नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 14 / 22
प्रकाशितवाक्य 14
1फिर मैंने दृष्टि की, और देखो, वह मेमना सिय्योन पर्वत पर खड़ा था, और उसके साथ एक लाख चवालीस हज़ार व्यक्ति थे जिनके माथे पर उसका और उसके पिता का नाम लिखा था।
2और मैंने स्वर्ग से अपार जल अर्थात् बड़े गर्जन जैसी आवाज़ सुनी। वह आवाज़ जो मैंने सुनी ऐसी थी मानो वीणा-वादक अपनी वीणाएं बजा रहे हो।
3वे सिंहासन के सम्मुख तथा चारों जीवित प्राणियों और प्राचीनों के सम्मुख एक नया गीत गा रहे थे। उन एक लाख चवालीस हज़ार के अतिरिक्त जो पृथ्वी पर से मोल लिए गए थे, कोई भी वह गीत नहीं सीख सकता था।
4ये वे हैं जिन्होंने अपने आप को स्त्रियों के साथ भ्रष्ट नहीं किया क्योंकि वे कुंवारे है। ये वे ही हैं जो मेमने के पीछे पीछे जहां कहीे वह जाता है चलते है। ये परमेश्वर और मेमने के लिए प्रथम फल होने को मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं।
5उन में झूठ नहीं पाया गया और वे निर्दोष है।
6फिर मैंने एक और स्वर्गदूत को मध्य आकाश में उड़ते देखा। उसके पास पृथ्वी पर रहने वाली हर जाति, कुल, भाषा और लोगों को सुनाने के लिए अनन्त सुसमाचार था।
7उसने ऊंची आवाज़ से कहा, “परमेश्वर से डरो और उसकी महिमा करो; क्योंकि उसके न्याय का समय आ पहुंचा है । उसी की उपासना करो जिसने स्वर्ग, पृथ्वी, समुद्र और जल के सोते बनाए।”
8तब एक और स्वर्गदूत यह कहते हुए आया, “गिर पड़ा, महान् बाबुल गिर पड़ा, जिसने अपने कुकर्म की वासनामय मदिरा सब जातियों को पिलाई थी।”
9उनके पश्चात् एक तीसरा स्वर्गदूत ऊंची आवाज़ से यह कहता हुआ आया, “यदि कोई उस पशु और उसकी मूर्ति की पूजा करे और अपने माथे या हाथ पर उसकी छाप लगवाए,
10तो वह भी परमेश्वर के प्रकोप की वह मदिरा जो उसके क्रोध के कटोरे में भरपूर उंडेली गई है पीएगा, और पवित्र स्वर्गदूतों और मेम्ने की उपस्थिति में उसे आग और गंधक की घोर यातना सहनी पड़ेगी।
11उनकी यातना का धुआं युगानुयुग उठता रहेगा; और उन्हें जो पशु की और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं और उसके नाम की छाप लेते हैं, दिन और रात कभी चैन न मिलेगा।”
12पवित्र लोगों का जो परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते और यीशु पर विश्वास रखते हैं, धैर्य इसी में है।
13फिर मैंने स्वर्ग से एक -शब्द यह कहते हुए सुना, “लिख, ‘धन्य हैं वे मृतक, जो अब से प्रभु में मरते हैं’। आत्मा कहता है, ‘हां, क्योंकि वे अपने परिश्रमों से विश्राम पाएंगे, और उनके कार्य उनके साथ जाएंगे’।”
14मैंने दृष्टि की, और देखो, एक उज्ज्वल बादल और उस बादल पर मानव-पुत्र के सदृश कोई बैठा था। उसके सिर पर स्वर्ण-मुकुट तथा हाथ में तेज़ हँसिया थी।
15तब एक और स्वर्गदूत मंदिर में से निकला और ऊंची आवाज़ से, उस से जो बादल पर बैठा था, कहने लगा, “अपनी हँसिया लगाकर फसल काट इसलिए कि कटनी की घड़ी आ पहुँची है, क्योंकि पृथ्वी की फसल पक चुकी है।”
16और वह जो बादल पर बैठा था उसने अपनी हंसिया पृथ्वी पर लगाई; और पृथ्वी की फसल काटी गई।
17तब एक और स्वर्गदूत उस मन्दिर में से निकला जो स्वर्ग में है; और उसके पास भी एक तेज़ हंसिया थी।
18फिर वेदी से एक और स्वर्गदूत निकला जिसे अग्नि पर अधिकार था। उसने जिसके हाथ में तेज़ हंसिया थी उस से ऊंची आवाज़ में कहा, “अपनी तेज़ हंसिया लगाकर पृथ्वी की दाखलता से दाख के गुच्छे काट ले, क्योंकि उसके दाख पक चुके है।
19उस स्वर्गदूत ने अपनी हंसिया पृथ्वी पर लगाई और पृथ्वी की दाखलता से दाख के गुच्छे काटकर परमेश्वर के प्रकोप के विशाल रसकुंड में डाल दिए।
20और नगर के बाहर उस रसकुंड में दाख रौंदे गए और रसकुंड से इतना लहू बहा कि उसकी ऊंचाई घोड़ों की लगामों तक और उसकी दूरी तीन सौ किलोमीटर तक थी।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)