नया नियम · यूहन्ना · अध्याय 15 / 21
यूहन्ना 15
1“सच्ची दाखलता मैं हूँ, और मेरा पिता किसान है।
2प्रत्येक डाली जो मुझमें है और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और प्रत्येक डाली जो फलती है उसे वह छांटता है कि और फले।
3“तुम उस वचन के कारण जो मैंने तुमसे कहा है शुद्ध हो चुके हो।
4तुम मुझमें बने रहो और मैं तुममे। जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझमें बने न रहो तो नहीं फल सकते।
5मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।
6यदि कोई मुझमें बना न रहे, तो वह डाली की भाँति फेंक दिया जाता है और सूख जाता है, और लोग उन्हें इकट्ठा कर आग में झोंक देते हैं और वे जल जाती है।
7यदि तुम मुझमें बने रहो, और मेरे वचन तुममें बने रहें तो जो चाहो मांगो, और वह तुम्हारे लिए हो जाएगा।
8मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत फल लाओ, तभी तो तुम मेरे चेले हो।
9जैसे पिता ने मुझसे प्रेम किया है, मैंने भी तुमसे प्रेम किया है। मेरे प्रेम में बने रहो।
10यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे तो तुम मेरे प्रेम में बने रहोगे, वैसे ही जैसे मैंने अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में बना रहता हूँ।
11ये बातें मैंने तुमसे इसलिए कही हैं कि मेरा आनन्द तुममें बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।
12मेरी आज्ञा यह है कि जैसे मैंने तुमसे प्रेम किया, वैसे ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम करो।
13इससे महान् प्रेम और किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे।
14जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो।
15अब से मैं तुम्हें दास नहीं कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है, परन्तु मैंने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि वे सब बातें जो मैंने अपने पिता से सुनी हैं तुम्हें बता दी है।
16तुमने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हे चुना और तुम्हें नियुक्त किया कि तुम फल लाओ और तुम्हारा फल बना रहे, कि तुम मेरे नाम से जो कुछ पिता से माँगो वह तुम्हें दे।
17मैं तुम्हें ये आज्ञाएं इसलिए देता हूँ कि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो।
18“यदि संसार तुमसे घृणा करता है तो तुम जानते हो कि उसने तुमसे पहले मुझसे घृणा की है।
19यदि तुम संसार के होते तो संसार अपनों से प्रेम करता; परन्तु इसलिए कि तुम संसार के नहीं हो और मैंने तुम्हें संसार में से चुनकर निकाल लिया है-इसलिए संसार तुमसे घृणा करता है।
20वह वचन जो मैंने तुमसे कहा स्मरण रखोः ‘दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं है।’ यदि उन्होंने मुझे सताया तो वे तुम्हें भी सताएंगे। यदि उन्होंने मेरी बात मानी तो वे तुम्हारी भी मानेंगे।
21परन्तु ये सब बातें वे मेरे नाम के कारण तुम्हारे साथ करेंगे, क्योंकि वे उसे जिसने मुझे भेजा नहीं जानते।
22यदि मैं न आता और उनसे बातें न करता तो वे पापी न ठहरते, परन्तु अब अपने पाप के लिए उनके पास कोई बहाना नहीं है।
23जो मुझसे घृणा करता है वह मेरे पिता से भी घृणा करता है।
24यदि मैं उनके मध्य वे काम न करता जिन्हें किसी और ने नहीं किये, तो वे पापी न ठहरते, परन्तु अब तो उन्होंने मुझे और मेरे पिता दोनों को देखा है, और दोनों से घृणा की है।
25परन्तु उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि वह वचन पूरा हो जो उनकी व्यवस्था में लिखा हैः ‘उन्होंने अकारण मुझसे घृणा की।’
26जब वह सहायक आएगा जिसे मैं पिता की ओर से तुम्हारे पास भेजूँगा, अर्थात् सत्य का आत्मा जो पिता से निकलता है, वह मेरी साक्षी देगा,
27और तुम भी साक्षी दोगे, क्योंकि तुम आरम्भ से ही मेरे साथ रहे हो।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)