छठा महीना है।

37क्योंकि परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।”

38मरियम ने कहा, “देख, मैं तो प्रभु की दासी हूँ। तेरे वचन के अनुसार ही मेरे साथ हो।” तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

39तब उन्हीं दिनों में मरियम उठकर शीघ्रता से पहाड़ी प्रदेश में यहूदा के एक नगर में गई,

40और जकरयाह के घर में प्रवेश करके उसने इलीशिबा को नमस्कार किया।

41ऐसा हुआ कि ज्यों ही इलीशिबा ने मरियम का नमस्कार सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और इलीशिबा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हुईं।

42उसने ऊंची आवाज में पुकारकर कहा, “तू स्त्रियों में धन्य है, और तेरे गर्भ का फल भी धन्य है!

43मुझ पर यह अनुग्रह कैसे हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आई?

44देख, ज्यों ही तेरे नमस्कार का शब्द मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द से उछल पड़ा।

45धन्य है वह स्त्री जिसने विश्वास किया कि जो कुछ प्रभु ने उससे कहा है वह पूरा होगा।”

46तब मरियम ने कहा, “मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है,

47और मेरी आत्मा मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर में आनन्दित हुई है,

48क्योंकि उसने अपनी दासी की दीन-हीन दशा पर कृपा-दृष्टि की है। इसलिए देखो, अब से लेकर युग-युगान्तर की पीढ़ियाँ मुझे धन्य कहेंगी।

49क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मेरे लिए महान् कार्य किए हैं, और उसका नाम पवित्र है।

50और उसकी दया पीढ़ी-पीढ़ी तक उन पर जो उससे डरते हैं बनी रहती है।

51उसने अपने भुजबल से सामर्थ्य के कार्य किए हैं; और उनको तितर-बितर कर दिया जो अपने हृदय की भावनाओं में अहंकारी थे।

52उसने राजाओं को सिंहासन से गिरा दिया, और दीनों को महान् कर दिया।

53उसने भूखों को तो अच्छी-अच्छी वस्तुओं से तृप्त कर दिया और धनवानोें को खाली हाथ निकाल दिया।

54जैसा कि उसने हमारे पूर्वजों से कहा वैसा ही उसने सदा इब्राहीम तथा उसके वंश के प्रति अपनी दया को स्मरण करके अपने सेवक इस्राएल की सहायता की। ̧

55जैसा कि उसने हमारे पूर्वजों से कहा वैसा ही उसने सदा इब्राहीम तथा उसके वंश के प्रति अपनी दया को स्मरण करके अपने सेवक इस्राएल की सहायता की।”

56मरियम उसके साथ तीन महीने रहकर अपने घर लौट आईं।

57तब इलीशिबा का प्रसव-काल पूरा हुआ और उसने एक पुत्र को जन्म दिया।

58उसके पड़ोसियों और सम्बन्धियों ने जब यह सुना कि प्रभु ने उसपर अपनी बड़ी कृपा की है तो उन्होंने उसके साथ आनन्द मनाया।

59और ऐसा हुआ कि वे लोग आठवें दिन बालक का ख़तना कराने आए और उसके पिता के नाम पर वे उसका नाम भी जकरयाह रखने लगे।

60इस पर उसकी माता ने कहा, “नहीं! उसका नाम यूहन्ना रखा जाएगा।”

61तब उन्होंने उससे कहा, “तुम्हारे सम्बन्धियों में से किसी का भी यह नाम नहीं!”

62उन्होंने उसके पिता से संकेत करके पूछा कि तू उसका नाम क्या रखना चाहता है?

63उसने लिखने की तख्ती मंगाकर उसपर लिखा, “उसका नाम यूहन्ना है,” और सबको आशचर्य हुआ।

64तुरन्त उसका मुंह और उसकी जीभ खुल गई और वह परमेश्वर की स्तुति करता हुआ बोलने लगा।

65इसपर पास-पड़ोस में रहने वालों पर भय छा गया तथा यहूदिया के समस्त पहाड़ी प्रदेश में इन सब बातों की चर्चा होने लगी।

66जिन्होेंने इन बातों को सुना उन सबने अपने-अपने मन में विचार करके कहा, “यह बालक कैसा होगा?” क्योंकि अवश्य ही प्रभु का हाथ उस पर था।

67और उसका पिता जकरयाह पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गया और यह कहकर भविष्यद्वाणी करने लगाः

68“इस्राएल का प्रभु परमेश्वर धन्य हो, क्योंकि उसने हमारी सुधि ली है और अपने लोगों के छुटकारे का कार्य पूरा किया है।

69और हमारे लिए अपने सेवक दाऊद के घराने में उद्धार का एक सींग निकाला है,

70जैसा कि उसने प्राचीनकाल से अपने पवित्र नबियों के मुंह से कहलवाया था,

71कि हमारे शत्रुओं से और हमसे बैर रखने वालों के हाथों से हमारा उद्धार हो,

72कि हमारे पूर्वजों पर दया करे और अपनी पवित्र वाचा का स्मरण करे,

73अर्थात् वह शपथ जो उसने हमारे पिता इब्राहीम से खाई थी

74कि हमें यह वर दे कि हम अपने शत्रुओं के हाथों से छुड़ाए जाकर निर्भयता से

75अपने जीवन भर पवित्रता और धार्मिकता सहित उसकी सेवा करे।

76और तू, हे बालक, परमप्रधान का नबी कहलाएगा, क्योंकि तू प्रभु के आगे-आगे चलेगा कि उसका मार्ग तैयार करे।

77और उसके लोगों को उनके पापों की क्षमा के द्वारा उद्धार का ज्ञान दे।

78हमारे परमेश्वर की अपार करुणा के कारण हमपर ऊपर से सूर्याेदय का प्रकाश चमकेगा,

79अर्थात् उनपर जो अन्धकार और मृत्यु की छाया में बैठे हैं, कि हमारे पैरों की अगुवाई शान्ति के मार्ग पर करे।”

80और वह बालक बढ़ता और आत्मा में बलवन्त होता गया और इस्राएल पर प्रकट होने के दिन तक निर्जन स्थान में रहा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)