नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 9 / 22
प्रकाशितवाक्य 9
1जब पांचवें स्वर्गदूत ने तुरही फूंकी, तो मैंने स्वर्ग से पृथ्वी पर एक तारा गिरता हुआ देखा; और उसे अथाह कुण्ड की कुंजी दी गई।
2उसने अथाह कुण्ड को खोला,और उस कुण्ड का धुआ बड़ी भट्ठी के धुएं के समान निकला। सूर्य और वायुमण्डल दोनों उस कुण्ड के धुएं से अंधकारमय हो गए।
3इस धुएं में से पृथ्वी पर टिड्डियां निकली। उनको ऐसी शक्ति दी गई जैसी पृथ्वी के बिच्छुओं में होती है।
4उन्हें आदेश दिया गया कि वे न तो पृथ्वी की घास, न कोई हरी वस्तु, न किसी वृक्ष को हानि पहुंचाएं, परन्तु उन्हीं मनुष्यों को हानि पहुंचाएं जिनके माथों पर परमेश्वर की मुहर नहीं है।
5उन्हें किसी को मार डालने की नहीं, वरन् पांच माह तक घोर पीड़ा देने की अनुमति दी गई थी। यह ऐसी पीड़ा थी जैसी बिच्छू के डंक मारने से मनुष्य को होती है।
6उन दिनों मनुष्य मृत्यु की खोज करेंगे, पर पाएंगे नही। वे मृत्यु की अभिलाषा तो करेंगे, परन्तु मृत्यु उनसे दूर भागेगी।
7इन टिड्डियों का स्वरूप युद्ध के लिए तैयार किए हुए घोड़ों जैसा था। उनके सिरों पर मानो स्वर्ण-मुकुट थे, और उनके मुख मनुष्यों के मुख जैसे थे।
8उनके बाल स्त्रियों के बाल के समान तथा उनके दांत सिंहों के दांत के समान थे।
9उनके कवच लोहे के कवच जैसे थे। उनके पंखों की आवाज़ ऐसी थी जैसी रथों और युद्ध में जाते हुए बहुत-से घोड़ों के दौड़ने से होती है।
10उनकी पूंछें बिच्छुओं की सी थी। उनमें डंक थे। उनकी पूंछों में मनुष्यों को पांच माह तक पीड़ा देने की शक्ति थी।
11उन पर एक राजा था जो अथाह कुण्ड का दूत था। इब्रानी भाषा में उसका नाम अबद्दोन और यूनानी में अपुल्लयोन है।
12पहिली विपत्ति बीत चुकी। इसके पश्चात् दो विपत्तियां और आने वाली है।
13जब छठवें स्वर्गदूत ने तुरही फूंकी, तब मैंने सोने की वेदी जो परमेश्वर के सम्मुख है उसके चार सींगों में से एक शब्द सुना।
14वह छठवें स्वर्गदूत से, जिसके पास तुरही थी, कह रहा था, “उन चार स्वर्गदूतों को जो फरात महानदी के निकट बंधें हैं, खोल दे।
15वे चार स्वर्गदूत जो इसी घड़ी, दिन महीने और वर्ष के लिए रखे गए थे, मुक्त कर दिए गए कि वे मानवजाति की एक तिहाई को मार डाले।
16सेना के घुड़सवारों की संख्या बीस करोड़ थी; मैंने उनकी गिनती सुनी।
17और मुझे दर्शन में घोड़े और उनके सवार इस प्रकार दिखाई दिएः वे सवार कवच पहिने थे जो अग्नि, धूमक्रांत तथा गन्धक के रंगों के समान थे। घोड़ों के सिर सिंहों के सिरों के सदृश थे और उनके मुंह से अग्नि, धुआं और गन्धक निकलते थे।
18इन तीन महामारियों से, अर्थात उन के मुख से निकलने वाली अग्नि, धुआं और गन्धक से मनुष्य जाति की एक तिहाई नष्ट हो गई।
19उन घोड़ो की सामर्थ उनके मुंह और पूंछ में थी, क्योंकि इनकी पूंछें सर्पों के सदृश थीं और उनमें सिर थे। इन्हीं से वे हानि पहुंचाते थे।
20फिर भी शेष मनुष्यों ने, जो इन महामारियों से न मरे थे, अपने हाथों के कामों से मन न फिराया कि वे भूत-प्रेत तथा सोने, चांदी, पीतल, पत्थर, और काठ की प्रतिमाओं की पूजा न करें, जो न तो देख सकतीं, न सुन सकतीं और न चल सकतीं हैं;
21न उन्होंने हत्या के कार्यों से, न जादू-टोनों से , न व्यभिचार से, और न चोरी करने से मन फिराया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)