नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 16 / 22
प्रकाशितवाक्य 16
1मैंने मंदिर में एक ऊंची आवाज़ को सात स्वर्गदूतों से यह कहते सुना, “जाओ और परमेश्वर के प्रकोप के सातों कटोरों को पृथ्वी पर उंडेल दो।”
2अतः पहिले स्वर्गदूत ने जाकर अपना कटोरा पृथ्वी पर उंडेल दिया। इस से उन मनुष्यों पर जिन पर पशु की छाप थी और जो उसकी मूर्ति की पूजा करते थे, बुरे और कष्टदायक फोड़े निकल आए।
3दूसरे स्वर्गदूत ने जब अपना कटोरा समुद्र में उंडेल दिया, तो समुद्र मरे हुए मनुष्य के लहू के समान हो गया और उसमें का प्रत्येक जल-जन्तु मर गया।
4तीसरे स्वर्गदूत ने अपना कटोरा नदियों और जल-स्रोतों पर उंडेला; और वे लहू बन गए।
5तब मैंने जल के स्वर्गदूत को यह कहते सुना, “हे पवित्र, तू जो है और जो था, तू न्यायी है क्योंकि तू ने इन बातों का न्याय किया है;
6क्योंकि मनुष्यों ने पवित्र लोगों और नबियों का लहू बहाया था, पर तूने उन्हें पीने के लिए लहू दिया है। वे इसी योग्य है।”
7फिर मैंने वेदी में से यह शब्द सुना, ‘हां, हे प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान, तेरे न्याय सत्य और उचित है।’
8चौथे स्वर्गदूत ने अपना कटोरा सूर्य पर उंडेला और मनुष्यों को अग्नि से झुलसाने का उसे अधिकार दिया गया।
9और मनुष्य भयंकर ताप से झुलस गए। तब उन्होंने परमेश्वर के नाम की निन्दा की जिसको इन विपत्तियों पर अधिकार है, परन्तु मन न फिराया कि उसे महिमा दे।
10पांचवें स्वर्गदूत ने अपना कटोरा पशु के सिंहासन पर उंडेला और उसके राज्य पर अंधेरा छा गया। पीड़ा के मारे लोगों की जीभ ऐंठने लगी।
11और वे अपनी पीड़ा और फोड़ों के कारण स्वर्ग के परमेश्वर की निन्दा करने लगे, फिर भी उन्होंने अपने अपने कामों से पश्चाताप न किया।
12छठवें स्वर्गदूत ने अपना कटोरा महा नदी फरात पर उंडेल दिया। इस से उसका जल सूख गया कि पूर्व दिशा के राजाओं के लिए मार्ग तैयार हो जाए।
13फिर मैंने उस अजगर के मुंह, उस पशु के मुंह, और उस झूठे नबी के मुंह से तीन अशुद्ध आत्माओं को मेंढकों के रूप में निकलते देखा।
14ये चिह्न दिखाने वाली दुष्टात्माएं हैं, जो जाकर समस्त संसार के राजाओं को सर्वशक्मिान परमेश्वर के उस महान् दिन के युद्ध के लिए एकत्र करती हैं-
15देखो, मैं चोर के समान आता हूं, धन्य है वह जो जागृत रहकर अपने वस्त्रों की रक्षा करता है कि नंगा न फिरे और लोग उसकी नग्नता को न देखें-
16और उन्होंने उनको उस स्थान में एकत्र किया जो इब्रानी भाषा में हर-मगिदोन कहलाता है।
17सातवें, स्वर्गदूत ने अपना कटोरा वायु पर उंडेल दिया, और मंदिर के सिंहासन से एक बड़ा -शब्द हुआ, “हो चुका!”
18तब बिजली चमकी, आवाज़ और गर्जन हुआ, तथा एक ऐसा बड़ा भूकम्प आया जैसा पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति से लेकर अब तक कभी न आया था-वह भूकम्प इतना बड़ा और शक्तिशाली था।
19इस से महानगरी के तीन टुकड़े हो गए, और राज्य-राज्य के नगर धराशायी हो गए। तब परमेश्वर ने महानगरी बाबुल का स्मरण किया कि अपने भयंकर प्रकोप की मदिरा उसे पिलाए।
20सब द्वीप टल गए तथा पर्वतों का पता तक न चला।
21मन-मन भर वज़न के ओले आकाश से मनुष्यों पर पड़ने लगे। तब ओले पड़ने की इस विपत्ति के कारण लोगों ने परमेश्वर की निन्दा की, क्योंकि यह विपत्ति अत्यन्त कठोर थी।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)