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पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 18 / 31

नीतिवचन 18

1जो अपने आपको दूसरे से अलग करता है, वह अपनी ही लालसा पूरी करना चाहता है। वह सब प्रकार की खरी बुद्धि से बैर करता है।

2मूर्ख तो समझदारी की बातों से नहीं, पर अपने ही मन की बात प्रकट करने से आनन्दित होता है।

3जब दुष्ट मनुष्य आता है, तो अपमान भी आता है, और निरादर के साथ निन्दा आती है।

4मनुष्य के मुख के वचन गहरे जल हैं, और बुद्धि का सोता उमड़ने वाले झरने के समान है।

5दुष्ट का पक्ष लेना, और धर्मी जन को न्याय से वंचित रखना अच्छा नही।

6मूर्ख के होंठ झगड़ा उत्पन्न करते हैं, और उसके मुंह की बातें घूँसे खाने के लिए निमंत्रण देती है।

7मूर्ख की बातें उसके विनाश का कारण होती हैं, और उसके होंठ उसके प्राण के लिए फंदा है।

8कानाफूसी करने वाले की बातें स्वादिष्ट भोजन के सदृश होती हैं, और वे देह के भीतरी अंगों में समा जाती है।

9जो अपने काम में आलसी होता है, वह काम बिगाड़ने वाले का भाई होता है।

10यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है। धर्मी जन उसमें भागकर सुरक्षित रहता है।

11धनवान का धन उसके लिए दृढ़ नगर है, और उसके अपने विचार में, वह ऊंची दीवार के सदृश है।

12विनाश से पहले मनुष्य का हृदय घमंडी हो जाता है, परन्तु सम्मान से पहले नम्रता पाई जाती है।

13जो बिना बात सुने उत्तर देता है, उसके लिए यह मूर्खता और लज्जा की बात है।

14मनुष्य की आत्मा बीमारी को तो सहन कर सकती है, परन्तु जब हृदय टूट जाता है, तो कौन सहन कर सकता है?

15समझदार मनुष्य का हृदय ज्ञान प्राप्त करता है, और बुद्धिमान के कान ज्ञान की खोज में लगे रहते है।

16भेंट की वस्तु मनुष्य के लिए अवसर प्रदान करती है, और उसे महापुरुषों के सामने पहुंचाती है।

17जो मनुष्य मुकद्दमें में पहले बोलता है वह तब तक सच्चा प्रतीत होता है, जब तक कि दूसरा आकर उसकी जांच न करे।

18चिट्ठी डालकर निर्णय करने से झगड़े बन्द होते हैं, और इससे सबल विरोधियों का आपस में निर्णय होता है।

19रूठे हुए भाई को मनाना दृढ़ नगर पर जय प्राप्त करने से अधिक कठिन हैं, और झगड़े गढ़ के बेंड़ों के सदृश होते है।

20मनुष्य का पेट उसकी बातों के फल से भरता है, और वह अपने होंठों के फल से संतुष्ट होता है।

21जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं- जो उससे प्रेम रखते हैं वे उसका फल पाएंगे।

22जो पत्नी पाता है, वह उत्तम वस्तु पाता है, और यहोवा से अनुग्रह प्राप्त करता है।

23निर्धन मनुष्य तो गिड़गिड़ाकर बोलता है, पर धनी रूखेपन से उत्तर देता है।

24जिस मनुष्य के कई मित्र होते हैं, उसका तो विनाश हो सकता है, परन्तु एक ऐसा भी मित्र है जो भाई से भी बढ़कर साथ देता है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)