नया नियम · इब्रानियों · अध्याय 11 / 13
इब्रानियों 11
1विश्वास तो आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।
2इसी के कारण प्राचीनकाल के लोगों की अच्छी गवाही दी गई।
3विश्वास ही से हम जानते हैं कि परमेश्वर के वचन के द्वारा समस्त सृष्टि की रचना ऐसी की गई कि जो कुछ देखने में आता है, वह दिखाई देने वाली वस्तुओं से नहीं बनाया गया था।
4विश्वास ही से हाबिल ने परमेश्वर के लिए कैन से उत्तम बलिदान चढ़ाया, जिसके द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही दी गई और परमेश्वर ने उसकी भेंटों के विजय में गवाही दी। यघपि हाबिल मर चुका है, फिर भी विश्वास के द्वारा अब तक बोलता है।
5विश्वास ही से हनोक ऊपर उठा लिया गया कि वह मृत्यु को न देखे। उसका फिर पता न चला, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया था। उसके लिए यह गवाही दी गई थी कि उठाए जाने से पूर्व, वह परमेश्वर को प्रिय था।
6विश्वास के बिना उसे प्रसन्न करना असम्भव है, क्योंकि जो कोई परमेश्वर के पास आता है, उसके लिए यह विश्वास करना आवश्यक है कि वह है, और अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है।
7विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विजय में जो उस समय तक दिखाई नहीं देती थीं, चेतावनी पाकर भय के साथ अपने परिवार के बचाव के लिए जहाज़ बनाया। इस प्रकार उसने संसार को दोषी ठहराया, और उस धार्मिकता का उत्तराधिकारी हुआ जो विश्वास के अनुसार है।
8विश्वास ही से इब्राहीम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसे स्थान को चला गया जो उसे उत्तराधिकार में मिलने वाला था। वह नहीं जानता था कि मैं कहां जा रहा हूं, फिर भी चला गया।
9विश्वास ही से वह प्रतिज्ञा के देश में परदेशी होकर रहा, अर्थात् परदेश में इसहाक और याकूब के साथ जो उसी के समान प्रतिज्ञा के उत्तराधिकारी थे, तम्बुओं में रहा।
10वह उस स्थिर नींव वाले नगर की प्रतीक्षा में था जिस का रचने और बनाने वाला परमेश्वर है।
11विश्वास ही से सारा ने अवस्था ढल जाने पर भी गर्भ धारण की सामर्थ पाई, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा करने वाले को विश्वासयोग्य जाना।
12इसी कारण एक ही मनुष्य से, जो मृतप्राय था, आकाश के तारों और सागर-तट की बालू के समान असंख्य सन्तान उत्पन्न हुईं।
13ये सब विश्वास की दशा में मरे। इन्होंने प्रतिज्ञा की गई वस्तुओं को प्राप्त नहीं किया, परन्तु उन्हें दूर ही से देख कर उनका अभिवादन किया और मान लिया कि हम पृथ्वी पर परदेशी और पराए है।
14जो ऐसा कहते हैं वे यह स्पष्ट कर देते हैं कि वे तो अपने निज देश की खोज में है।
15यदि वे उस देश के विजय सोचते जिस से वे निकले थे तो उन्हें लौट जाने का अवसर होता।
16पर वे एक उत्तम अर्थात् स्वर्गिक देश के अभिलाजी है। इसलिए परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने से नहीं लजाता, क्योंकि उसने उनके लिए एक नगर तैयार किया है।
17विश्वास ही से इब्राहीम ने परखे जाने के समय इसहाक को वेदी पर चढ़ाया, अर्थात् जिसे प्रतिज्ञाएं मिली थीं वही अपने एकलौते पुत्र को बलि चढ़ाने पर था।
18उसी से यह कहा गया था, “इसहाक से तेरा वंश चलेगा।”
19उसने यह मान लिया कि परमेश्वर, लोगों को मरे हुओं में से जीवित करने में समर्थ है-जहां से उसने, दृष्टान्त के रूप में, उसे पा भी लिया।
20विश्वास ही से इसाक ने याकूब और एसाव को भविष्य में होने वाली बातों के विषय में आशिज दी।
21विश्वास ही से याकूब ने अपनी मृत्यु के समय यूसुफ के प्रत्येक पुत्र को आशिज दी, और अपनी लाठी के सिरे पर सहारा लेकर उपासना की।
22विश्वास ही से यूसुफ ने अपनी मत्यु के समय इस्राएल की सन्तानों के निर्गमन की चर्चा की, और अपनी अस्थियों के विजय में आदेश दिए।
23विश्वास ही से मूसा को, जब वह पैदा हुआ था, उसके माता-पिता ने तीन महीने तक छिपा रखा, क्योंकि उन्होंने देखा कि बालक सुन्दर है, और वे राजा की आज्ञा से न डरे।
24विश्वास ही से मूसा ने बड़े हो जाने पर पि़फ़रौन की बेटी का पुत्र कहलाना अस्वीकार कर दिया।
25उसने पाप के क्षणिक सुख भोगने की अपेक्षा, परमेश्वर की प्रजा के साथ दुख भोगना ही अच्छा समझा।
26उसने मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के धन के भण्डारों की अपेक्षा बढ़कर समझा, क्योंकि वह प्रतिफल पाने की आस लगाए था।
27विश्वास ही से उसने राजा के क्रोध की चिन्ता न करते हुए मिस्र देश को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखते हुए दृढ़ बना रहा।
28विश्वास ही से उसने फसह के पर्व और लहू छिड़कने की विधि को माना, जिससे कि वह जिसने पहिलौठों का नाश किया, उन्हें छूने न पाए।
29विश्वास ही से वे लाल समुद्र में से ऐसे पार हो गए मानो सूखी भूमि पर चलकर गए हों, और जब मिस्रियों ने भी वैसा ही करना चाहा तो वे डूब मरे।
30विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह भी ढह गई जब वे सात दिन तक उसकी परिक्रमा कर चुके।
31विश्वास ही से राहाब वेशया भी आज्ञा न मानने वालों के साथ नाश नहीं हुई, क्योंकि उसने गुप्तचरों को कुशलता से रखा था।
32इससे अधिक और क्या कहूं? क्योंकि समय नहीं कि मैं गिदोन, बाराक, शिमशोन, यिफतह, दाऊद, शमूएल और नबियों का वर्णन करूं,
33जिन्होंने विश्वास ही से राज्य जीते, धार्मिकता के कार्य किए, प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएं प्राप्त कीं, सिंहों के मुंह बन्द किए,
34आग की ज्वाला को शान्त किया, तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में बलवान किए गए, युद्ध में वीरता दिखाई, विदेशी सेना को मार भगाया।
35स्त्रियों ने पुनरुत्थान के द्वारा अपने मृतकों को पुनः जीवित पाया। कुछ को यातनाएं दी गईं, परन्तु उन्होंने छुटकारा न चाहा जिससे कि वे एक उत्तम पुनरुत्थान को प्राप्त करे।
36कई लोग ठट्ठों में उड़ाए जाने, कोड़े खाने वरन् बन्धनों व व़फ़ैद में पड़ने के द्वारा परखे गए।
37उनका पथराव हुआ। आरे से चीर कर उनके दो टुकड़े कर दिए गए। उनकी परीक्षा की गई। तलवार के घाट उतारे गए। वे दरिद्रता, क्लेश और दुख भोगते हुए भेड़ और बकरियों की खाल पहिने इधर-उधर भटकते फिरे-
38संसार उनके योग्य नहीं था। वे रेगिस्तानों, पर्वतों, गुफाओं और पृथ्वी की दरारों में छिपते फिरे।
39यघपि विश्वास ही के कारण इन सब की अच्छी गवाही दी गई, फिर भी उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तु को प्राप्त न किया।
40क्योंकि परमेश्वर ने हमारे लिए पहिले ही से एक उत्तम बात ठहराई थी कि वे हमारे बिना सिद्धता प्राप्त न करे।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)