पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 3 / 31
नीतिवचन 3
1हे मेरे पुत्र, मेरी शिक्षा को न भूलना, पर मेरी आज्ञाओं को हृदय से मानना,
2क्योंकि इनसे तेरे जीवन के दिन और वर्ष बढ़ेंगे, और तू अधिक कुशलता से रहेगा
3करुणा और सच्चाई तुझसे अलग न हो। उन्हें अपने गले का हार बनाना, और अपने हृदय-पटल पर लिख लेना।
4इस प्रकार तू परमेश्वर और मनुष्य दोनों की दृष्टि में अनुग्रह और यश प्राप्त करेगा।
5तू सम्पूर्ण हृदय से यहोवा पर भरोसा रखना, और अपनी समझ का सहारा न लेना।
6उसी को स्मरण करके अपने सब कार्य करना, तब वह तेरे लिए सीधा मार्ग निकालेगा।
7अपनी दृष्टि में तू बुद्धिमान न बनना। यहोवा का भय मानना, और बुराई से विमुख रहना।
8इससे तेरा शरीर स्वस्थ रहेगा तथा तेरी हड्डियों को पुष्टता प्राप्त होगी।
9अपनी सारी उपज के प्रथम फल से तथा अपनी सम्पत्ति के द्वारा यहोवा का आदर करना।
10तब तेरे भंडार बहुतायत से भरे रहेंगे, और तेरे कुंड नए दाखरस से उमड़ते रहेंगे।
11मेरे पुत्र, यहोवा की ताड़ना का तिरस्कार न करना, और न उसके डांटने से बुरा मानना,
12क्योंकि यहोवा जिससे प्रेम करता है उसे डांटता भी है, जैसे कि पिता उस पुत्र को जिसे वह अधिक चाहता है।
13क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, अर्थात् वह जो समझ प्राप्त करे।
14बुद्धि का लाभ तो चांदी की प्राप्ति से भी उत्तम है, और विशुद्ध सोने की प्राप्ति से भी श्रेष्ठ है।
15बुद्धि तो रत्नों से भी अधिक मूल्यवान है- इसकी तुलना किसी भी वस्तु से जिसकी तू लालसा करता है नहीं की जा सकती।
16उसके दाहिने हाथ में तो दीर्घायु और बाएं हाथ में धन और सम्मान है।
17उसके मार्ग मनोहर और उसके सारे पथ शान्ति के है।
18जो उसे ग्रहण करते हैं, उनके लिए वह जीवन-वृक्ष है, और जितने उसे दृढ़ता से थामे रहते हैं, वे धन्य है।
19यहोवा ने बुद्धि से ही पृथ्वी की नींव डाली, और उसने समझ ही के द्वारा आकाश को स्थिर किया।
20उसी के ज्ञान से गहरे जल-स्रोत विभाजित किए गए और आकाश से ओस टपकती है।
21मेरे पुत्र, ये बातें तेरी दृष्टि से ओझल न होने पाएं: खरी बुद्धि और विवेक की रक्षा करना।
22इनसे तुझे जीवन मिलेगा, और ये तेरे गले का हार बनेंगे।
23तब तू अपने मार्ग में बेखटके चलेगा और तेरा पैर ठोकर न खाएगा।
24जब तू लेटेगा, तो भयभीत न होगा। जब तू सोएगा, तो तुझे सुख की नींद आएगी।
25आकस्मिक भय से भयभीत न होना, और जब दुष्टों पर विनाश आ पड़े तो न घबराना।
26क्योंकि यहोवा तेरा सहारा होगा, और तेरे पैर को फंदे में न फंसने देगा।
27यदि तुझमें सामर्थ्य हो तो जिनका भला करना चाहिए, उनका भला करने से न रुकना।
28यदि तेरे पास देने को कुछ हो तो अपने पड़ोसी से यह न कहना, “जा, कल फिर आना और मैं तुझे दूँगा।”
29जबकि तेरा पड़ोसी तुझ पर भरोसा रख कर तेरे पास रहता है, तो तू उसके विरुद्ध कुटिल योजना न बनाना।
30यदि किसी ने तेरा कोई नुकसान न किया हो तो उससे अकारण झगड़ा न करना।
31उपद्रवी मनुष्य से ईर्ष्या न करना, न उसकी-सी चाल चलना।
32क्योंकि यहोवा तो कुटिल मुनष्य से घृणा करता है, परन्तु धर्मियों पर वह अपना भेद प्रकट करता है।
33दुष्ट के घर पर यहोवा का शाप रहता है, परन्तु धर्मियों के निवासस्थान को वह आशीषित करता है।
34ठट्ठा करने वालों को वह ठट्ठों में उड़ाता है, और दीन-दुखियों पर अनुग्रह करता है।
35बुद्धिमान लोग सम्मान पाएंगे, परन्तु मूर्खों का अपमान ही होता रहेगा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)