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नया नियम · यूहन्ना · अध्याय 14 / 21

यूहन्ना 14

1“तुम्हारा हृदय व्याकुल न हो। तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो, मुझ पर भी विश्वास रखो।

2मेरे पिता के घर में रहने के बहुत-से स्थान हैं; यदि न होते, तो मैं तुमसे कह देता; क्योंकि मैं तुम्हारे लिए जगह तैयार करने जाता हू।

3और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिए जगह तैयार करूँ तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊँगा कि जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम भी रहो,

4और जहाँ मैं जा रहा हूं तुम वहाँ का मार्ग जानते हो।”

5थोमा ने उससे कहा, “हे प्रभु, हम नहीं जानते कि तू कहाँ जा रहा है, तो मार्ग कैसे जानें?”

6यीशु ने उससे कहा, “मार्ग, सत्य और जीवन मैं ही हूँ। बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं आ सकता।

7यदि तुमने मुझे जाना होता तो मेरे पिता को भी जानते। अब से तुम उसे जानते हो और तुमने उसे देखा भी है।”

8फिलिप्पुस ने उससे कहा, “हे प्रभु, हमको पिता दिखा दे और यही हमारे लिए पर्याप्त है।”

9यीशु ने उससे कहा, “फिलिप्पुस, मैं इतने समय से तेरे साथ हूँ, फिर भी तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है, उसने पिता को देखा है। तू कैसे कहता है, ‘हमको पिता दिखा दे?’

10क्या तू विश्वास नहीं करता कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझमें है? जो वचन मैं तुमसे कहता हूँ वह अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता जो मुझमें रहता है वही अपने कार्य करता है।

11मेरा विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझमें, अन्यथा कामों ही के कारण मेरा विश्वास करो।

12मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि जो मुझपर विश्वास करता है, वे कार्य जो मैं करता हूँ, वह भी करेगा, और इनसे भी महान् कार्य करेगा, क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ।

13और जो कुछ तुम मेरे नाम से मांगोगे, वही करूँगा कि पुत्र में पिता की महिमा हो।

14यदि तुम मुझसे मेरे नाम में कुछ भी मांगोगे तो मैं उसे करूँगा।

15“यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो, तो मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे।

16और मैं पिता से विनती करूँगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा कि वह सदा तुम्हारे साथ रहे,

17अर्थात् सत्य का आत्मा जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह उसे न तो देखता है और न जानता है, परन्तु तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और तुममें होगा।

18मैं तुम्हें अनाथ न छोडूंगा; मैं तुम्हारे पास आऊँगा।

19थोड़ी देर पश्चात् संसार मुझे फिर नहीं देखेगा, परन्तु तुम मुझे देखोगे। मैं जीवित हूँ, इसलिए तुम भी जीवित रहेागे।

20उस दिन तुम जानोगे कि मैं अपने पिता में और तुम मुझमें, और मैं तुममें हू।

21जिसके पास मेरी आज्ञाएं हैं और वह उनका पालन करता है, वही मुझसे प्रेम करता है, और जो मुझसे प्रेम करता है, उससे मेरा पिता प्रेम करेगा, और मैं उससे प्रेम करूँगा और अपने आप को उसपर प्रकट करूँगा’।”

22यहूदा ने जो इस्करियोती नहीं था, उससे कहा, “प्रभु, ऐसा क्या हुआ है कि तू अपने आप को हम पर प्रकट करना चाहता है और संसार पर नहीं?”

23यीशु ने उत्तर देते हुए उससे कहा, “यदि कोई मुझसे प्रेम करता है तो वह मेरे वचन का पालन करेगा, और मेरा पिता उससे प्रेम करेगा, और हम उसके पास आएँगे तथा उसके साथ निवास करेंगे।

24जो मुझसे प्रेम नहीं करता, वह मेरे वचन का पालन नहीं करता; और जो वचन तुम सुनते हो वह मेरा नहीं, वरन् पिता का है जिसने मुझे भेजा।

25“ये बातें तुम्हारे साथ रहते हुए मैंने तुमसे कही।

26परन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम में भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और सब कुछ जो मैंने तुमसे कहा, तुम्हें स्मरण कराएगा।

27मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ; अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ; ऐसे नहीं देता जैसे संसार तुम्हें देता है। तुम्हारा मन व्याकुल न हो, और न भयभीत हो।

28तुमने सुना कि मैंने तुमसे कहा, ‘मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊंगा।’ यदि तुम मुझसे प्रेम करते तो आनन्दित होते, इसलिए कि मैं पिता के पास जाता हूँ; क्योंकि पिता मुझसे बढ़कर है।

29और इसके होने से पहले मैंने तुम्हें अभी बता दिया है, जिससे कि जब यह हो जाए तो तुम विश्वास करो।

30मैं तुमसे अब और अधिक न कहूँगा, क्योंकि इस संसार का शासक आ रहा है, और उसका मुझपर कोई अधिकार नहीं,

31परन्तु इसलिए कि संसार जान ले कि मैं पिता से प्रेम करता हूँ और जिस प्रकार पिता ने मुझे आज्ञा दी है मैं वैसे ही उसका पालन करता हूँ। उठो, यहाँ से चले।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)