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पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 59 / 66

यशायाह 59

1देखो, यहोवा का हाथ ऐसा छोटा नहीं कि उद्धार न कर सके, न ही उसका कान ऐसा बहरा है कि सुन न सके।

2परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ही ने तुम्हें तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उसका मुख तुमसे छिप गया है जिस से वह नहीं सुनता।

3क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से और तुम्हारी उंगलियां अधर्म से अशुद्ध हो गई है। तुम्हारे होंठों ने झूठ बोला और तुम्हारी जीभ बुरी बातें बकती है।

4न कोई न्याय से नालिश करता और न कोई सच्चाई से वकालत करता है। लोग तो भ्रान्तिपूर्ण बातों में भरोसा रखते और झूठ बोलते है। वे उत्पात का गर्भधारण करते और अधर्म को उत्पन्न करते है।

5वे करैत के अंडे सेते और मकड़ी के जाले बुनते है। जो कोई उनके अंडे खाता वह मर जाता है, और कुचलने पर उन अंड़ों से सांप ही निकलते है।

6उनके जाले वस्त्रों का काम न देंगे, न ही वे अपने हस्त-कार्यों से अपने आपको ढांप सकेंगे। उनके काम तो अधर्म के हैं, और उनके हाथों से हिंसात्मक कार्य ही होते है।

7उनके पैर बुराई की ओर दौड़ते हैं, और वे निर्दोष का लहू बहाने को आतुर रहते हैं, उनके विचार अधर्म ही के विचार है; उनके मार्गों में उजाड़ और विनाश ही है।

8वे शान्ति का मार्ग नहीं जानते, और उनके मार्गों में न्याय है ही नही। उन्होंने कुटिल पथ अपनाए हैं जो कोई उन पर चलता है उसे शान्ति नहीं मिलती।

9इस कारण न्याय हमसे दूर है और धार्मिकता हमारे समीप नहीं आती। हम उजियारे की आशा करते हैं, परन्तु देखो, अंधियारा ही पाते है। हम प्रकाश तो चाहते हैं पर चलते हैं अन्धकार मे।

10हम अन्धे मनुष्यों की भांति दीवार टटोलते रहते है। हम दृष्टिहीनों के समान टटोलते फिरते है। हम दिन-दोपहर में ठोकर खाते हैं मानो धुंधलके में हम हृष्ट-पुष्टों के मध्य मुर्दों के समान है।

11हम सब-के-सब रीछों के समान चिल्लाते हैं, और पंडुकों के समान कराहते है। हम न्याय की आशा तो करते हैं पर वह है ही नहीं, और उद्धार की बाट जोहते हैं पर वह हमसे दूर ही रहता है।

12क्योंकि हमारे अपराध तेरे सामने अनगिनित हैं, हमारे पाप हमारे विरुद्ध साक्षी देते है। हमारे अपराध तो हमारे संग हैं, और हम अपने अधर्म के काम जानते हैं:

13हमने अपराध किया, यहोवा का इनकार किया, और अपने परमेश्वर के पीछे चलना छोड़ दिया है। हम उलट-फेर और विद्रोह की बातें करते है। हमने अपने मन में झूठी बातें गढ़ीं और कही भी है।

14न्याय तो पीछे हटाया जाता, और धार्मिकता दूर खड़ी रह जाती। सत्य ने मार्ग में ठोकर खाई है और खराई टिक नहीं पाती।

15हां, सच्चाई तो है ही नहीं, और जो बुराई से मुंह फेर लेता है वह स्वयं शिकार हो जाता है। यहोवा ने इसे देखा, और यह उसकी दृष्टि में अनुचित ठहरा कि न्याय जाता रहा।

16उसने देखा कि कोई भी मनुष्य नहीं और अचम्भा कि कोई मध्यस्थ न रहा। तब उसकी अपनी ही भुजा ने उद्धार किया, और उसकी धार्मिकता ने उसे सम्भाला।

17उसने धार्मिकता को कवच के समान धारण किया और अपने सिर पर उद्धार का टोप रखा। उसने वस्त्र के स्थान पर पलटा लेने की पोशाक पहन ली, और जलजलाहट को चादर के समान ओढ़ लिया।

18उनके कर्मों के अनुसार वह उनको प्रतिफल देगा, अर्थात् अपने द्रोहियों पर कोप करेगा और शत्रुओं से बदला लेगा। द्वीप भी उसके द्वारा अपना उचित दण्ड भोगेंगे।

19तब पश्चिम की ओर से यहोवा के नाम का और सूर्योदय की ओर से उसकी महिमा का भय मानेंगे, क्योंकि वह ऐसी प्रचंड धारा के समान आ पड़ेगा जिसे यहोवा का श्वास बहाता हो।

20यहोवा की यह वाणी हैः “सिय्योन में अर्थात् याकूब में उनके पास जो अपने अपराध से मन फिराते हैं एक छुड़ाने वाला आएगा।”

21यहोवा ने कहा है, “जो वाचा मैंने उनसे बांधी है वह यह हैः मेरा आत्मा जो तुझ पर ठहरा है, और अपने वचन जो मैंने तेरे मुंह में डाले हैं वे तेरे मुंह से, तेरे वंश के मुंह से, और तेरे पोतों-परपोतों के मुंह से आज से लेकर सदा तक कभी न हटेंगे।” यहोवा की यही वाणी है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)