नया नियम · लूका · अध्याय 6 / 24
लूका 6
1ऐसा हुआ कि किसी सब्त के दिन वह खेतों में से होकर जा रहा था और उसके चेले अन्न की बालें तोड़-तोड़कर और हाथों से मसल-मसलकर खा रहे थे।
2तब कुछ फरीसियों ने कहा, “तुम ऐसा काम क्योें करते हो जो सब्त के दिन करना उचित नहीं?”
3यीशु ने उत्तर दिया, “क्या तुमने यह भी नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उसके साथियों को भूख लगी तो उसने क्या किया?
4वह कैसे परमेश्वर के भवन में गया और भेंट की रोटियां लेकर स्वयं खाईं जिन्हें खाना याजकों के सिवाय अन्य किसी व्यक्ति के लिए उचित नहीं, और उन्हें अपने साथियों को भी दीं?”
5और उसने यह भी कहा, “मनुष्य का पुत्र सब्त का भी प्रभु है।”
6ऐसा हुआ कि किसी अन्य सब्त के दिन वह आराधनालय में जाकर उपदेश देने लगा, और वहां एक मनुष्य था जिसका दाहिना हाथ सूखा था।
7शास्त्री और फरीसी इस ताक में थे कि देखें वह सब्त के दिन चंगा करता है या नहीं, जिससे कि उन्हें उसपर दोष लगाने का अवसर मिल सके।
8परन्तु वह उनके विचारों को जानता था, अतः उसने सूखे हाथ वाले से कहा, “उठकर सामने आ,” और वह उठ-खड़ा हुआ।
9फिर यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुमसे पूछता हूँ कि क्या सब्त के दिन भला करना उचित है या बुरा करना, एक जीवन बचाना या उसे नष्ट करना?”
10फिर उसने उन सब पर दृष्टि डालकर उससे कहा, “अपना हाथ बढ़ा!” और उसने ऐसा ही किया, और उसका हाथ पूर्णतः स्वस्थ हो गया।
11इस पर वे आपे से बाहर होकर आपस में तर्क-वितर्क करके कहने लगे कि हम यीशु के साथ क्या करें?
12इन्हीं दिनों में वह पहाड़ पर प्रार्थना करने गया और उसने सारी रात परमेश्वर से प्रार्थना करने में व्यतीत की।
13जब दिन निकला तो उसने अपने चेलों को अपने पास बुलाया और उनमें से बारह को चुनकर उन्हें ‘प्रेरित’ नाम दिया, अर्थात्
14शमौन जिसका नाम उसने पतरस भी रखा, और उसका भाई अन्द्रियास, याकूब और यूहन्ना, फिलिप्पुस, बरतुलमै,
15मत्ती, थोमा, हलफई का पुत्र याकूब, और शमौन जो उत्साही भक्त कहलाता है,
16और याकूब का बेटा यहूदा, और यहूदा इस्करियोती जो विश्वासघाती निकला।
17तब वह उनके साथ नीचे उतरकर समतल स्थान पर खड़ा हुआ और उसके चेलों की एक बड़ी भीड़ के साथ समस्त यहूदिया, यरूशलेम व सूर और सैदा के समुद्र-तट से विशाल जनसमूह वहां उपस्थित था।
18वे उसका उपदेश सुनने और रोगों से छुटकारा पाने आए थे, और वे जो अशुद्ध आत्माओं द्वारा सताए हुए थे अच्छे किए जा रहे थे।
19समस्त जनसमूह उसे छूने का प्रयत्न कर रहा था, क्योंकि उसमें से सामर्थ्य निकलकर उन सबको चंगा कर रही थी।
20तब वह अपने चेलों की ओर देखकर कहने लगा, “धन्य हो तुम जो दीन हो, क्योंकि परमेश्वर का राज्य तुम्हारा है।
21धन्य हो तुम जो अभी भूखे हो, क्योंकि तृप्त किए जाओगे। धन्य हो तुम जो अभी रोते हो, क्योंकि तुम हंसोगे।
22धन्य हो तुम जब मनुष्य के पुत्र के कारण लोग तुमसे घृणा करें, तुम्हें बहिष्कृत करें, तुम्हारी अत्यन्त निन्दा करें और बुरा समझकर तुम्हारा नाम काट दे।
23उस दिन तुम आनन्दित होकर उछलना-कूदना, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हारे लिए बड़ा प्रतिफल है, क्योंकि उनके पूर्वज भी नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।
24परन्तु हाय तुमपर जो धनवान हो, क्योंकि तुम अपने सुख का पूरा फल पा रहे हो।
25हाय तुमपर जो अब तृप्त हो, क्योंकि तुम भूखे होगे। हाय तुमपर जो अब हँसते हो, क्योंकि तुम शोकित होओगे और रोओगे।
26हाय तुमपर जब सब मनुष्य तुम्हारी प्रशंसा करें, क्योंकि उनके पूर्वजों ने भी झूठे नबियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया था।
27“परन्तु मैं तुम सुननेवालों से कहता हूँ, अपने शत्रुओं से प्रेम करो, जो तुमसे घृणा करते हैं उनकी भलाई करो।
28जो तुम्हें शाप देते हैं उन्हें आशीष दो, जो तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं उनके लिए प्रार्थना करो।
29जो कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे उसकी ओर दूसरा भी फेर दो, जो तुम्हारा चोगा तुमसे छीन ले उसे कुरता लेने से भी न रोको।
30जो कोई तुमसे मांगे उसे दो, और जो कोई तुम्हारी वस्तु छीन ले उससे फिर मत मांगो।
31जैसा तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो।
32यदि तुम अपने प्रेम करने वालों से ही प्रेम करो तो इसमें तुम्हारी क्या बड़ाई है, क्योंकि पापी भी तो अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।
33यदि तुम अपने भलाई करने वालों के साथ भलाई करो तो इसमें तुम्हारी क्या बड़ाई है, क्योंकि पापी भी तो ऐसा ही करते हैं।
34यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो जिनसे पाने की आशा है तो इसमें तुम्हारी क्या बड़ाई? क्योंकि पापी भी पापियों को उधार देते हैं कि उतना ही फिर पाए।
35परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो, और उधार देकर पाने की आशा मत रखो, और तुम्हारे लिए प्रतिफल बड़ा होगा और तुम परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह स्वयं अकृतज्ञों और दुश्टों पर कृपा करता है।
36जैसा तुम्हारा पिता दयालु है, वैसे ही तुम भी दयालु बनो।
37किसी पर दोष मत लगाओ कि तुमपर भी दोष न लगाया जाए; किसी को दोषी मत ठहराओ कि तुम भी दोषी न ठहराए जाओ; क्षमा करो तो तुम भी क्षमा किए जाओगे।
38दो तो तुम्हें भी दिया जाएगा; वे तुम्हारी गोद में पूरा-पूरा नाप, दबा-दबाकर, हिला-हिलाकर उभरता हुआ डालेंगे। क्योंकि जिस नाप से तुम दूसरों के लिए नापते हो, उसी नाप से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा।”
39फिर उसने उनसे एक दृष्टान्त भी कहाः “क्या एक अन्धा दूसरे अन्धे को मार्ग दिखा सकता है? क्या वे दोनों ही गढ्डे में नहीं गिरेंगे?
40चेला, गुरु से बड़ा नहीं होता, परन्तु पूर्णतः प्रशिक्षित होने पर प्रत्येक चेला गुरु के समान बन जाता है।
41तू अपने भाई की आंख के तिनके को क्यों देखता है? क्या तूझे अपनी आंख का लट्ठा नहीं सूझता?
42जब तू अपनी आंख के लट्ठे ही को नहीं देख पाता, तो अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘हे भाई, मुझे तेरी आंख के तिनके को निकाल लेने दे’? हे ढोंगी, पहले तू अपनी आंख का लट्ठा तो निकाल ले-तब तू अपने भाई की आंख के तिनके को निकालने के लिए ठीक देख पाएगा।
43“क्योंकि कोई भी अच्छा वृक्ष नहीं जिस पर बुरा फल लगता हो, और न कोई बुरा वृक्ष है जिस पर अच्छा फल लगता हो।
44प्रत्येक वृक्ष अपने फलों के द्वारा ही पहचाना जाता है। लोग तो कँटीली झाड़ियों से अंजीर नहीं बटोरते और न ही झड़बेरी से अंगूर।
45भला मनुष्य अपने हृदय के भले भण्डार से भली बातों को ही निकालता है, पर बुरा मनुष्य अपने हृदय के बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है; क्योंकि जिन बातों से उसका हृदय भरा होता है, उन्हीं बातों को वह मुंह पर लाता है।
46“जो मैं कहता हूँ जब तुम उसे नहीं मानते तो मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ क्यों कहते हो?
47प्रत्येक जो मेरे पास आता है और मेरी बातों को सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान हैः
48वह उस मनुष्य के समान है जिसने घर बनाने के लिए गहरा खोदकर, चट्टान पर नींव डाली, और जब बाढ़ आई और जल की धाराएं उस घर से टकराईं तो उसे हिला न सकीं क्योंकि वह पक्का बना था।
49परन्तु वह जिसने सुना तो अवश्य किन्तु उसके अनुसार नहीं चला, वह उस मनुष्य के समान है जिसने बिना नींव डाले, भूमि पर ही घर बनाया। जब जल की धाराएं उससे टकराईं तो वह घर तुरन्त गिर पड़ा और पूर्णतः नष्ट हो गया।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)