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पुराना नियम · नहेमायाह · अध्याय 5 / 13

नहेमायाह 5

1तब लोगों और उनकी पत्नियों की ओर से उनके यहूदी भाइयों के विरुद्ध बड़ी चिल्लाहट मची।

2क्योंकि कुछ लोग कहते थे, “हम तथा हमारे पुत्र-पुत्रियां, बहुत जन हैं, इसलिए हमें अनाज मिलना चाहिए कि हम उसे खाकर जीवित रहे।”

3कुछ कहते थे, “हम अकाल के कारण अपने खेतों, दाख की बारियों और घरों को बन्धक रखते हैं कि हमें अनाज मिले।”

4और कुछ अन्य कहते थे, “राजा को कर चुकाने के लिए हमने खेतों और दाख की बारियों पर रुपया उधार लिया है।

5परन्तु हमारा और हमारे भाइयों का शरीर एक समान है, हमारे और उनके बच्चे एक समान है। फिर भी देखो, हम अपने पुत्र और पुत्रियों को दास बनने के लिए बाध्य कर रहे हैं, और हमारी कुछ पुत्रियां तो दासी बन ही चुकी हैं, पर हम असहाय हैं, क्योंकि हमारे खेत और दाख की बारियां दूसरों की हो गई है।”

6उनकी ये बातें और चिल्लाहट सुनकर मुझे बहुत क्रोध आया।

7तब मैंने अपने मन में विचार किया और रईसों और अधिकारियों को धमका कर कहा, “तुम अपने-अपने भाई से ब्याज लेते हो।” इसलिए मैंने उनके विरुद्ध एक बड़ी सभा बुलाई,

8और मैंने उनसे कहा, “हमने तो अपने सामर्थ्य के अनुसार यहूदी भाइयों को, जो अन्य जातियों के हाथ बिक गए थे, छुड़ाया है। अब क्या तुम अपने ही भाइयों को बेचोगे कि वे हमारे हाथों में बिकें?” तब वे चुप हो गए और एक शब्द भी न बोल सके।

9मैंने फिर कहा, “जो काम तुम कर रहे हो वह अच्छा नहीं है। क्या उस निन्दा के कारण जो हमारे अन्य जाति शत्रु करते हैं, तुम्हें परमेश्वर का भय मानकर नहीं चलना चाहिए?

10और उसी प्रकार मैं, मेरे भाई और मेरे सेवक उनको रुपया और अनाज दे रहे है। आओ, हम ब्याज लेना छोड़ दे।

11आज ही उन्हें उनके खेत, उनके दाख और जेैतून की बारियां, और घर लौटा दो, और जो रुपया, अनाज, नया दाखमधु और तेल तुम उनसे वसूल करते हो, उसका सौंवा भाग उनको लौटा दो।”

12तब उन्होंने कहा, “हम उनको लौटा देंगे और उनसे कुछ न लेंगे। हम ठीक वैसा ही करेंगे जैसा तू कहता है।” तब मैंने याजकों को बुलाया और उन्हें उनकी इस प्रतिज्ञा के अनुसार कार्य करने की शपथ दिलाई।

13मैंने अपने वस्त्र के सामने के छोर को झाड़कर कहा, “इसी प्रकार परमेश्वर प्रत्येक उस मनुष्य को, जो अपनी इस प्रतिज्ञा को पूरा न करे, उसके घर और उसकी सम्पत्ति से झाड़े और इस प्रकार वह झाड़ा जाए और निकाल दिया जाए।” तब सारी सभा ने कहा, “आमीन।” और उन्होंने यहोवा की स्तुति की। तब लोगों ने अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार कार्य किया।

14जिस दिन से मैं यहूदा के देश का राज्यपाल नियुक्त हुआ, अर्थात् अर्तक्षत्र राजा के बीसवें वर्ष से लेकर उसके बत्तीसवें वर्ष तक अर्थात् बारह वर्ष तक न तो मैंने और न ही मेरे सम्बन्धियों ने राज्यपाल के अधिकार का अन्न खाया।

15परन्तु जो राज्यपाल मुझसे पहले थे, वे प्रजा पर भार डालते थे और उनसे रोटी और दाखमधु और इसके अतिरिक्त चालीस शेकेल चांदी लेते थे, और उनके कर्मचारी भी प्रजा पर अधिकार जताते थे। परन्तु मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि मैं परमेश्वर का भय मानता हू।

16और मैं भी शहरपनाह के कार्य में लग गया। हमने कोई भूमि नहीं खरीदी, और मेरे सब सेवक कार्य करने के लिए वहां इकट्ठे रहते थे।

17फिर, उन लोगों के अतिरिक्त जो चारों ओर के देशों से हमारे पास आए थे, एक सौ पचास यहूदी और अधिकारी मेरी मेज पर खाया करते थे।

18प्रतिदिन के लिए जो भोजन तैयार किया जाता था उसमें एक बैल और छः उत्तम भेड़ें थी। मेरे लिए चिड़ियां भी तैयार की जाती थीं, और दस दिन में एक बार हर प्रकार का दाखमधु भी बहुतायत से उपलब्ध होता था। इतना सब होने पर भी मैंने राज्यपाल के अधिकार का अन्न वसूल नहीं किया, क्योंकि प्रजा पर अत्यधिक भार था।

19हे मेरे परमेश्वर, जो कुछ मैंने इस प्रजा के लिए किया है उसके अनुसार तू मुझे स्मरण रख और मेरा भला कर।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)