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पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 18 / 150

भजन संहिता 18

1हे यहोवा, मेरे बल, मैं तुझसे प्रेम करता हू।

2यहोवा मेरी चट्टान, मेरा गढ़ और मेरा छुड़ाने वाला है, मेरा परमेश्वर, मेरी चट्टान, जिसमें मैं शरण लेता हू। वह मेरी ढाल, मेरे उद्धार का सींग और मेरा दृढ़ गढ़ है।

3मैं यहोवा को, जो स्तुति के योग्य है, पुकारता हूं, और मैं अपने शत्रुओं से छुड़ाया जाता हू।

4मृत्यु के बन्धनों ने मुझे जकड़ लिया, और अधर्म की बाढ़ ने मुझे भयभीत किया।

5अधोलोक के बन्धनों ने मुझे चारों ओर से आ जकड़ा, और मृत्यु के फंदे मेरे सामने आ पड़े।

6अपने संकट में मैंने यहोवा को पुकारा, और अपने परमेश्वर की दुहाई दी; उसने अपने मंदिर से मेरी आवाज सुनी, और उसके सम्मुख मेरी दुहाई उसके कानों में पड़ी।

7तब पृथ्वी डोल गई और कांप उठी, और पर्वतों की नींव कम्पित होकर हिल गई, क्याेंकि वह क्रोधित हुआ था।

8उसके नथनों से धुआं निकल उठा, उसके मुंह से आग निकलकर भस्म करने लगी और उससे कोयले धधक उठे।

9और वह आकाश को नीचे झुकाकर उतर आया, और उसके पैरों के नीचे घना अन्धकार था।

10वह करूब पर सवार होकर उड़ा वरन् पवन के पंखों पर वेग से उड़ा।

11उसने अन्धकार को, जल भरे मेघों के अन्धकार को, और आकाश की काली घटाओं को अपने छिपने का स्थान अर्थात् अपने चारों ओर मंडप बनाया।

12उसकी उपस्थिति के तेज में से उसकी काली घटाएं निकलीं, ओले और अंगारे भी।

13तब यहोवा आकाश में गरजा और परमप्रधान ने अपनी वाणी सुनाई, ओले और अंगारे।

14उसने अपने तीर चला-चलाकर उन्हें तितर-बितर किया, और भयंकर बिजलियां गिरा-गिराकर उनको खदेड़ दिया।

15तब हे यहोवा, तेरी डांट से, तेरे नथनों की श्वास के झोंके से जल के तल दिखाई दिए और जगत की नींव उघाड़ दी गई।

16उसने सर्वोच्च स्थान से हाथ बढ़ाकर मुझे थाम लिया, उसने मुझे अथाह जल में से खींच लिया।

17उसने मेरे बलवन्त शत्रु से और उनसे जो मुझसे घृणा करते थे मुझे छुड़ा लिया, क्योंकि वे मुझसे अधिक सामर्थी थे।

18मेरी विपत्ति के दिन वे मुझ पर टूट पड़े, परन्तु यहोवा मेरा आश्रय था।

19उसने मुझे निकालकर चौड़े स्थान में पहुंचाया, उसने मुझे छुड़ाया, क्योंकि वह मुझसे प्रसन्न था।

20यहोवा ने मेरी धार्मिकता के अनुसार मुझे प्रतिफल दिया है, मेरे हाथों की शुद्धता के अनुसार ही बदला दिया है।

21क्योंकि मैं यहोवा के मार्गों पर चलता रहा और न दुष्ट होकर अपने परमेश्वर से दूर हुआ।

22क्योंकि उसके सारे नियम मेरे सम्मुख थे, और मैंने उसकी विधियों को न त्यागा।

23मैं उसके सम्मुख निर्दोष बना रहा और अधर्म से अपने आपको बचाए रहा।

24इसीलिए यहोवा ने मेरी धार्मिकता के अनुसार मुझे बदला दिया- हां, उसकी दृष्टि में मेरे हाथों की शुद्धता के अनुसार।

25दयालु के प्रति तू अपने को दयालु दिखाता है; खरे के प्रति तू अपने को खरा दिखाता है।

26शुद्ध के प्रति तू अपने को शुद्ध दिखाता है; और टेढ़े के प्रति तू चतुर बनता है।

27क्योंकि तू दीन लोगों को बचाता है परन्तु घमंड भरी आंखों को नीची कर देता है।

28क्योंकि तू ही मेरा दीपक जलाता है, मेरा परमेश्वर यहोवा मेरे अन्धियारे को उजियाला कर देता है।

29क्योंकि तेरी सहायता से मैं सेना पर धावा कर सकता हूं, अपने परमेश्वर की सहायता से शहरपनाह को लांघ सकता हू।

30परमेश्वर का मार्ग तो सिद्ध है, यहोवा का वचन ताया हुआ है। जो उसमें शरण लेते हैं, उन सबकी वह ढाल है।

31यहोवा को छोड़ और कौन परमेश्वर है? हमारे परमेश्वर को छोड़ और कौन चट्टान है?

32परमेश्वर ही तो है जो सामर्थ्य से मेरी कमर कसता है और मेरे मार्ग को सिद्ध करता है।

33वह मेरे पैरों को हरिणी के पैरों के समान बनाता है और मुझे मेरे ऊंचे स्थानों पर स्थिर कर देता है।

34वह मेरे हाथों को युद्ध की कला सिखाता है जिससे मेरी बाहें कांसे का धनुष तक झुका देती है।

35तूने मुझे अपने उद्धार की ढाल भी दी है, तेरा दाहिना हाथ मुझे सम्भाले रहता है, तेरी नम्रता मुझे महान बनाती है।

36मेरे कदम रखने के स्थानों को तू चौड़ा करता है, और मेरे पैर फिसलते नही।

37मैंने अपने शत्रुओं का पीछा करके उन्हें जा पकड़ा, और तब तक न लौटा जब तक उनका अन्त न कर डाला।

38मैंने उन्हें ऐसा मारा कि वे फिर न उठ सके, वे मेरे पैरों के नीचे गिर पड़े।

39क्योंकि तूने युद्ध के लिए सामर्थ्य से मेरी कमर कसी है; जो मेरे विरुद्ध उठ खड़े हुए थे उनको तूने मेरे वश में कर दिया।

40तूने मेरे शत्रुओं की पीठ मेरी ओर फिरवा दी, और जो मुझसे घृणा करते थे उनको मैंने मिटा डाला।

41वे सहायता के लिए पुकार उठे पर उन्हें बचाने वाला कोई न था- हां, यहोवा को भी, पर उसने उन्हें उत्तर न दिया।

42तब मैंने उन्हें कूट-कूटकर आंधी की धूल के समान उड़ा दिया। मैंने उन्हें गली-कूचों के कीचड़ के समान निकाल फेंका।

43तूने मुझे प्रजा के आक्रमणों से छुड़ायाः तूने मुझे जाति-जाति का प्रधान ठहराया; जिस प्रजा को मैं जानता भी न था वह मेरी सेवा करती है।

44ज्योंही वे मेरा शब्द सुनते हैं, मेरी आज्ञा पालन करते हैं; विदेशी मेरे अधीन हो जाते है।

45विदेशियों का साहस चला जाता है, और वे अपने किलों में से कांपते हुए निकल आते है।

46यहोवा जीवित है! मेरी चट्टान धन्य हो! और मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर की बड़ाई हो-

47हां, परमेश्वर की, जो मेरा बदला चुकाता है और देश-देश के लोगों को मेरे वश में कर देता है।

48वह मेरे शत्रुओं से मुझे छुड़ाता है; निःसन्देह जो मेरे विरुद्ध उठ खड़े होते हैं तू उनसे भी मुझे ऊंचा उठाता है। तू मुझे क्रूर व्यक्ति के हाथों से बचाता है।

49इसलिए हे यहोवा, मैं देश-देश के लोगों में तेरा धन्यवाद करूंगा और तेरे नाम की स्तुति के भजन गाऊंगा।

50वह अपने नियुक्त किए हुए राजा को महान् छुटकारा देता है और अपने अभिषिक्त अर्थात् दाऊद और उसके वंश पर युगानुयुग करुणा करता रहेगा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)