पुराना नियम · गिनती · अध्याय 23 / 36
गिनती 23
1तब बिलाम ने बालाक से कहा, “मेरे लिए यहां पर सात वेदियां बनवा, और यहीं पर मेरे लिए सात बछड़े और सात मेढ़े तैयार कर।”
2बालाक ने बिलाम के कहने के अनुसार किया तथा बालाक और बिलाम ने प्रत्येक वेदी पर एक बछड़ा और एक मेढ़ा चढ़ाया।
3तब बिलाम ने बालाक से कहा, “तू अपनी होमबलि के पास खड़ा रह, मैं जाता हू। सम्भव है कि यहोवा मेरे पास आए, और जो कुछ वह मुझ पर प्रकट करे, मैं तुझे अवश्य बताऊंगा।’ अतः वह एक उजाड़ पहाड़ी पर चला गया।
4और परमेश्वर बिलाम से मिला; और बिलाम ने उससे कहा, “मैंने सात वेदियां तैयार की हैं, और प्रत्येक वेदी पर एक बछड़ा तथा एक मेढ़ा चढ़ाया है।”
5तब यहोवा ने बिलाम के मुंह में एक बात डाली, और कहा, “बालाक के पास लौट जा, और इस प्रकार कहना।”
6अतः वह उसके पास लौट आया और देखो, बालाक मोआब के समस्त अधिकारियों समेत अपने होमबलि के निकट खड़ा था।
7और बिलाम ने गूढ़ बात आरम्भ की और कहाः “बालाक मुझे अराम देश से, अर्थात् मोआब का राजा मुझे पूर्व के पर्वतों से ले आया है, ‘आ, याकूब को मेरी तरफ से शाप दे, और आ, इस्राएल की निन्दा कर!’
8जिसको परमेश्वर ने शाप नहीं दिया उसको मैं कैसे दूं? जिसकी निन्दा यहोवा ने नहीं की उसकी निन्दा मैं कैसे करूं?
9जैसा कि मैं चट्टानों की चोटी पर से उसे देखता हूं, और मैं पहाड़ी पर से उसे निहारता हूं, देखो, यह तो पृथक रहने वाली जाति है, और अन्य जातियों में इसकी गणना नहीं होगी।
10याकूब के धूलि-कणों को कौन गिन सकता है, अथवा इस्राएल के चौथाई भाग की गणना कौन कर सकता है? काश, मैं एक धर्मी की मृत्यु मरूं और मेरा अन्त उसी के समान हो!”
11तब बालाक ने बिलाम से कहा, “तूने मेरे साथ यह क्या किया? मैं तो तुझे अपने शत्रुओं को शाप देने को ले आया था, परन्तु देख, वास्तव में तूने तो उन्हें आशीष दे डाली!”
12तब उसने उत्तर देकर कहा, “क्या मैं सावधान न रहूं कि वही बात बोलूं जो यहोवा ने मेरे मुंह में डाली है?” बिलाम का दूसरा आशीर्वचन
13तब बालाक ने उससे कहा, “कृपया, मेरे साथ दूसरे स्थान पर चल जहां से तू उनको देख सकेगा। परन्तु तू केवल उनका अंतिम छोर ही देखने पाएगा, और उन सब को नहीं देख सकेगा। वहां से तू मेरे लिए उनको शाप देना।”
14अतः वह उसे सोपीम के मैदान में पिसगा की चोटी पर ले गया और वहां सात वेदियां बनाकर प्रत्येक वेदी पर एक बछड़ा और एक मेढ़ा चढ़ाया।
15और उसने बालाक से कहा, “तू अपनी होमबलि के निकट यहीं खड़ा रह जब तक मैं स्वयं उधर यहोवा से मिल आता हू।”
16तब यहोवा बिलाम से मिला और उसने उसके मुंह में एक बात डाली और कहा, “बालाक के पास लौट जा और यह कहना।”
17और वह उसके पास आया और क्या देखा कि वह मोआब के अधिकारियों समेत अपने होमबलि के निकट खड़ा है। बालाक ने बिलाम से पूछा, “यहोवा ने क्या कहा है?”
18तब उसने अपनी गूढ़ बातों को आरम्भ किया और कहा, “हे बालाक, उठकर सुन; हे सिप्पोर के पुत्र, मेरी बात पर कान लगा।
19परमेश्वर मनुष्य नहीं कि वह झूठ बोले, न वह मानव-पुत्र है कि पछताए। क्या वह कुछ कहे, और उसे न करे? या क्या वह कुछ बोले, और उसे पूरा न करे?
20देख, मुझे तो आशीष देने की आज्ञा मिली है, जबकि वह आशीष दे चुका है, तो मैं उसे रद्द नहीं कर सकता।
21उसने याकूब में कोई बुराई नहीं पाई, न तो इस्राएल में उसने कोई गड़बड़ी देखी। यहोवा उसका परमेश्वर उसके संग है, और राजा की-सी गर्जन उनके मध्य है।
22परमेश्वर मिस्र से उनको निकाल कर लिए आ रहा है। वह तो उनके लिए जंगली सांड़ के सींगों के सदृश है।
23क्योंकि याकूब के विरुद्ध कोई अपशकुन नहीं होता, न ही इस्राएल के विरुद्ध कोई शकुन-विघा लागू होती है। उचित समय पर कहा जाएगा कि याकूब और इस्राएल के लिए परमेश्वर ने क्या किया है।
24देख, एक जाति, एक सिंहनी की भांति प्रकट हो रही है, और एक सिंह की भांति अपने पैरों पर उठ खड़ी हो रही है। वह तब तक नहीं लेटने की जब तक शिकार को खा न ले, और मारे हुओं का लहू पी न ले।”
25तब बालाक ने बिलाम से कहा, “तू न उनको शाप दे, और न ही आशीष दे!”
26परन्तु बिलाम ने बालाक को उत्तर देकर कहा, “क्या मैंने तुझसे नहीं कहा कि यहोवा जो कुछ मुझसे कहे, वही मुझे करना पड़ेगा?”
27तब बालाक ने बिलाम से कहा, “चल, मैं तुझे एक और स्थान पर ले चलता हूं, सम्भवतः परमेश्वर की दृष्टि में यह उचित लगे कि तू मेरे लिए वहां से उनको शाप दे।”
28अतः बालाक बिलाम को पोर के शिखर पर ले गया जहां से बंजर-क्षेत्र दिखाई देता है।
29और बिलाम ने बालाक से कहा, “मेरे लिए यहां सात वेदियां बना और यहां सात बछड़े तथा सात मेढ़े तैयार कर।”
30बिलाम के कहने के अनुसार बालाक ने ठीक वैसा ही किया और प्रत्येक वेदी पर एक बछड़ा तथा एक मेढ़ा चढ़ाया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)