पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 3 / 50
उत्पत्ति 3
1यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे उन सबमें सर्प धूर्त था। और उसने स्त्री से कहा, “क्या परमेश्वर ने सचमुच कहा है कि तुम इस वाटिका के किसी भी वृक्ष में से न खाना?”
2स्त्री ने सर्प से कहा, “वाटिका के वृक्षों के फल तो हम खा सकते हैं,
3परन्तु उस वृक्ष के फल में से जो वाटिका के बीचों-बीच है, परमेश्वर ने कहा है कि न तो उसमें से खाना और न उसे छूना, नहीं तो मर जाओगे।”
4तब सर्प ने स्त्री से कहा, “तुम निश्चय न मरोगे!
5परमेश्वर तो जानता है कि जिस दिन तुम उसमें से खाओगे, तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी और तुम भले और बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के समान हो जाओगे।”
6जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा, आंखों के लिए लुभावना, तथा बुद्धिमान बनाने के लिए चाहने योग्य है तो उसने उसका फल तोड़कर खाया, और साथ ही साथ अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया।
7तब उन दोनों की आंखें खुल गईं और उन्हें मालूम हुआ कि हम तो नंगे है। और उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़-जोड़ कर अपने लिए लंगोट बना लिए।
8फिर उन्हें दिन के ठण्डे समय वाटिका में यहोवा परमेश्वर के चलने का शब्द सुनाई दिया, और यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति से आदम तथा उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों में छिप गए।
9तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, “तू कहां है?”
10उसने कहा, “वाटिका में तेरी वाणी को सुनकर मैं डर गया, क्योंकि मैं नंगा था। अतः मैं छिप गया।”
11उसने कहा, “तुझे किसने बताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष में से खाने के लिए मैंने मना किया था क्या तूने उसमें से खाया है?”
12आदम ने कहा, “जिस स्त्री को तूने मेरे साथ रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया।”
13तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, “तूने यह क्या किया?” स्त्री ने कहा, “सर्प ने मुझे बहका दिया, और मैंने खाया।”
14तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, “इसलिए कि तूने यह किया है, तू सब घरेलू पशुओं और प्रत्येक वन-पशु से अधिक शापित हैः तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटा करेगा।
15और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, तथा तेरे वंश और इसके वंश के बीच में, बैर उत्पन्न करूंगाः वह तेरे सिर को कुचलेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।”
16स्त्री से उसने कहा, “मैं तेरी प्रसव-पीड़ा को अधिक बढ़ाऊंगा। तू पीड़ा में ही बच्चे उत्पन्न करेगी, फिर भी तेरी लालसा तेरे पति के लिए होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।”
17तब आदम से उसने कहा, “क्योंकि तूने अपनी पत्नी की बात मानकर उस वृक्ष का फल खाया जिसके लिए मैंने आज्ञा देकर कहा था कि तू उसमें से न खाना, इसलिए भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर कठिन परिश्रम के साथ खाया करेगा।
18वह तेरे लिए कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत का साग-पात ही खाया करेगा।
19तू अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा, क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है। तू मिट्टी तो है, अतः मिट्टी में फिर मिल जाएगा।”
20तब आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा, क्योंकि पृथ्वी पर जीवित सब मनुष्यों की आदिमाता वही हुई।
21और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के वस्त्र बनाकर उनको पहना दिए।
22तब यहोवा परमेश्वर ने कहा, “देखो, यह मनुष्य भले और बुरे का ज्ञान पाकर हममें से एक के समान हो गया है। अब ऐसा न हो कि वह अपना हाथ बढ़ाकर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़कर खा ले और सदा जीवित रहे”-
23इसलिए यहोवा परमेश्वर ने उसे अदन की वाटिका से बाहर निकाल दिया कि उसी भूमि पर खेती करे जिसमें से वह बनाया गया था।
24अतः उसने आदम को बाहर निकाल दिया तथा जीवन के वृक्ष के मार्ग की रक्षा करने के लिए अदन के बगीचे के पूर्व की ओर करूबों को और चारों ओर घूमने वाली ज्वालामय तलवार को नियुक्त कर दिया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)