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नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 18 / 22

प्रकाशितवाक्य 18

1इसके पश्चात् मैंने एक और स्वर्गदूत को स्वर्ग से उतरते देखा जिसे बड़ा अधिकार प्राप्त था। उसके तेज से पृथ्वी प्रकाशित हो उठी।

2उसने उच्च स्वर से पुकार कर कहा, “गिर पड़ी, महानगरी बाबुल गिर पड़ी! वह दुष्टात्माओं का निवास और सब प्रकार की अशुद्ध आत्माओं का अड्डा और प्रत्येक अशुद्ध तथा घृणित पक्षी का अड्डा बन गई है।

3क्योंकि सब जातियों ने उसके व्यभिचार की वासना की मदिरा पी है, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है तथा पृथ्वी के व्यापारी उसके भोग-विलास के धन से धनवान हो गए है।”

4फिर मैंने स्वर्ग से एक और -शब्द को यह कहते सुना, “हे मेरे लोगो, उसमें से निकल आओं, जिससे कि तुम उसके पापों के सहभागी न बनो और तुम पर उसकी विपत्तियां न आ पड़ें,

5क्योंकि उसके पापों का ढेर स्वर्ग तक पहुंच गया है, और परमेश्वर ने उसके अधर्म के कामों को स्मरण किया है।

6जैसा उसने तुम्हारे साथ किया है, वैसा तुम भी उसके साथ करो। उसके कामों के अनुसार उसे दुगुना बदला दो। जिस कटोरे में उसने मदिरा मिश्रित की है, उसी में उसके लिए दुगुनी मिश्रित करो।

7उसने जिस सीमा तक अपनी बड़ाई की और भोग-विलास किया, उसी सीमा तक उसे यातनाएं और पीड़ाएं दो; क्योंकि वह अपने मन में कहती है, ‘मैं रानी होकर बैठी हू। विधवा नहीं हू। मैें कभी शोक में नहीं पड़ूंगी।

8इस कारण एक ही दिन में उस पर विपत्तियां आएंगी, अर्थात् महामारी, शोक और अकाल, और वह अिर्ग्न से भस्म कर दी जाएगी, क्योंकि प्रभु परमेश्वर जो उसका न्याय करता है, सर्वशक्मिान है।

9“पृथ्वी के राजा जिन्होंने उसके साथ व्यभिचार किया और उसके साथ भोग-विलास का जीवन बिताया, जब उसके जलने का धुंआ देखेंगे, तब उसके लिए रोएंगे और विलाप करेंगे।

10उसकी पीड़ा से भयभीत होकर वे दूर ही खड़े होकर कहेंगे, ‘हाय! हाय! हे महान् और दृढ़ नगरी बाबुल! तुझे घण्टे भर में ही दंड मिल गया है।’

11“पृथ्वी के व्यापारी उसके लिए रोएंगे और शोक करेंगे, क्योंकि अब कोई उनका माल मोल नहीं लेताः

12अर्थात् सोना, चांदी, रत्न, मोती, मलमल, और बैंजनी, रेशमी, ओर किरमिजी कपड़े, और अनेक प्रकार के सुगंधित काठ, और हाथी-दांत, बहुमूल्य लकड़ी, पीतल, लोहे, और संगमरमर से बनी प्रत्येक वस्तु,

13तथा दालचीनी, मसाले, धूप, इत्र, लोबान, और मदिरा, जैतून का तेल, मैदा और गेहूं, गाय-बैल, भेड़-बकरियां, घोड़े, रथ, दास, और मनुष्य भी।

14जिस फल को प्राप्त करने की तुझे तीव्र आकांक्षा थी वह तुझ से दूर हो गई है, और तेरी सब विलासमय तथा वैभवशाली वस्तुएं मिट चुकी हैं और मनुष्य उन्हें फिर कभी न पा सकेंगे।

15इन वस्तुओं के व्यापारी जो उसके कारण धनी हो गए थे, उसकी पीड़ा के कारण डर के मारे दूर खड़े होकर रोएंगे और विलाप करेंगे,

16और कहेंगे, ‘हाय! हाय! महान् नगरी जो मलमल, बैंजनी और किरमिजी वस्त्र पहिनती थी और स्वर्णरत्नों और मोतियों से सुसज्जित थी!

17घण्टे भर में ही उसका ऐेसा बड़ा धन नष्ट हो गया।’ और जहाज़ का प्रत्येक कप्तान और प्रत्येक यात्री तथा मल्लाह और वे सब लोग जो समुद्र से जीवन निर्वाह करते हैं, दूर खड़े रहे,

18और उसके जलने के धुएं को देख कर चिल्ला उठे, ‘कौन-सी नगरी इस महानगरी के सदृश है’?

19उन्होंने अपने अपने सिर पर धूल डाली और चिल्लाते, रोते और विलाप करते हुए कहा, ‘हाय! हाय! महान् नगरी, जिसकी सम्पत्ति से सब जहाज़ वाले धनवान हो गये थे! अब घण्टे भर में ही वह उजड़ गई!

20हे स्वर्ग और हे पवित्र लोगो, प्रेरितो और नबियो, उस पर आनन्द करो, क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे पक्ष में और उसके विरोध में निर्णय दिया है’।”

21तब एक बलवान स्वर्गदूत ने चक्की के पाट के समान एक विशाल पत्थर को उठाकर यह कहते हुए समुद्र में फेंक दियाः “इसी प्रकार महानगरी बाबुल भी बलपूर्वक फेंक दी जाएगी, और उसका पता भी न चलेगा।

22और तुझ में वीणा-वादकों, संगीतज्ञों, बांसुरी बजानेवालों और तुरही फूँकने वालों के स्वर फिर कभी सुनाई न देंगे, न किसी कला का शिल्पी तुझ में फिर कभी पाया जाएगा, न तुझ में किसी चक्की की ध्वनि कभी सुनाई देगी;

23न दीपक का प्रकाश फिर कभी तुझ में चमकेगा और न दुल्हा-दुल्हिन के स्वर तुझ में सुनाई देंगे; तेरे व्यापारी संसार के महान् व्यक्ति थे, और तेरी जादूगरी से सब जातियां भरमाई गई थी।

24नबियों, संतोें और पृथ्वी पर घात किए गए लोगों का लहू उसमें पाया गया।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)