नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 13 / 22
प्रकाशितवाक्य 13
1और वह समुद्र की बालू पर जा खड़ा हुआ। तब मैंने एक पशु को समुद्र में से निकलते देखा, जिसके दस सींग और सात सिर थे। उसके सींगों पर दस मुकुट थे तथा उसके सिराें पर ईश-निन्दा के नाम लिखे थे।
2जो पशु मैंने देखा वह चीते के सदृश था। उसके पैर भालू जैसे और उसका मुख सिंह के समान था। उस अजगर ने उसे अपना सामर्थ्य, अपना सिंहासन तथा अपना महान् अधिकार दे दिया।
3तब मैंने उसके सिरों में से एक पर ऐसा भारी घाव देखा मानो वह उस से मरने पर हो, पर उसका प्राणघातक घाव अच्छा हो गया। इस पर सारी पृथ्वी के लोग अचम्भा करते हुए उस पशु के पीछे चल पड़े।
4उन्होंने अजगर की पूजा की, क्योंकि उसने अपना अधिकार पशु को दे दिया था। उन्होंने यह कह कर पशु की पूजा की, “इस पशु के सदृश कौन है? कौन इसके साथ युद्ध कर सकता है?”
5उसे एक ऐसा मुंह दिया गया जिससे कि वह अहंकारपूर्ण और ईश-निन्दक शब्द बोले, तथा उसे बयालीस महीनों तक कार्य करने का अधिकार दिया गया।
6उसने परमेश्वर के विरफ़द्ध निन्दा करने के लिए अपना मुंह खोला कि उसके नाम, उसके तम्बू अर्थात् उनके विरफ़द्ध जो स्वर्ग में निवास करते हैं निन्दा करे।
7उसे पवित्र लोगों के साथ युद्ध करने और उन पर विजय पाने का अधिकार दिया गया तथा प्रत्येक कुल, लोग, भाषा और जाति पर उसे अधिकार दिया गया।
8पृथ्वी के सब निवासी उसकी पूजा करेंगे, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति जिसका नाम उस मेमने के जीवन की पुस्तक में जो जगत की उत्पत्ति के समय से घात किया गया है नहीं लिखा गया है।
9जिसके कान हों, वह सुन ले।
10वह जो बन्दी होने के लिए ठहराया गया है, बन्दीगृह में डाला जाएगा, और जो तलवार से मारता है वह तलवार से मारा जाएगा। पवित्र लोगों का धीरज और विश्वास भी इसी में है।
11फिर मैंने पृथ्वी में से एक और पशु को निकलते देखा। मेमने के से उसके सींग थे, और वह अजगर के समान बोलता था।
12उस पहिले पशु की उपस्थिति में वह उसके सब अधिकार काम में लाता था। वह पृथ्वी और उसके निवासियों से उस पहिले पशु की जिसका घातक घाव अच्छा हो गया था, पूजा करवाता था।
13वह बड़े-बड़े चमत्कार दिखाता था, यहां तक कि लोगों के समक्ष स्वर्ग से पृथ्वी पर अग्नि बरसा देता था।
14इन चमत्कारों के द्वारा जिन्हें उस पशु के समक्ष दिखाने की शक्ति उसे प्राप्त थी, वह पृथ्वी के निवासियों को धोखा देता और उनसे कहता था कि उस पशु की मूर्ति स्थापित करो, जिस पर तलवार का घाव लगा था, और जो पुनः जीवित हो गया था।
15उसे पशु की मूर्ति में प्राण डालने का अधिकार दिया गया, जिस से पशु की वह मूर्ति बोलने लगे और जितने उस पशु की मूर्ति की पूजा न करें, उन्हें मरवा डाले।
16उसने छोटे-बड़े, धनी-निर्धन, स्वतंत्र और दास-सब के दाहिने हाथ या माथे पर छाप लगवा दी।
17और उसने यह प्रबन्ध किया कि जिसके पास उस पशु का नाम या उसके नाम की संख्या की छाप हो, उसको छोड़ और कोई व्यक्ति लेन-देन न कर सके।
18बुद्धिमानी इसी में हैः जिसे समझ हो वह उस पशु की संख्या का हिसाब लगा ले, क्योंकि यह संख्या किसी मनुष्य की है; और उसकी संख्या छः सौ छियासठ है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)