पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 115 / 150
भजन संहिता 115
1हे यहोवा, हमारी नहीं, हमारी नहीं, वरन् अपने ही नाम की महिमा, अपनी करुणा और सच्चाई के निमित्त कर।
2जाति-जाति के लोग क्यों कहने पाएं कि अब उनका परमेश्वर कहां है?
3परन्तु हमारा परमेश्वर तो स्वर्ग में हैं; जो कुछ वह चाहता है, करता है।
4उनकी मूर्तियां सोना-चांदी ही तो हैं, वे मनुष्यों के हाथ के काम है।
5उनका मुंह तो है, परन्तु वे बोल नहीं सकती, उनकी अांखें तो हैं, परन्तु वे देख नहीं सकती।
6उनके कान तो हैं, परन्तु वे सुन नहीं सकतीं, उनकी नाक तो हैं, परन्तु वे सूंघ नहीं सकती।
7उनके हाथ तो हैं, परन्तु वे स्पर्श नहीं कर सकतीं; उनके पैर तो हैं, परन्तु वे चल नहीं सकती। वे अपने कंठ से कुछ भी शब्द नहीं निकाल सकती।
8उनको बनाने वाले और वे सब जो उन पर भरोसा रखते हैं, उन्हीं के समान हो जाएंगे।
9हे इस्राएल, यहोवा पर भरोसा रख- वह उनकी सहायता और उनकी ढाल है।
10हे हारून के घराने, यहोवा पर भरोसा रख- वह उनकी सहायता और उनकी ढाल है।
11तुम जो यहोवा का भय मानते हो, यहोवा पर भरोसा रखो- वह उनकी सहायता और उनकी ढाल है।
12यहोवा को हमारा ध्यान है, वह हमें आशीष देगा; वह इस्राएल के घराने को आशीष देगा; वह हारून के घराने को आशीष देगा।
13वह यहोवा का भय मानने वालों को, क्या छोटे क्या बड़े दोनों को, आशीष देगा।
14यहोवा तुमको और तुम्हारे बच्चों को, बढ़ाता जाए।
15यहोवा जो आकाश और पृथ्वी का सृजनहार है उसी की ओर से तुम्हें आशीष मिले।
16स्वर्ग तो यहोवा का स्वर्ग है, परन्तु पृथ्वी उसने मनुष्यों को दी है।
17मृतक, अर्थात् वे जो चिरशान्ति में सो जाते हैं, याह की स्तुति नहीं करते।
18परन्तु हम तो अब से लेकर सर्वदा तक याह को धन्य कहते रहेंगे। याह की स्तुति करो!
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)