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नया नियम · मरकुस · अध्याय 12 / 16

मरकुस 12

1फिर वह उनसे दृष्टान्तों में कहने लगाः “एक मनुष्य ने दाख-उघान लगाया, और बाड़ा लगाकर उसे घेरा, और दाख के कोल्हू के नीचे एक रस-कुण्ड खोदा, और एक मचान बनाया, और किसानों को ठेका देकर यात्रा पर चला गया।

2फसल के मौसम में उसने एक दास को किसानों के पास भेजा कि उन किसानों से दाख-उघान की कुछ फसल प्राप्त करे।

3पर उन्होंने उसे पकड़कर पीटा और उसे खाली हाथ लौटा दिया।

4उसने उनके पास फिर एक दास को भेजा, और उन्होंने उसका सिर फोड़ दिया और उसका अपमान किया।

5फिर उसने एक और को भेजा, और उन्होंने उसे मार डाला; और इसी प्रकार अन्य बहुतों को भी, कुछ को पीटा और कुछ को मार डाला।

6अब भेजने को उसके पास एक और रह गया, अर्थात् उसका प्रिय पुत्र। यह सोचकर उसने अन्त में उसे भी भेजा कि ‘वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे।’

7परन्तु उन किसानों ने आपस में कहा, ‘यही तो उत्तराधिकारी है; आओ, हम इसे मार डालें, तब सम्पत्ति हमारी हो जाएगी।’

8और उन्होंने उसे पकड़कर मार डाला और दाख-उघान के बाहर फेंक दिया।

9इसलिए दाख के उघान का स्वामी क्या करेगा? वह आकर किसानों को नाश करेगा और दाख-उघान दूसरों को दे देगा।

10क्या तुमने पवित्रशास्त्र का यह वचन नहीं पढ़ाः ‘जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने ठुकरा दिया था, वही कोने का प्रमुख पत्थर बना;

11यह प्रभु की ओर से हुआ और हमारी दृष्टि में अद्भुत है’?”

12वे उसे पकड़ना चाहते थे, फिर भी लोगों से डरते थे, क्योंकि वे समझ गए थे कि उसने यह दृष्टान्त हमारे विरोध में कहा है। इसलिए वे उसे छोड़कर चले गए।

13उन्होंने कुछ फरीसियों और हेरोदियों को उसके पास भेजा कि उसी की बातों में उसे फँसाएं

14और उन्होंने आकर उससे कहा, “हे गुरु, हम जानते हैं कि तू सच्चा है और तू किसी के प्रभाव में नही आता। तू तो किसी का पक्षपात नहीं करता, परन्तु परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है। कैसर को कर चुकाना उचित है या नहीं?

15हम कर चुकाएं या न चुकाएं?” परन्तु उसने उनके पाखण्ड को भांपकर उनसे कहा, “तुम मुझे क्यों परखते हो? एक दीनार मेरे पास लाओ कि मैं उसे देखू।”

16वे दीनार लाए, और उसने उनसे कहा, “इस पर किसकी आकृति व लेख हैं?” उन्होंने कहा “कैसर के।”

17और यीशु ने उनसे कहा, “जो कैसर का है वह कैसर को दो, और जो परमेश्वर का है वह परमेश्वर को दो।” और वे चकित हुए।

18फिर कुछ सदूकी-जो यह कहते हैं कि पुनरुत्थान है ही नहीं-उसके पास आकर पूछने लगे,

19“गुरु, हमारे लिए मूसा ने एक व्यवस्था लिखी है कि यदि किसी का भाई निःसन्तान मर जाए, और अपने पीछे पत्नी को छोड़ जाए तो उसका भाई उसकी पत्नी को ब्याह ले और अपने भाई के लिए सन्तान उत्पन्न करे।

20सात भाई थे। पहला भाई विवाह करके निःसन्तान मर गया।

21तब दूसरे भाई ने उस स्त्री से विवाह किया और बिना सन्तान मर गया, और तीसरे ने भी ऐसा ही किया।

22और सातों से कोई सन्तान न हुई। अन्त में वह स्त्री भी मर गई

23पुनरुत्थान होने पर जब वे जीवित हो उठेंगे तो वह किसकी पत्नी होगी? क्योंकि वह सातों की पत्नी रह चुकी थी।”

24यीशु ने उनसे कहा, “क्या तुम इस कारण भूल में नहीं पड़े हो कि तुम न तो पवित्रशास्त्र को समझते हो और न ही परमेश्वर के सामर्थ्य को?

25क्योंकि जब लोग मृृतकों में से जी उठते हैं तो वे न विवाह करते और न ही विवाह में दिए जाते हैं, वरन् वे स्वर्ग में दूतों के समान होते है।

26और इस तथ्य के विजय में कि मृतक पुनः जी उठते हैं, क्या तुमने मूसा की पुस्तक में जलती हुई झाड़ी का वर्णन नहीं पढ़ा कि परमेश्वर ने किस प्रकार उससे कहा, ‘मैं इब्राहीम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूँ’?

27वह मृतकों का नहीं, परन्तु जीवितों का परमेश्वर है। तुम बड़ी भूल में पड़े हो।”

28शास्त्रियों में से एक ने आकर उन्हें वाद-विवाद करते सुना, और यह जानकर कि उसने कैसे सुन्दर ढंग से उन्हें उत्तर दिया है, उससे पूछा, “सबसे प्रमुख आज्ञा कौन-सी है?”

29यीशु ने उत्तर दिया, “प्रमुख आज्ञा यह हैः ‘हे इस्राएल, सुन, प्रभु हमारा परमेश्वर एक ही प्रभु है,

30और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करना।’

31और दूसरी यह है, ‘तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना।’ इनसे बढ़कर कोई और आज्ञा नही।”

32शास्त्री ने उससे कहा, “हे गुरु, बिल्कुल ठीक, तूने सच ही कहा कि वह एक ही है; और उसको छोड़ कोई दूसरा नहीे;

33और उससे सारे हृदय, सारी बुद्धि, और सारी शक्ति से प्रेम करना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना, सारे होमबलि और बलिदानों से बढ़कर है।”

34जब यीशु ने देखा कि उसने समझदारी से उत्तर दिया है, तो उससे कहा, “तू परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं,” इसके बाद किसी को उससे कुछ पूछने का साहस न हुआ।

35यीशु मन्दिर में उपदेश दे रहा था तो उसने कहा, “शास्त्री कैसे कहते हैं कि मसीह दाऊद का पुत्र है?

36क्योंकि दाऊद ने स्वयं पवित्र आत्मा में होकर कहा है, “प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, “मेरे दाहिने बैठ जब तक कि मैं तेरे शत्रुओं को तेरे चरणों की चौकी न बना दूं”।’

37दाऊद स्वयं उसे ‘प्रभु’ कहता है; अतः वह उसका पुत्र कैसे हुआ?” विशाल जनसमूह बड़े आनन्द से उसकी सुन रहा था।

38और वह अपने उपदेश में कह रहा था, “शास्त्रियों से सावधान रहो, जो लम्बे चोगे पहनकर घूमना और बाजारों में आदर-सत्कार

39तथा आराधनालयों में प्रमुख आसन और भोजों में सम्मानित स्थान पाना पसन्द करते है।

40ये ही वे हैं जो विधवाओं के घरों को निगल जाते हैं, और दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करते है। ये भारी दण्ड पाएंगे।”

41वह मन्दिर के खजाने के सामने बैठ गया और देखने लगा कि लोग किस प्रकार मन्दिर के कोज में पैसे डाल रहे थे; और बहुत-से धनवान बड़ी-बड़ी रकम डाल रहे थे।

42इतने में एक कंगाल विधवा ने आकर तांबे के दो छोटे-छोटे सिक्के डाले जिनका मूल्य लगभग एक पैसे के बराबर होता है।

43तब यीशु ने अपने चेलों को पास बुलाकर उनसे कहा, “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, कि कोज में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है;

44क्योंकि अन्य सबने अपनी अधिकता में से डाला है, परन्तु इसने अपनी दरिद्रता में से जो कुछ उसका था अर्थात् अपनी सारी जीविका डाल दी है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)