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पुराना नियम · नहेमायाह · अध्याय 9 / 13

नहेमायाह 9

1अब इसी महीने के चौबीसवें दिन को इस्राएली उपवास के साथ, टाट पहने, और अपने ऊपर धूल डाले हुए एकत्रित हुए।

2और इस्राएल के वंशजों ने अपने आपको सब अन्य जातियों से अलग कर लिया और खड़े होकर अपने पापों और अपने पूर्वजों के अधर्म के कार्यों का अंगीकार किया।

3अपनी जगह पर खड़े-खड़े उन्होंने दिन के एक पहर तक यहोवा अपने परमेश्वर की व्यवस्था में से पढ़ा और दूसरे पहर में वे अपने पापों का अंगीकार करते और यहोवा अपने परमेश्वर की आराधना करते रहे।

4अब येशू, बानी, कदमीएल, शबन्याह, बुन्नी, शेरेब्याह, बानी और कनानी ने लेवियों के मंच पर खड़े होकर ऊंचे स्वर से अपने परमेश्वर यहोवा को पुकारा।

5तब येशू, कदमीएल, बानी, हशब्नयाह, शेहेब्याह, होदियाह, शबन्याह, पत“याह नामक लेवियों ने कहा, “आओ, अपने परमेश्वर यहोवा को अनादिकाल से अनन्तकाल तक धन्य कहो। हे प्रभु, तेरा ही महिमायुक्त नाम धन्य माना जाए और सब धन्यवाद और स्तुति से ऊंचा किया जाए।

6तू ही यहोवा हैः तूने ही स्वर्ग, वरन् सब से ऊंचे स्वर्ग आैर उसके समस्त तारागण, पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, समुद्र और जो कुछ उसमें है, सबको बनाया। तू ही उन सभों को जीवन देता है, और स्वर्ग की समस्त सेना तेरे सामने झुकती है।

7तू ही यहोवा परमेश्वर है, जिसने अब्राम को चुनकर कसदियों के ऊर नगर में से बाहर निकाला और उसे इब्राहीम नाम दिया।

8और तूने उसके हृदय को अपने प्रति विश्वासयोग्य पाया और तूने उससे कनानियों, हित्तयों, एमोरियों, परिज्जियों यबूसियों और गिर्गाशियों का देश उसको और उसके वंशजों को देने की वाचा बांधी, और तूने अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण भी किया, क्योंकि तू धर्मी है।

9“तूने मिस्र में हमारे पूर्वजों के दुख पर दृष्टि की, और लालसमुद्र के तट पर उनकी दुहाई सुनी।

10तब तूने फि़रौन, उसके सब कर्मचारियों और उसके देश के सब लोगों के विरुद्ध चि“न और आश्चर्यकर्म दिखाए क्योंकि तू जानता था कि उन्होंने इनके साथ धृष्टता का व्यवहार किया है, और तूने अपना नाम ऐसा प्रतिष्ठित किया जैसा आज तक है।

11और तूने उनके सामने समुद्र को दो भागों में कर दिया जिससे वे समुद्र के बीच सूखी भूमि पर चल कर पार हो गए, और उनका पीछा करने वालों को तूने गहरे स्थानों में ऐसे डाल दिया जैसे एक पत्थर समुद्र की भयंकर लहरों में डाला जाए।

12और तूने दिन को बादल के खम्भे में और रात्रि में आग के खम्भे में होकर उनकी अगुवाई की, कि उस मार्ग को प्रकाशित करे जिस पर उन्हें चलना था।

13तब तू सीनै पर्वत पर उतर आया और तूने उनसे स्वर्ग में से बातें की। तूने उनको उचित नियम, सच्ची व्यवस्था, भली विधियां और आज्ञाएं दी।

14तब तूने उन्हें अपने पवित्र विश्राम दिन के विषय में बताया और उनके लिए अपने दास मूसा के द्वारा आज्ञाएं, विधियां और व्यवस्था दी।

15तूने उनकी भूख मिटाने के लिए आकाश से उन्हें भोजन दिया। और तूने उनकी प्यास बुझाने के लिए चट्टान में से पानी बहाया। और उनको आज्ञा दी कि जिस देश को तूने उन्हें देने की शपथ खाई थी वे उसे अपने अधिकार में लेने के लिए उसमें प्रवेश करे।

16“परन्तु उन्होंने, अर्थात् हमारे पूर्वजों ने धृष्टता की। उन्होंने हठीले होकर तेरी आज्ञाएं नहीं मानीं,

17और उन्होंने सुनने से इनकार किया, और जो आश्चर्यकर्म तूने उनके बीच किए थे उनका स्मरण न किया। उन्होंने हठीले बनकर एक अगुवे को नियुक्त किया कि मिस्र के दासत्व में लौट जाए। परन्तु तू क्षमा करने वाला, अनुग्रहकारी, दयालु, विलम्ब से कोप करने वाला, और अति करुणामय परमश्ेवर है, और तूने उनको त्याग नहीं दिया।

18जब उन्होंने अपने लिए धातु ढालकर बछड़ा बना लिया और कहा, ‘यह तेरा परमेश्वर है जो तुझे मिस्र से निकाल ले आया है’ और तेरी अत्यधिक निन्दा की।

19फिर भीे तूने अपनी महान् करुणा के कारण उनको जंगल में त्याग नहीं दिया। न तो दिन को अगुवाई करने वाला बादल का खम्भा उनसे दूर हुआ, और न रात को प्रकाश देने वाला और पथ-प्रदर्शित करने वाला आग का खम्भ उन पर से हटा

20और तूने उन्हें समझाने के लिए अपना भला आत्मा दिया। तूने उन्हें अपना मन्ना खिलाना बन्द नहीं किया और उनकी प्यास बुझाने के लिए पानी देता रहा,

21यहां तक कि चालीस वर्ष तक तूने जंगल में उनका ऐसा पालन-पोषण किया कि उनको किसी भी वस्तु का अभाव नहीं हुआ। न तो उनके वस्त्र पुराने हुए और न ही उनके पैर सूजे।

22तूने अनेक राज्यों और जातियों को उनके वश में कर दिया और उनकी सीमा निर्धारित करके उनमें बांट दिया और उन्होंने हेशबोन के राजा सीहोन और बाशान के राजा ओग के देशों को अपने अधिकार में ले लिया।

23और तू उनकी सन्तान को आकाश के तारागण के समान अनगिनत बनाकर उन्हें उस देश में ले आया जिसके विषय में तूने उनके पूर्वजों से कहा था कि वे उसमें प्रवेश करके उसे अपने अधिकार में कर ले।

24अतः उनकी सन्तान ने प्रवेश करके देश को अपने अधिकार में कर लिया, और तूने उनके सामने उस देश के निवासी अर्थात् कनानियाें को दबाया। और तूने उनके राजाओं के साथ देश के लोगों को इनके हाथ में कर दिया कि ये उनसे जो चाहें सो करे।

25और उन्होंने गढ़वाले नगरों और उपजाऊ भूमि पर अपना अधिकार किया। उन्होंने हर प्रकार की अच्छी वस्तु से भरपूर घरों को, खुदे हुए हौदों को, दाख और जैतून की बारियों को और बहुत-से फलदार वृक्षों को अपने अधिकार में ले लिया। इस प्रकार वे खाकर तृप्त हुए और हृष्ट-पुष्ट हो गए। वे तेरी बड़ी भलाई के कारण सुख भोगते रहे।

26“परन्तु उन्होंने अनाज्ञाकारी बनकर तेरे विरुद्ध बलवा किया। तेरी व्यवस्था को उन्होंने पीठ के पीछे फेंक दिया, और तेरे उन नबियों को मार डाला जो उन्हें तेरी और फिरने के लिए चिताते थे, और उन्होंने तेरा अत्यधिक तिरस्कार किया।

27इसलिए तूने उन्हें उनके शत्रुओं के हाथ में कर दिया जिन्होंने उन पर अत्याचार किया, परन्तु जब उन्होंने अपने संकट के समय तेरी दुहाई दी तब तूने स्वर्ग से उनकी सुनी और अपनी महान् करुणा के अनुसार तू उनको छुड़ाने वाले देता रहा जो उन्हें उनके शत्रुओं से छुड़ाते रहे।

28परन्तु जैसे ही उनको विश्राम मिलता था वे फिर से तेरे समक्ष बुराई करने लगते थे, इसलिए तू उन्हें शत्रुओं के वश में कर देता था कि शत्रु उनके ऊपर प्रभुता करे। जब वे फिर तेरी दुहाई देते तो तू स्वर्ग से उनकी सुनकर अपनी करुणा के अनुसार उन्हें बार-बार छुड़ाता था।

29और उनको चिताता था कि उन्हें अपनी व्यवस्था की ओर फेर लाए, फिर भी वे ढिठाई करते रहे और तेरी आज्ञाओं की अनसुनी करते रहे। वे तेरे उन नियमों के विरुद्ध पाप करते रहे जिनको यदि कोई मनुष्य माने तो उनके द्वारा जीवित रहेगा, वे हठीला कन्धा फेरते और अपनी गर्दन सख़्त करते और नहीं सुनते थे।

30फिर भी, तू वर्षों तक उनकी सहता रहा और अपने आत्मा से नबियों के द्वारा उन्हें चिताता रहा, पर उन्होंने न सुना, इसलिए तूने उन्हें देश-देश के लोगों के हाथ में कर दिया।

31फिर भी अपनी महान् करुणा के कारण तूने उनका अन्त नहीं किया और न उनको त्यागा, क्योंकि तू अनुग्रहकारी और करुणामय परमेश्वर है।

32“इसलिए अब हे हमारे अति महान्, पराक्रमी और भययोग्य परमेश्वर, जो अपनी वाचा का पालन करता और करुणा करता रहा है, जो बड़ा कष्ट अश्शूर के राजाओं के दिनों से लेकर आज के दिन तक हमें, हमारे राजाओं हमारे उच्चाधिकारियों, हमारे याजकों, हमारे नबियों, हमारे पूर्वजों और तेरी समस्त प्रजा को भोगना पड़ा है, वह तेरी दृष्टि में महत्त्वहीन न ठहरे।

33फिर भी जो कुछ हम पर बीता है उसमें तू तो धर्मी रहा है, क्योंकि तूने तो सच्चाई के परन्तु हमने दुष्टता के कार्य किए है।

34क्योंकि हमारे राजाओं, हमारे अगुवों, हमारे याजकों और हमारे पूर्वजों ने तेरी व्यवस्था का पालन नहीं किया और न तेरी आज्ञाओं और चितौनियों की ओर ध्यान दिया जो तूने उन्हें दी थी।

35परन्तु उन्होंने अपने ही राज्य में, उस बड़ी भलाई को जो तू ने उन पर की और तेरे दिए हुए इस विस्तृत और उपजाऊ देश को पाकर भी तेरी सेवा नहीं की, और न वे अपने बुरे कामों से फिरे।

36देख, आजकल हम दास है। हां, इसी देश में दास हैं जिसे तूने हमारे पूर्वजों को दिया था कि इसकी उत्तम उपज में से खाए।

37और इसकी उपज की भरपूरी उन राजाओं के लिए है जिन्हें तूने हमारे पापों के कारण हमारे ऊपर ठहराया है। वे हमारे शरीरों और हमारे पशुओं पर अपनी इच्छा के अनुसार प्रभुता करते हैं, इसलिए हम बड़े संकट में पड़े है।

38“इन सब बातों के कारण अब हम लिखकर वाचा बांधते हैं और इस दस्तावेज पर हमारे अगुवे, हमारे लेवी और हमारे याजक छाप लगाते है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)