पुराना नियम · नहेमायाह · अध्याय 2 / 13
नहेमायाह 2
1और ऐसा हुआ कि राजा अर्तक्षत्र के बीसवें वर्ष के नीसान महीने में जब उसके सामने दाखमधु था, तब मैंने दाखमधु उठाकर राजा को दिया। इससे पहले मैं कभी उसके सामने उदास नहीं हुआ था।
2इसलिए राजा ने मुझसे पूछा, “तू तो बीमार नहीं है, फिर तेरा मुंह क्यों उतरा है? यह तो मन की ही उदासी होगी।” तब मैं अत्यन्त डर गया।
3मैंने राजा से कहा, “राजा सदैव जीवित रहे। जब वह नगर जिसमें मेरे पूर्वजों की कब्रें हैं, उजाड़ पड़ा है और उसके नगर-द्वार आग से जला दिए गए हैं, तो मेरा मुहं क्यों न उतरे?”
4तब राजा ने मुझसे कहा, “तू क्या मांगता है?” तब मैंने स्वर्ग के परमेश्वर से प्रार्थना की
5और राजा से कहा, “यदि राजा को यह अच्छा लगे और तू अपने दास से प्रसन्न हो तो मुझे यहूदा और मेरे पूर्वजों की कब्रों के नगर को भेज, कि मैं उसका पुनर्निर्माण करू।”
6तब राजा ने, जिसके पास रानी भी बैठी थी, मुझसे पूछा, “तेरी यात्रा कितने दिन की होगी, और तू कब लौटकर आएगा?” अतः राजा मुझे भेजने के लिए प्रसन्न हुआ। और मैंने एक नियत समय बताया।
7फिर मैंने राजा से कहा, “यदि राजा को अच्छा लगे तो महानद के उस पार के प्रान्तों के राज्यपालों के लिए मुझे इस आशय की चिट्ठियां दी जाएं कि जब तक मैं यहूदा न पहुंचूं, वे मुझे अपने-अपने देश में से होकर जाने दे।
8और राजकीय वन के रक्षक आसाप के लिए भी इस आशय का पत्र मुझे दिया जाए कि वह मुझे मन्दिर के पास किले के फाटकों की कड़ियां बनाने के लिए, शहरपनाह के लिए, और उस घर के लिए जिसमें मैं रहूंगा, लकड़ी दे।” राजा ने मेरी विनती स्वीकार कर ली, क्योंकि मेरे परमेश्वर की कृपादृष्टि मुझ पर थी।
9तब मैंने महानद के पार वाले प्रान्तों के राज्यपालों के पास जाकर उनको राजा के पत्र दिए। राजा ने मेरे साथ सेनापति और घुड़सवार भी भेजे थे।
10और जब होरोनी सम्बल्लत और तोबिय्याह नामक अम्मोनी कर्मचारी ने सुना कि कोई व्यक्ति इस्राएलियों की भलाई करने की इच्छा से आया है, तो उनको बहुत बुरा लगा।
11मैं यरूशलेम पहुंच कर वहां तीन दिन रहा।
12तब मैंने रात्रि में उठकर, कुछ पुरुषों को अपने साथ लिया। मैंने किसी को नहीं बताया कि मेरे परमेश्वर ने यरूशलेम के लिए मेरे मन में क्या बात डाली है। और मेरी सवारी के पशु को छोड़ मेरे संग कोई दूसरा पशु नही था।
13मैं रात को तराई-फाटक में से होकर अजगर कुएं की ओर, फिर कूड़ा-फाटक तक गया, और यरूशलेम की टूटी हुई शहरपनाह और आग से जलाए गए फाटकों का निरीक्षण करता रहा।
14तब मैं सोते के फाटक से होता हुआ राजा के कुंड तक गया, परन्तु वहां मेरी सवारी के पशु के निकलने के लिए स्थान नहीं था।
15इसीलिए मैं रात के समय घाटी से होकर यरूशलेम की शहरपनाह का निरीक्षण करता गया। फिर तराई-फाटक से लौट आया।
16और अधिकारियों को नहीं मालूम था कि मैं कहां गया था और मैंने क्या किया और न मैंने यहूदियों, याजकों, रईसों, अधिकारियों और दूसरे काम करने वालों को ही अब तक कुछ बताया था।
17तब मैंने उनसे कहा, “तुम तो देखते हो कि हम कैसी दुर्दशा में पड़े हैं, कि यरूशलेम उजाड़ पड़ा है और उसके फाटक आग से जले हुए है। आओ, हम यरूशलेम की शहरपनाह को फिर से बनाएं कि हमारी और अधिक निन्दा न हो।”
18फिर मैंने उनको बताया कि मेरे परमेश्वर की कृपादृष्टि मुझ पर कैसे बनी रही और यह भी कि राजा ने मुझसे क्या-क्या बातें कहीं थी। तब उन्होंने कहा, “आओ, हम बनाने लगे।” इस प्रकार उन्होंने इस अच्छे कार्य में हाथ लगाया।
19परन्तु जब होरोनी सम्बल्लत, तोबिय्याह नामक अम्मोनी कर्मचारी, और गेशेम नामक अरबी ने यह सुना तो वे हमें ठट्ठों में उड़ाने और हमें तुच्छ जानकर कहने लगे, “तुम यह क्या कर रहे हो? क्या तुम राजा से विद्रोह करोेगे?”
20तब मैंने उनको उत्तर दिया, “स्वर्ग का परमेश्वर हमारा कार्य सफल करेगा, इसलिए हम जो उसके दास हैं निर्माण कार्य में जुट जाएंगे, परन्तु यरूशलेम में तुम्हारा न तो कोई भाग, न अधिकार और न स्मारक ही है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)