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पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 16 / 31

नीतिवचन 16

1मनुष्य अपने हृदय में युक्तियां बनाता है, परन्तु उनका सफल होना यहोवा की ओर से होता है।

2मनुष्य का सारा चाल-चलन उसकी अपनी दृष्टि में पवित्र होता है, परन्तु यहोवा मन को तौलता है।

3अपना सब काम यहोवा को सौंप दे, और तेरी योजनाएं सफल होंगी।

4यहोवा ने हर वस्तु को विशेष उद्देश्य के लिए रचा है, यहां तक कि दुष्ट को बुरे दिन के लिए।

5हर एक जिसके हृदय में घमंड है वह यहोवा के लिए घृणित है। निश्चय ही वह दण्डित हुए बिना न रहेगा।

6करुणा और सच्चाई से अधर्म का प्रायश्चित्त होता है, और यहोवा का भय मानने से मनुष्य बुराई से दूर रहता है।

7जब यहोवा मनुष्य के चाल-चलन से प्रसन्न होता है, तो वह उसके शत्रुओं को भी उसका मित्र बना देता है।

8धार्मिकता के साथ थोड़ा धन, अन्याय की बड़ी कमाई से उत्तम है।

9मनुष्य अपने हृदय में युक्तियां बनाता है, परन्तु यहोवा ही उसके पग को निश्चित करता है।

10राजा के होंठों पर दिव्य निर्णय वास करता है, न्याय चुकाने में उसके मुख से चूक नहीं होनी चाहिए।

11सच्चा तराजू और नापतौल यहोवा ही के हैं, थैली के सब बाट उसी के निश्चित किए हुए है।

12राजाओं के लिए दुष्टता करना घृणित कार्य है, क्योंकि सिंहासन धार्मिकता पर आधारित है।

13धार्मिकता के वचन राजाओं को प्रिय लगते हैं, और जो सच बोलता है उसे वे प्यार करते है।

14राजा का क्रोध मृत्यु के दूत सदृश होता है, परन्तु बुद्धिमान मनुष्य उसे ठंडा कर देगा।

15राजा के मुख की चमक में जीवन रहता है, और उसकी कृपा-दृष्टि बसन्त के बरसाती बादल के सदृश होती है।

16बुद्धि को प्राप्त करना सोने को प्राप्त करने से क्या ही उत्तम है और समझ को प्राप्त करना चांदी की प्राप्ति से कहीं बढ़कर है।

17बुराई से भागना खरे लोगों का राजमार्ग है; जो अपने चाल-चलन की चौकसी करता है, वह अपने जीवन की रक्षा करता है।

18विनाश से पहले घमंड होता है, और ठोकर खाने से पहले गर्व होता है।

19दीन लोगों के साथ नम्र होना घमंडियों के साथ लूट बांट लेने से उत्तम है।

20जो वचन पर ध्यान लगाता है, वह भलाई को प्राप्त करेगा, और धन्य है वह जो यहोवा पर भरोसा रखता है।

21बुद्धिमान हृदय वाला मनुष्य समझदार कहलाएगा, और मधुर वचन से ज्ञान बढ़ता है।

22जिसके पास समझ है, उसके लिए वह जीवन का सोता है, परन्तु मूर्ख को ताड़ना देना मूढ़ता है।

23बुद्धिमान का हृदय उसके मुंह की अगुवाई करता है और उसके होंठों पर ज्ञान बढ़ाता है।

24मधुर वचन मधु के छत्ते के समान होते है। वे प्राण के लिए मीठे और हड्डियों को चंगाई देने वाले होते है।

25ऐसा भी मार्ग है जो मनुष्य को ठीक प्रतीत होता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु होती है।

26परिश्रमी की लालसा उसके लिए परिश्रम करती है। क्योंकि भूख उसको उत्तेजित करती रहती है।

27निकम्मा मनुष्य बुराई की युक्ति निकालता है, और उसके वचन झुलसाने वाली आग के सदृश होते है।

28कुटिल मनुष्य झगड़े को फैलाता है, और निन्दक घनिष्ठ मित्रों में फूट डाल देता है।

29हिंसक मनुष्य अपने पड़ोसी को फुसला लेता है, और उसे कुमार्ग पर ले जाता है।

30जो अांख से संकेत करता है वह कुटिल बातों की युक्ति निकालता है। जो अपने होंठ चबाता है, वह बुराई को उत्पन्न करता है।

31सिर के पके बाल महिमा का मुकुट है। यह धार्मिकता की राह में चलने वालों को प्राप्त होता है।

32विलम्ब से क्रोध करने वाला तो वीर योद्धा से, और अपनी आत्मा को वश में करने वाला नगर के जीतने वाले से भी उत्तम है।

33निर्णय के लिए चिट्ठियां तो डाली जाती हैं, परन्तु उसका परिणाम यहोवा की ओर से होता है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)