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पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 39 / 150

भजन संहिता 39

1मैंने कहा, “मैं अपने चाल-चलन की चौकसी करूंगा कि मैं अपनी जीभ से पाप न करूँ। जबकि दुष्ट मेरे सम्मुख है, मैं अपने मुंह में लगाम लगाए रहूँगा।”

2मैं गूँगा बन कर मौन रहा, भलाई करने से भी चुप्पी साधे रहा, और मेरा दुख बढ़ गया।

3मेरा हृदय भीतर ही भीतर जल उठा, सोचते-सोचते आग भड़क उठी। तब मैं अपनी जीभ से बोल उठाः

4“हे यहोवा, ऐसा कर कि मैं अपना अन्त जानूँ, और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं, मैं यह भी जानूँ कि मैं कैसा क्षण-भंगुर हू।

5देख, तूने मेरी आयु बालिश्त भर की रखी है, और मेरी अवस्था मानो तेरी दृष्टि में कुछ भी नही। निश्चय हर एक मनुष्य, कितना ही स्थिर क्यों न हो, फिर भी श्वास-मात्र ही है। सेला।

6निश्चय हर मनुष्य छाया के समान चलता-फिरता हैः सचमुच लोग व्यर्थ ही घबराते है। मनुष्य धन का संचय तो करता है पर जानता नहीं कि उसे कौन लेगा।

7“अब हे प्रभु, मैं किस बात की प्रतीक्षा करूं? मेरी आशा तो तुझमें है।

8मेरे सब अपराधों से मुझे छुड़ा ले; मूढ़ मेरी निन्दा न करने पाए।

9मैं गूँगा बन गया हूं, और अपना मुंह नहीं खोलता, क्याेंकि तूने ही यह किया है।

10जो विपत्ति तूने मुझ पर डाली है उसे दूर कर, तेरे हाथ की मार से मैं नष्ट हुआ जाता हू।

11जब तू मनुष्य को अधर्म के लिए डांट-फटकार कर ताड़ना देता है, तब तू उसके सौंदर्य को पतंगे के समान नष्ट करता है। निश्चय हर मनुष्य श्वास-मात्र ही है। सेला।

12“हे यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन, और मेरी पुकार पर कान लगा; मेरे आंसुओं को देख कर चुप न रह, क्योंकि मैं तेरे साथ प्रवासी हूं, अपने सब पूर्वजों के समान परदेशी हू।

13इससे पहले कि मैं चला जाऊँ और न रहूं अपनी क्रोध भरी दृष्टि मुझ पर से हटा ले कि मैं फिर से आनन्दित हो जाऊँ।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)