पुराना नियम · 1 शमूएल · अध्याय 17 / 31
1 शमूएल 17
1अब पलिश्तियों ने अपनी सेनाओं को युद्ध के लिए एकत्रित किया। वे यहूदा के सोको में एकत्रित हुए, और उन्होंने सोको तथा अजेका के बीच एफेस दम्मीम में छावनी डाली।
2शाऊल और इस्राएल पुरुष भी एकत्रित हुए, और उन्होंने एला की घाटी में छावनी डाली, तथा पलिश्तियों का सामना करने के लिए सेना तैनात की।
3पलिश्ती तो एक ओर के पहाड़ पर खड़े थे, जबकि इस्राएल दूसरी ओर के पहाड़ पर खड़े हुए। उनके बीच में घाटी थी।
4तब पलिश्तियों की सेना में से एक वीर योद्धा बाहर निकला जिसका नाम गोलियत था जो गत निवासी था और जिसकी ऊँचाई छः हाथ एक बित्ता थी।
5उसके सिर पर कांसे का टोप था, और वह शरीर पर कांसे का कवच पहने था जिसका वज़न पांच हज़ार शेकेल था।
6उसके पैरों पर कांसे के कवच थे तथा कन्धों के बीच कांसे की बरछी लटकी थी।
7उसके भाले की छड़ जुलाहे की बल्ली के समान थी। उस भाले के फल का वज़न छः सौ शेकेल लोहा था। उसका ढाल-वाहक भी उसके आगे-आगे चलता था।
8वह खड़ा हुआ, और इस्राएल सेना को ललकारते हुए बोला, “तुमने आकर युद्ध के लिए सेना तैनात क्यों की है? क्या मैं पलिश्ती नहीं? और क्या तुम शाऊल के दास नहीं? अपने लिए एक व्यक्ति चुन लो और उसे मेरे पास आने दो।
9यदि वह मुझ से युद्ध करके मुझे मार डालने में समर्थ हो तो हम तुम्हारे दास हो जाएंगे। परन्तु यदि मैं उसपर प्रबल होकर उसे मार डालूँ तो तुम हमारे दास होकर हमारी सेवा करोगे।”
10पुनः उस पलिश्ती ने कहा, “आज के दिन मैं इस्राएल सेना को चुनौती देता हूँ। एक मनुष्य को भेजो कि हम आपस में युद्ध कर सके।”
11जब शाऊल और सारे इस्राएल ने पलिश्ती के इन वचनों को सुना तब वे अत्यधिक व्याकुल और भयभीत हो गए।
12दाऊद तो यहूदा के बैतलहम के एप्राती पुरुष का पुत्र था जिसका नाम यिशै था और उसके आठ पुत्र थे। यिशै तो शाऊल के दिनों में वृद्ध हो गया था, तथा पुरुषों में बहुत आयु का था।
13यिशै के तीन बड़े पुत्र शाऊल की सेना में युद्ध के लिए गए थे। और उसके तीन पुत्र जो युद्ध में गए थे उनके नाम ये थेः ज्येष्ठ का नाम एलीआब, और उसके बाद वाले का नाम अबीनादाब और तीसरे का नाम शम्मा था।
14दाऊद सबसे छोटा था। तीन बड़े पुत्र तो शाऊल की सेवा में वहीं रहते थे,
15दाऊद अपने पिता की भेड़-बकरियां चराने के लिए शाऊल के पास से बैतलहम आया-जाया करता था।
16और वह पलिश्ती चालीस दिन तक सुबह-शाम सामने आकर खड़ा हुआ करता था।
17तब यिशै ने अपने पुत्र दाऊद से कहा, “अपने भाइयों के लिए यह एपा भर भुना-अनाज और ये दस रोटियां लेकर छावनी में भाइयों के पास दौड़कर पहुँचा दे।
18ये पनीर की दस टिकियां भी उनके सहस्रपति के लिए ले जा। फिर अपने भाइयों का कुशल-क्षेम ज्ञात करके और उनका समाचार लेकर लौट आ।
19क्योंकि शाऊल, तेरा भाई और इस्राएल के सब पुरुष एला की घाटी में पलिश्तियों से युद्ध कर रहे है।”
20अतः दाऊद बड़े सवेरे उठा। फिर भेड़ों के झुंड को उसने रखवाले के हाथ सौंप दिया। तब भोजन-वस्तुएं लेकर अपने पिता यिशै की आज्ञा के अनुसार प्रस्थान किया और जब सेना रणभूमि को जा रही थी और संग्राम के लिए ललकार रही थी, वह छावनी के घेरे के पास आया।
21इस्राएलियों और पलिश्तियों ने अपनी-अपनी सेना को युद्ध के लिए आमने-सामने तैनात कर दिया।
22तब दाऊद अपनी वस्तुएं सामान-रक्षक की सुरक्षा में रखकर युद्ध-पंक्ति की ओर दौड़ा और अपने भाइयों का कुशल-क्षेम पूछने के लिए वहां जा पहुँचा।
23वह उनसे बातें कर ही रहा था कि देखो, वह गत-निवासी गोलियत नामक पलिश्ती शूरवीर, पलिश्ती-सेना में से निकलकर सामने आ रहा था। उसने फिर वे ही बातें कहीं और दाऊद ने उनको सुना।
24जब इस्राएल के सब पुरुषों ने उस वीर को देखा तो भयभीत होकर भाग खड़े हुए।
25तब इस्राएलियों ने कहा, “क्या तुम ने इस पुरुष को देखा है जो चढ़ा आ रहा है? वह निःसन्देह, इस्राएल को ललकारने आ रहा है। ऐसा होगा कि जो मनुष्य उसको मार गिराएगा उसे राजा धन-सम्पत्ति से मालामाल कर देगा और अपनी पुत्री उसके साथ ब्याह देगा, तथा उसके पिता के परिवार को इस्राएल में स्वतंत्र कर देगा।”
26तब दाऊल ने अपने समीप खड़े हुए पुरुषों से कहा, “जो पुरुष इस पलिश्ती को मार गिराएगा तथा इस्राएल की निन्दा को दूर करेगा उसके लिए क्या किया जाएगा? यह ख़तना-रहित पलिश्ती होता कौन है जो जीवित परमेश्वर की सेना को ललकारे?”
27तब लोगों ने इन शब्दों में उत्तर दिया, “मारने वाले के लिए ऐसा-ऐसा किया जाएगा।”
28उसके बड़े भाई एलीआब ने उसको लोगों से बातें करते सुन लिया, और उसका क्रोध दाऊद के प्रति भड़क उठा। और उसने कहा, “तू यहां क्यों आया है? और तूने उन थोड़ी-सी भेड़-बकरियों को जंगल मे किसके पास छोड़ दिया है? मैं तेरी ढिठाई और तेरे हृदय की दुष्टता को जानता हूँ। तू तो युद्ध देखने के लिए यहाँ आया है।”
29परन्तु दाऊद ने कहा, “मैंने अभी क्या किया है? क्या वह केवल एक प्रश्न नहीं था?”
30तब उससे मुड़कर उसने दूसरे पुरुष से यही पूछा और लोगों ने पहले के समान ही उत्तर दिया।
31दाऊद की कही गई बातें सुनकर लोगों ने शाऊल को बता दिया और उसने उसको बुलवा भेजा।
32दाऊद ने शाऊल से कहा, “उस पुरुष के कारण किसी का हृदय कच्चा न पड़ने पाए। तेरा दास जाकर उस पलिश्ती से लड़ेगा।”
33तब शाऊल ने दाऊद से कहा, “तू उस पलिश्ती के विरुद्ध युद्ध करने के योग्य नहीं है क्याेंकि तू तो लड़का ही है, जबकि वह लड़कपन से ही योद्धा है।”
34परन्तु दाऊद ने शाऊल से कहा, “तेरा दास अपने पिता की भेड़-बकरियों को चराया करता था। जब कभी कोई सिंह या भालू आकर झुंड में से किसी मेमने को उठा लेता,
35तब मैं उसके पीछे दौड़कर उस पर आक्रमण करता और उसके मुँह से छुड़ा लेता था। और जब वह मुझ पर हमला करता तो मैं उसकी दाढ़ी पकड़कर प्रहार करता और उसे मार डालता था।
36तेरे दास ने सिंह और भालू, दोनों मारे है। यह ख़तना-रहित पलिश्ती भी उनमें से एक के समान हो जाएगा। क्योंकि उसने जीवित परमेश्वर की सेना को ललकारा है।”
37फिर दाऊद ने कहा, “यहोवा जिसने मुझे सिंह और भालू के पंजों से बचाया वही इस पलिश्ती के हाथ से मुझे बचाएगा।” तब शाऊल ने दाऊद ने कहा, “जा, यहोवा तेरे साथ रहे।”
38तब शाऊल ने दाऊद को अपने वस्त्र पहनाए, और उसके सिर पर कांसे का टोप रखा तथा उसे कवच पहनाया।
39दाऊद ने कवच के ऊपर तलवार कसी, और चलने का प्रयास किया क्योंकि उसने उनको परखा नहीं था। अतः दाऊद ने शाऊल से कहा, “मैं इनको पहन कर नहीं चल सकता क्योंकि मैंने इनको नहीं परखा है।” और दाऊद ने उनको उतार दिया।
40तब उसने हाथ में लाठी ली, और नाले में से पांच चिकने पत्थर चुन कर अपनी चरवाही के थैले, अर्थात् अपने झोले में रख लिए। और वह हाथ में गोफन लेकर पलिश्ती के सामने जा पहुंचा।
41तब वह पलिश्ती चलते-चलते दाऊद के सामने आया। पलिश्ती का ढाल ढोने वाला उसके आगे-आगे था।
42जब पलिश्ती ने दाऊद को देखा तब उसे तुच्छ जाना। क्योंकि वह तो लड़का ही था, उसके मुख पर लाली झलकती थी और वह रूपवान् था।
43और पलिश्ती ने दाऊद से कहा, “क्या मैं कुत्ता हूँ कि तू मेरे पास लाठी लेकर आया है?” फिर वह पलिश्ती अपने देवताओं का नाम ले-लेकर दाऊद को शाप देने लगा।
44पलिश्ती ने दाऊद से यह भी कहा, “मेरे पास आ। मैं तेरा मांस आकाश के पक्षियों और मैदान के वन-पशुओं को दूँगा।”
45तब दाऊद ने पलिश्ती से कहा, “तू तो मेरे पास तलवार, भाला और बर्छी लेकर आया है, परन्तु मैं सेनाओं के यहोवा, इस्राएल की सेना के परमेश्वर के नाम से तेरे पास आया हूँ जिसको तूने ललकारा है।
46आज ही यहोवा तुझको मेरे हाथ में कर देगा, और मैं तुझे मारूँगा और तेरा सिर तेरे धड़ से अलग कर दूँगा। फिर मैं आज ही पलिश्तियों की सेना की लोथें आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के वन-पशुओं को दूँगा जिससे समस्त पृथ्वी जान ले कि इस्राएल में परमेश्वर है,
47और यह समस्त मंडली जान लेगी कि यहोवा तलवार और भाले से छुटकारा नहीं देता। क्योंकि संग्राम तो यहोवा ही का है। और वह तुम्हें हमारे हाथ में कर देगा।”
48तब वह पलिश्ती उठकर आगे बढ़ा, और दाऊद का सामना करने के लिए समीप पहुँचा। उसी समय दाऊद पलिश्ती से मिलने के लिए युद्ध-पंक्ति की ओर तेजी से दौड़ा।
49दाऊद ने अपना हाथ अपनी थैली में डाला, और उसमें से एक पत्थर निकाला और गोफन से फेंक कर पलिश्ती के मस्तक पर मारा। वह पत्थर उसके मस्तक में धँस गया जिससे वह भूमि पर औंधे मुँह गिर पड़ा।
50इस प्रकार केवल गोफन और एक पत्थर ही के द्वारा दाऊद उस पलिश्ती पर प्रबल हुआ। उसने पलिश्ती पर प्रहार किया और उसे मार डाला। परन्तु दाऊद के हाथ में तलवार नहीं थी।
51तब दाऊद दौड़कर पलिश्ती के ऊपर खड़ा हो गया, और उसकी तलवार पकड़कर उसकी म्यान से खींची, और उसे मार डाला तथा उसका सिर काटकर अलग कर दिया। जब पलिश्तियों ने देखा कि उनका शूरवीर मारा गया है तब वे भाग खड़े हुए।
52तब इस्राएल और यहूदा के पुरुष ललकार उठे और घाटी के सिरे तथा एक्रोन के फाटकों तक पलिश्तियों का पीछा किया। मारे गए पलिश्ती शारेम के मार्ग में गत और एक्रोन तक बिछ गए।
53पलिश्तियों का पीछा करके लौटने के बाद इस्राएलियों ने उनकी छावनी को लूट लिया।
54तब दाऊद ने पलिश्ती का सिर लेकर उसको यरूशलेम पहुँचाया। परन्तु उसने उसके हथियारों को अपने तम्बू में रख लिया।
55जब शाऊल ने दाऊद को पलिश्ती का सामना करने के लिए जाते देखा तब उसने सेनापति अब्नेर से कहा, “अब्नेर, यह जवान किसका पुत्र है?” अब्नेर ने उत्तर दिया, “हे राजा, तेरे जीवन की शपथ! मैं नहीं जानता।”
56राजा ने कहा, “तू पता लगा, वह जवान किसका पुत्र है?”
57अतः दाऊद जब पलिश्ती को मारकर लौटा तब अब्नेर ने दाऊद को पलिश्ती का सिर हाथ में लिए हुए शाऊल के सामने उपस्थित किया।
58शाऊल ने दाऊद से पूछा, “हे जवान, तू किसका पुत्र है?” दाऊद ने उत्तर दिया, “मैं तेरे दास बैतलहमी यिशै का पुत्र हूँ।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)