पुराना नियम · गिनती · अध्याय 22 / 36
गिनती 22
1तब इस्राएलियों ने प्रस्थान करके यरदन के उस पार यरीहो के सामने मोआब की तराई में डेरे खड़े किए।
2जो कुछ इस्राएल ने एमोरियों के साथ किया था, सिप्पोर के पुत्र बालाक ने उसे देखा था।
3अतः इस्राएलियों के कारण मोआब अत्यन्त भयभीत था, क्याेंकि वे संख्या में बहुत थे। इसलिए वह इस्राएलियों से आतंकित था।
4और मोआबियों ने मिघान के पुरनियों से कहा, “यह झुंड तो हमारे आसपास की सभी वस्तुओं को ऐसा चट कर जाएगा, जैसे मैदान की हरी घास को बैल।” उस समय सिप्पोर का पुत्र बालाक मोआब का राजा था।
5तब उसने फरात के तट पर स्थित पतोर नगर में जो बिलाम के सगे-सम्बन्धियों की भूमि थी, बओर के पुत्र बिलाम के पास यह कहकर अपने संदेशवाहक भेजे, “देख, एक जाति मिस्र से निकलकर आई है, उसके लोगों ने देश की समस्त भूमि को छा लिया है, और अब वे मेरे सामने ही बस गए है।
6इसलिए कृपया आकर मेरे लिए इनको शाप दे, क्योंकि वे मुझसे अधिक शक्तिशाली है। कदाचित् मैं उनको हराकर देश से बाहर खदेड़ दू। क्योंकि यह मैं जानता हूं कि जिसको तू आशीष देता है वह आशीषित होता है, और जिसको शाप देता है वह शापित होता है।”
7अतः मोआब और मिघान के पुरनिए शकुन-विचार करने की दक्षिणा लेकर चल दिए; और बिलाम के पास आकर उन्होंने बालाक की बातें कह सुनाईं।
8तब उसने उनसे कहा, “आज रात भर यहीं ठहरो, और जो बात यहोवा मुझसे कहे, वही मैं तुमको बताऊंगा।” और मोआब के वे अधिकारी बिलाम के यहां ठहर गए।
9तब परमेश्वर ने बिलाम के पास आकर कहा, “तेरे यहां ये कौन मनुष्य हैं?”
10और बिलाम ने परमेश्वर से कहा, “सिप्पोर के पुत्र, मोआब के राजा बालाक ने मुझे यह संदेश भेजा है,
11‘देख, एक जाति मिस्र से निकलकर आई है और उसने देश की समस्त भूमि को छा लिया है। अब आकर मेरे लिए इनको शाप दे। कदाचित् मैं उनके विरुद्ध लड़कर उन्हें देश से बाहर खदेड़ दूं’।”
12और परमेश्वर ने बिलाम से कहा, “तू इनके संग मत जा, उन लोगों को शाप मत देना, क्योंकि वे आशीषित है।”
13अतः बिलाम ने प्रातः उठकर बालाक के अधिकारियों से कहा, “तुम अपने देश वापस चले जाओ, क्योंकि यहोवा ने मुझे तुम्हारे संग जाने को मना कर दिया है।”
14तब मोआब के अधिकारी उठकर बालाक के पास चले गए। उन्होंने कहा, “बिलाम ने हमारे संग आने से मना कर दिया है।”
15इस पर बालाक ने फिर से अधिकारी भेजे जो पहलों से प्रतिष्ठित और संख्या में अधिक थे।
16उन्होंने बिलाम के पास आकर कहा, “सिप्पोर का पुत्र बालाक इस प्रकार कहता है, ‘निवेदन है कि मेरे पास आने में तेरे लिए कोई बाधा न हो।
17क्योंकि मैं तुझे अत्यन्त सम्मानित करूंगा और जो कुछ तू मुझसे कहेगा, मैं करूंगा। कृपया, तू आकर मेरे लिए इस जाति को शाप दे’।”
18और बिलाम ने बालाक के कर्मचारियों को उत्तर देकर कहा, “चाहे बालाक अपना घर सोने और चांदी से भी भरकर मुझे दे, फिर भी मैं अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा के विरुद्ध न तो घटाकर और न बढ़ाकर कुछ कर सकता हू।
19अब आज रात कृपया करके तुम भी यहीं ठहरो कि मैं जान सकूं कि यहोवा मुझसे और क्या कहता है।”
20और परमेश्वर ने रात को बिलाम के पास आकर कहा, “यदि ये मनुष्य तुझे बुलाने के लिए आये हैं, तो तू उठकर उनके साथ चला जा। परन्तु जो कुछ मैं तुझसे कहूं, केवल वही करना।”
21तब बिलाम प्रातः उठा और अपनी गदही पर काठी कसकर मोआब के अधिकारियों के साथ चल पड़ा।
22किन्तु उसके वहां जाने से परमेश्वर क्रोधित हो गया, और यहोवा का एक दूत विरोधी की भांति उसका मार्ग रोक कर खड़ा हो गया। बिलाम तो अपनी गदही पर सवार होकर जा रहा था और उसके साथ उसके दो सेवक भी थे।
23जब उस गदही ने यहोवा के दूत को अपने हाथ में नंगी तलवार लिए हुए मार्ग में खड़े देखा, तो वह मार्ग से हटकर खेत में चली गई। तब बिलाम ने गदही को मारा कि वह पुनः उसी मार्ग पर आ गए।
24तब यहोवा का दूत दाख की बारियों के बीच की गली में जिसके दोनों ओर बारियों की दीवारें थीं, आ खड़ा हुआ।
25जब उस गदही ने यहोवा के दूत को देखा तो वह दीवार से ऐसे सटकर अड़ गई कि बिलाम का पैर दीवार से दब गया। तब उसने उसे फिर मारा।
26तब यहोवा का दूत आगे बढ़कर एक ऐसे सकरे स्थान पर खड़ा हो गया जहां दाहिने अथवा बाएं मुड़ने का कोई रास्ता न था।
27जब गदही ने यहोवा के दूत को देखा तो बिलाम को लिए हुए वह वहीं बैठ गई। अतः बिलाम ने क्रोधित होकर उस गदही को अपनी लाठी से पीटा।
28तब यहोवा ने गदही का मुंह खोल दिया और उसने बिलाम से कहा, “मैंने तेरा क्या किया है कि तूने मुझे तीन बार मारा?”
29इस पर बिलाम ने गदही से कहा, “इसलिए कि तूने मुझे ठट्ठा का कारण बनाया। यदि मेरे हाथ में तलवार होती, तो मैं तुझे अब तक मार डालता।”
30गदही ने बिलाम से कहा, “क्या मैं तेरी वही गदही नहीं, जिस पर तू आज तक अर्थात् जीवन भर सवारी करता आया है? क्या मैंने कभी और भी तेरे साथ ऐसा किया?” उसने कहा, “नही।”
31तब यहोवा ने बिलाम की आंखें खोल दीं और उसने यहोवा के दूत को अपने हाथ में नंगी तलवार लिए हुए मार्ग में खड़े देखा, और मुंह के बल गिर पड़ा।
32और यहोवा के दूत ने उससे कहा, “तूने अपनी गदही को तीन बार क्यों मारा? देख, मैं तेरा विरोध करने आया हूं, क्योंकि तेरी चाल मेरी दृष्टि में टेढ़ी है।
33और इस गदही ने मुझे देखा, और वह तीन बार मेरे सामने से हट गई। यदि वह मेरे सामने से न हटती तो मैं निश्चय तुझको अभी मार डालता और उसको जीवित छोड़ देता।”
34तब बिलाम ने यहोवा के दूत से कहा, “मुझसे पाप हुआ है, क्योंकि मुझे नहीं मालूम था कि मेरे विरुद्ध मेरे मार्ग में तू खड़ा था। इसलिए यदि अब तुझे यह बुरा लगता है, तो मैं लौट जाता हू।”
35परन्तु यहोवा के दूत ने बिलाम से कहा, “तू इन मनुष्यों के साथ चला तो जा, किन्तु तू वही कहना जो मैं तुझसे कहू।” अतः बिलाम बालाक के अधिकारियों के साथ चला गया।
36जब बालाक ने यह सुना कि बिलाम आ रहा है तो वह उसकी अगवानी के लिए मोआब के उस नगर तक गया जो अर्नोन की सीमा के अंतिम छोर पर है।
37तब बालाक ने बिलाम से कहा, “क्या मैंने तुझे बड़ी आशा से नहीं बुलवा भेजा था? तू मेरे पास क्यों नहीं चला आया? क्या मैं इस योग्य नहीं कि सचमुच तेरी प्रतिष्ठा कर सकता?”
38अतः बिलाम ने बालाक से कहा, “देख, मैं तेरे पास आ तो गया हूं, फिर भी क्या मैं जो चाहूँ, बोल सकता हूं? जो वचन परमेश्वर मेरे मुंह में डालेगा, वही तो मैं बोलूंगा!”
39और बिलाम बालाक के साथ-साथ चला और वे किर्यत-हूसोत आए।
40वहां बालाक ने बैलों और भेड़ों की बलि चढ़ाई और उसमें से कुछ बिलाम तथा उन अधिकारियों के पास भेजा जो उसके साथ थे।
41तब सवेरे ऐसा हुआ कि बालाक ने बिलाम को साथ लिया, और उसे बाल देवता के ऊंचे स्थान तक ले आया। और वहां से उसे छावनी के छोर तक दिखाई पड़ा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)