नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 21 / 22
प्रकाशितवाक्य 21
1तब मैंने नया आकाश और नई पृथ्वी को देखा क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी मिट गई थी, और कोई समुद्र भी न रहा।
2फिर मैंने पवित्र नगरी, नए यरूशलेम को परमेश्वर की ओर से स्वर्ग से उतरते देखा; वह ऐसी सजाई गई थी जैसी दुल्हिन अपने पति के लिए सिंगार किए हो।
3तब मैंने सिंहासन से एक ऊंची आवाज़ को यह कहते सुना, “देखो, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है, वह उनके मध्य निवास करेगा। वे उसके लोग होंगे तथा परमेश्वर स्वयं उनके मध्य रहेगा,
4और वह उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; फिर न कोई मृत्यु रहेगी न कोई शोक, न विलाप और न पीड़ा रहेगी। पहिली बातें बीत गई है।
5तब जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, “देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं!” फिर उसने कहा, “लिख, क्योंकि ये वचन विश्वसनीय और सत्य है।”
6उसने मुझ से फिर कहा, “हो चुका। मैं अलफा और ओमेगा, आदि और अन्त हू। जो प्यासा हो उसे मैं जीवन के जल के सोते से मुफ्ऱत पिलाऊंगा।
7जो जय प्राप्त करे वह इन बातों का वारिस होगा, और मैं उसका परमेश्वर होऊंगा और वह मेरा पुत्र होगा।
8परन्तु डरपोकों, अविश्वासियों, घृणितों, हत्यारों, व्यभिचारियों जादूगरों, मूर्तिपूजकों और सब झूठों का भाग उस झील में होगा जो आग और गंधक से जलती रहती है। यह दूसरी मृत्यु है।”
9फिर जिन सात दूतों के पास सात अंतिम विपत्तियों से भरे सात कटोरे थे, उनमें से एक ने मेरे पास आकर कहा, “यहां आ, मैं तुझे दुल्हिन अर्थात् मेमने की पत्नी दिखाऊंगा।”
10तब वह मुझे आत्मा में एक विशाल और ऊंचे पर्वत पर ले गया और उसने पवित्र नगरी यरूशलेम को स्वर्ग में से परमेश्वर के पास से नीचे उतरते हुए दिखाया।
11परमेश्वर की महिमा उसमें थी। उसकी चमक अत्यन्त बहुमूल्य पत्थर अर्थात् उस यशब के समान थी जो स्फटिक सदृश उज्ज्वल था।
12उसकी -शहरपनाह विशाल तथा ऊंची थी, जिसके बारह फाटक थे जिन पर बारह स्वर्गदूत थे। उन फाटकों पर इस्राएलियों के बारह गोत्रों के नाम लिखे थे।
13पूर्व की ओर तीन फाटक, उत्तर की ओर तीन फाटक, दक्षिण की ओर तीन फाटक, और पश्चिम की ओर तीन फाटक थे।
14नगर की -शहनपनाह की बारह आधारशिलाएं थीं, जिन पर मेमने के बारह प्रेरितों के बारह नाम लिखे थे।
15जो मुझ से बातें कर रहा था उसके पास नगर और उसके फाटकों और -शहरपनाह को नापने के लिए सोने का एक मापदण्ड था।
16नगर वर्गाकार बसा था। उसकी लम्बाई, चौड़ाई के बराबर थी। उसने उस मापदण्ड से नगर को नापा तो वह दो हज़ार चार सौ किलोमीटर निकला। उसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई एक समान थी।
17उसकी शहरपनाह को स्वर्गदूत ने मनुष्यों की उस नाप के अनुसार नापा जो स्वर्गदूतों की भी है तो वह एक सौ चवालीस हाथ निकली।
18शहरपनाह यशब की बनी थी, और नगर स्वच्छ कांच के सदृश शुद्ध सोने का था।
19उस नगर की नींव के पत्थर सब प्रकार के बहुमूल्य पत्थरों से सुसज्जित थे। नींव का पहिला पत्थर यशब, दूसरा नीलम, तीसरा स्फटिक, चौथा मरकत,
20पांचवा गोमेद, छठवां माणिक्य, सातवां पीतमणि, आठवां पेरोज, नवां पुखराज, दसवां लहसनिया, ग्यारहवां धूम्रकांत, और बारहवां चंद्रकांत का था।
21बारह फाटक बारह मोतियों के थे; प्रत्येक फाटक एक एक मोती का था। नगर की सड़क पारदर्शक कांच के सदृश चोखे सोने की बनी थी।
22मैंने नगर में कोई मन्दिर न देखा, क्योंकि सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर और मेमना ही मंदिर है।
23उस नगर को सूर्य और चांद के प्रकाश की आवश्यकता नहीं, क्योंकि परमेश्वर की महिमा ने उसे आलोकित किया है और मेमना उसका दीपक है।
24सब जातियां उसके प्रकाश में चलेंगी, और पृथ्वी के राजा अपने प्रताप को उसमें लाएंगे।
25उसके फाटक दिन के समय कभी बन्द न होंगे, क्योंकि वहां रात्रि न होगी।
26वे जातियों के वैभव और सम्मान को उसमें लाएंगे;
27परन्तु कोई भी अपवित्र वस्तु या कोई घृणित कार्य अथवा झूठ पर आचरण करने वाला उसमें प्रवेश न करेगा, परन्तु केवल वे जिनके नाम मेमने के जीवन की पुस्तक में लिखे है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)