Loading account

पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 6 / 66

यशायाह 6

1जिस वर्ष उज्जियाह राजा की मृत्यु हुई, मैंने प्रभु को ऊंचे और भव्य सिंहासन पर विराजमान देखा। उसके वस्त्र के घेर से मन्दिर भरा हुआ था।

2उससे ऊपर साराप थे, जिनके छः छः पंखे थे; दो से वे अपने-अपने मुंह को ढांपे हुए थे और दो से अपने-अपने पैरों को ढांपे हुए थे और दो से उड़ रहे थे।

3वे एक दूसरे से पुकार-पुकार कर कह रहे थे, “सेनाओं का यहोवा, पवित्र, पवित्र, पवित्र है! सम्पूर्ण पृथ्वी उसके तेज से भरपूर है।”

4पुकारने वाले की वाणी से डेवढ़ियों की नींवें कांप उठीं और भवन धुएं से भर गया।

5तब मैंने कहा, “मुझ पर हाय, मैं तो नष्ट हुआ, क्योेंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूं, मैं अशुद्ध होंठवाले मनुष्यों के बीच में रहता हूं, और मैंने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिकार को अपनी आंखों से देखा है।”

6तब एक साराप हाथ में अंगारा लिए हुए, जिसे उसने चिमटे से वेदी पर से उठा लिया था, उड़ते हुए मेरे पास आया।

7और उसने उससे मेरे मुंह को छूकर कहा, “देख, इसने तेरे होंठों को छू लिया है, इसलिए तेरा अधर्म दूर हो गया, और तेरे पाप क्षमा हो गए है।”

8तब मैंने प्रभु का यह वचन सुना, “मैं किसको भेजूं, और हमारी ओर से कौन जाएगा?” तब मैंने कहा, “मैं यहां हूं, मुझे भेज!”

9और उसने कहा, “जा, और इन लोगों से कहः सुनते ही रहो, पर न समझो, देखते ही रहो, पर न बूझो।

10इन लोगों के मन को मोटा और इनके कानों को भारी तथा इनकी आंखों को बन्द कर, ऐसा न हो कि वे अपनी आंखों से देखें और कानों से सुनें और मन से समझें और मन फिराकर चंगे हो जाए।”

11तब मैंने कहा, “हे प्रभु, कब तक?” और उसने उत्तर दिया, “जब तक कि नगरों का विनाश न हो जाए और उनमें कोई रह न जाए, घरों में कोई मनुष्य न बचे, और यह देश पूर्णतः उजड़ न जाए,

12और यहोवा मनुष्यों को उसमें से बहुत दूर न ले जाए, और देश में बहुत-से निर्जन स्थान न हो जाए।

13चाहे उसमें लोगों का दसवां भाग ही रह जाए, फिर भी वह भस्म किया जाएगा। जैसे तारपीन के अथवा बांज के वृक्ष के कटने पर भी उसका ठूंठ शेष रहता है, वैसे ही पवित्र वंश मानो उसका ठूंठ है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)