Loading account

नया नियम · फिलिप्पियों · अध्याय 2 / 4

फिलिप्पियों 2

1अतः यदि तुम्हें मसीह में कुछ प्रोत्साहन, प्रेम की सान्त्वना, आत्मा की सहभागिता, प्रीति और सहानुभूति है,

2तो मेरा आनन्द पूर्ण करने के लिए एक ही मन, एक ही प्रेम, एक ही भावना और एक ही दृष्टिकोण रखो।

3स्वार्थ और मिथ्याभिमान से कोई काम न करो, परन्तु नम्रतापूर्वक अपनी अपेक्षा दूसरों को उत्तम समझो।

4तुम में से प्रत्येक अपना ही नहीं, परन्तु दूसरों के हित का भी ध्यान रखे।

5अपने में वही स्वभाव रखो जो मसीह यीशु में था,

6जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी परमेश्वर के समान होने को अपने अधिकार में रखने की वस्तु न समझा।

7उसने अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया कि दास का स्वरूप धारण कर मनुष्य की समानता में हो गया।

8इस प्रकार मनुष्य के रूप में प्रकट होकर स्वयं को दीन किया और यहां तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु वरन् क्रूस की मृत्यु भी सह ली।

9इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान् भी किया और उसको वह नाम प्रदान किया जो सब नामों में श्रेष्ठ है,

10कि यीशु के नाम पर प्रत्येक घुटना टिके, चाहे वह स्वर्ग में हो या पृथ्वी पर या पृथ्वी के नीचे,

11और परमेश्वर पिता की महिमा के लिए प्रत्येक जीभ अंगीकार करे कि यीशु मसीह ही प्रभु है।

12इसलिए मेरे प्रियो, जिस प्रकार तुम सदैव आज्ञा पालन करते आए हो, न केवल मेरी उपस्थिति में परन्तु अब उस से भी अधिक मेरी अनुपस्थिति में डरते और कांपतेे हुए अपने उद्धार का काम पूरा करते जाओ,

13क्योंकि स्वयं परमेश्वर अपनी सुुइच्छा के लिए तुम्हारी इच्छा और कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए तुम में सक्रिय है।

14सब काम बिना कुड़कुड़ाए और निर्विवाद किया करो,

15जिस से तुम निर्दोष और भोले बनो तथा इस कुटिल और भ्रष्ट पीढ़ी के बीच परमेश्वर के निष्कलंक सन्तान बनकर संसार में ज्योति बनकर चमको।

16जीवन के वचन को दृढ़ता से थामे रहो जिस से मसीह के दिन मुझे इस बात का गर्व हो कि न तो मेरी दौड़-धूप और न मेरा परिश्रम व्यर्थ गया।

17यघपि मैं तुम्हारे विश्वास के बलिदान और उपासना पर अर्घ के समान उंडेला जाता हूं, फिर भी मैं आनन्दित हूं और तुम सब के साथ आनन्द मनाता हू।

18मैं निवेदन करता हूं कि तुम भी उसी प्रकार आनन्दित रहो और मेरे साथ आनन्द मनाओ।

19प्रभु यीशु में मुझे आशा है कि मैं शीघ्र ही तीमुथियुस को तुम्हारे पास भेजूंगा जिस से तुम्हारे विषय में सुनकर मुझे प्रसन्नता हो।

20मेरे पास उसके सदृश कोई अन्य ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे शुद्ध मन से तुम्हारे सम्बन्ध में चिन्ता हो।

21क्योंकि सब अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं, न कि मसीह यीशु की।

22परन्तु तुम्हें उसकी योग्यता का प्रमाण मिल चुका है कि सुसमाचार- प्रचार में उसने मेरा हाथ ऐसे बटाया है जैसे पुत्र पिता का।

23इसलिए मैं आशा करता हूं कि अपने सम्बन्ध में ज्यों ही मुझे कुछ भी मालूम हो जाएगा, मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा।

24और प्रभु में मुझे भरोसा है कि मैं स्वयं भी शीघ्र आऊंगा।

25फिर भी मुझे यह आवश्यक जान पड़ा कि अपने भाई व सहकर्मी, संगी योद्धा तथा तुम्हारे संदेशवाहक और आवश्यक बातों में मेरी सेवा करने वाले अर्थात् इपफ्रुदीतुस को तुम्हारे पास भेजूं,

26क्योंकि तुमने उसकी बीमारी का समाचार सुन लिया था और वह तुम से मिलने के लिए अत्यन्त व्याकुल व लालायित रहता था।

27वास्तव में, वह बीमार तो था, यहां तक कि मरने पर था। परन्तु उस पर परमेश्वर की दया हुई, और न केवल उस पर वरन् मुझ पर भी कि मुझे शोक पर शोक न हो।

28इस कारण मैं उसे भेजने को और भी उत्सुक हुआ जिससे कि उसे फिर देख कर तुम आनन्दित हो जाओ और मेरी चिन्ता भी कम हो जाए।

29अतः प्रभु में उसका बड़े आनन्द से स्वागत करो, ऐसे लोगों का अधिक आदर किया करो,

30क्योंकि मसीह के कार्य के लिए वह अपने प्राण को जोखिम में डालकर मरने पर था कि मेरे प्रति तुम्हारी सेवा में जो घटी रह गई थी उसे पूर्ण करे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)