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नया नियम · यूहन्ना · अध्याय 1 / 21

यूहन्ना 1

1आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

2यही आदि में परमेश्वर के साथ था।

3सब कुछ उसके द्वारा उत्पन्न हुआ; और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कुछ भी उसके बिना उत्पन्न न हुआ।

4उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।

5और ज्योति अंधकार में चमकती है, परन्तु अंधकार ने उसे ग्रहण नहीं किया।

6परमेश्वर की ओर से भेजा हुआ एक मनुष्य आया जिसका नाम यूहन्ना था।

7वह साक्षी देने आया कि उस ज्योति की साक्षी दे, कि सब उसके द्वारा विश्वास करे।

8वह स्वयं तो ज्योति न था, परन्तु इसलिए आया कि वह ज्योति की साक्षी दे।

9वह सच्ची ज्योति जो प्रत्येक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी।

10वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे न पहचाना।

11वह अपनों के पास आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।

12परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं-

13वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, और न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए है।

14और वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच में निवास किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी जैसी पिता के इकलौते की महिमा जो अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो।

15यूहन्ना ने उसके विषय में साक्षी दी और पुकारकर कहा, “यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा, ‘वह जो मेरे बाद आने वाला है मुझसे आगे है, क्योंकि वह मुझसे पहले था’।”

16क्योंकि उसकी परिपूर्णता में से हम सबने पाया, अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह।

17क्योंकि व्यवस्था मूसा के द्वारा दी गई, पर अनुग्रह और सच्चाई तो यीशु मसीह के द्वारा पहुंची।

18परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा; परमेश्वर इकलौता जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रकट किया।

19यूहन्ना की साक्षी यह है जब यहूदियों ने उसके पास यरूशलेम से याजकों और लेवियों को यह पूछने भेजा कि वह कौन है।

20उसने मान लिया-और अस्वीकार नहीं किया, वरन् मान ही लिया, “मैं मसीह नहीं हू।”

21तब उन्होंने उससे पूछा, “तो फिर क्या? क्या तू एलिय्याह है?” उसने कहा, “मैं नहीं हूं” “क्या तू वह नबी है?” उसने उत्तर दिया, “नही।”

22तब उन्होंने उससे पूछा, “तो फिर तू है कौन कि हम अपने भेजने वालों को उत्तर दे सकें? तू अपने विषय में क्या कहता है?”

23उसने कहा, “मैं जंगल में एक पुकारने वाले की आवाज़ हूं, ‘प्रभु का मार्ग सीधा करो,’ जैसा कि यशायाह नबी ने कहा था।”

24ये तो फरीसियों की ओर से भेजे गए थे।

25तब उन्होंने उससे पूछा, “तब तू न तो मसीह है, न एलिय्याह और न वह नबी, तब तू बपतिस्मा क्यों देता है?”

26यूहन्ना ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तो जल से बपतिस्मा देता हूं, परन्तु तुम्हारे बीच में एक व्यक्ति खड़ा है, जिसे तुम नहीं जानते हो।

27यह वही है जो मेरे पश्चात् आने वाला है और जिसके जूते का बँध खोलने के योग्य मैं नहीं हू।”

28ये बातें यरदन के पार बैतनिय्याह में हुईं जहाँ यूहन्ना बपतिस्मा देता था।

29दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, परमेश्वर का मेमना जो जगत का पाप उठा ले जाता है।

30यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘मेरे पीछे एक पुरुष आता है जो मुझसे आगे हो गया है, क्योंकि वह मुझसे पहले था।’

31और मैं भी उसे नहीं पहचानता था, परन्तु मैं इसलिए जल से बपतिस्मा देता हुआ आया कि वह इस्राएल पर प्रकट हो जाए।”

32और यूहन्ना ने यह कहते हुए साक्षी दीः “मैंने आकाश से आत्मा को कबूतर के समान उतरते देखा है और वह उसपर जा ठहरा।

33और मैं तो उसको नहीं पहचानता था, परन्तु जिसने मुझे जल से बपतिस्मा देने भेजा, उसी ने मुझसे कहा, ‘जिस पर तू आत्मा को उतरते और ठहरते देखे, पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देने वाला यही है।’

34और मैंने देखा और साक्षी दी है कि यही परमेश्वर का पुत्र है।”

35पुनः दूसरे दिन यूहन्ना अपने चेलों में से दो के साथ खड़ा हुआ था,

36और उसने यीशु को जाते हुए देखकर कहा, “देखो, परमेश्वर का मेमना!”

37और दोनों चेले उसकी बात सुनकर यीशु के पीछे हो लिए।

38यीशु ने मुड़कर उन्हें अपने पीछे आते देखा और उनसे कहा, “तुम किसकी खोज में हो?” उन्होंने कहा, “हे रब्बी (अर्थात् हे गुरु), तू कहाँ रहता है?”

39उसने उनसे कहा, “आओ तो देख लोगे।” तब उन्होंने जाकर देखा कि वह कहाँ रहता है, और उस दिन उसके साथ ठहरे, क्योंकि उस समय संध्या के लगभग चार बज चुके थे।

40जिन्होंने यूहन्ना की बात सुनी और यीशु के पीछे हो लिए, उन दोनों में से एक शमौन पतरस का भाई अन्द्रियास था।

41उसने पहले अपने सगे भाई शमौन को पाकर उससे कहा, “हमें मसीह, अर्थात् दृीष्ट मिल गया है।”

42और वह उसे यीशु के पास लाया। यीशु ने उसपर दृष्टि करके कहा, “तू यूहन्ना का पुत्र शमौन हैः तू कैफा, अर्थात् पतरस कहलाएगा।”

43दूसरे दिन यीशु ने गलील जाने का निश्चय किया, और फिलिप्पुस को पाकर उससे कहा, “मेरे पीछे चला आ।”

44फिलिप्पुस तो अन्द्रियास और पतरस के नगर बैतसैदा का था।

45फिलिप्पुस ने नतनएल को पाकर उससे कहा, “जिसके विषय व्यवस्था में मूसा ने, तथा अन्य नबियों ने भी लिखा है, वह अर्थात् यूसुफ का पुत्र, नासरत का यीशु” हमें मिल गया है।

46और नतनएल ने उससे कहा, “भला नासरत से भी कोई उत्तम वस्तु निकल सकती है?” फिलिप्पुस ने उससे कहा, “आकर देख ले।”

47यीशु ने नतनएल को अपनी ओर आते देखकर उसके विषय में कहा, “देखो, एक वास्तविक इस्त्रएली जिसमें कोई कपट नहीं!”

48नतनएल ने उससे कहा, “तू मुझे कैसे जानता है?” यीशु ने उसे उत्तर देते हुए कहा, “इससे पहले कि फिलिप्पुस ने तुझे बुलाया, जब तू अंजीर वृक्ष के नीचे था, मैंने तुझे देखा।”

49नतनएल ने उसे उत्तर दिया, “रब्बी, तू परमेश्वर का पुत्र है, तू इस्त्रएल का राजा है।”

50यीशु ने उसे उत्तर देते हुए कहा, “मैंने तुझसे कहा कि मैंने तुझे अंजीर वृक्ष के नीचे देखा, क्या इसीलिए तू विश्वास करता है? तू इनसे भी बड़े-बड़े काम देखेगा।”

51उसने फिर कहा, “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि तुम स्वर्ग को खुला हुआ और परमेश्वर के स्वर्गदूतों को मनुष्य के पुत्र के ऊपर चढ़ते और उतरते देखोगे।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)