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पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 31 / 150

भजन संहिता 31

1हे यहोवा, मैं तेरी ही शरण में आया हूं: मुझे कभी लज्जित न होने दे। तू अपनी धार्मिकता के कारण मुझे छुड़ा ले।

2अपना कान मेरी ओर लगाः तुरन्त मुझे छुड़ा ले। तू मेरे लिए सामर्थ्य की चट्टान अर्थात् मुझे बचाने के लिए दृढ़ गढ़ बन।

3तू ही मेरा चट्टान और गढ़ है- इसलिए अपने नाम के लिए तू मेरी अगुवाई और मेरा मार्ग-दर्शन कर।

4तू मुझे उस जाल में से निकाल जिसे उन्होंने मेरे लिए चुपके से बिछाया है, क्योंकि तू मेरा बल है।

5मैं अपनी आत्मा तेरे हाथ में सौंपता हूं, हे यहोवा, हे सत्य के परमेश्वर, तूने ही मुझे मोल लेकर छुड़ाया है।

6मैं उनसे घृणा करता हूं जो व्यर्थ वस्तुओं पर मन लगाते हैं, परन्तु मेरा भरोसा यहोवा ही पर है।

7मैं तेरी करुणा से मग्न और आनन्दित रहूँगा, क्योंकि तूने मेरे दुख पर दृष्टि की है, तूने मेरे प्राण के संकटों को जाना है,

8और तूने मुझे शत्रु के हाथ में पड़ने नहीं दिया, पर मेरे पैरों को चौड़े स्थान में खड़ा किया है।

9हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं संकट में पड़ा हूं: मेरी आंखें, वरन् मेरा प्राण और शरीर भी, शोक से घुले जाते है।

10मेरा जीवन दुख में और मेरी आयु कराहते-कराहते बीत गई। मेरे अधर्म के कारण मेरा बल जाता रहा और मेरी हड्डियां घुल गई है।

11अपने सब विरोधियों के कारण मैं विशेषकर पड़ोसियों में निन्दित हो गया हू। अपने परिचितों में भय का कारण बन गया हू। मुझको सड़क पर देखने वाले मुझसे दूर भाग जाते है।

12मृतक के समान मैं लोगों के मन से भुला दिया गया हूं, मैं टूटे बर्तन के समान हू।

13क्योंकि मैंने तो बहुतों से अपनी निन्दा सुनी है; चारो ओर आंतक ही आंतक है; जबकि उन्होंने मेरे विरुद्ध आपस में सम्मति की तो मेरे प्राण लेने की युक्ति की।

14परन्तु हे यहोवा, मैं तुझी पर भरोसा रखता हूं: मैं कहता हूं, “तू मेरा परमेश्वर है।”

15मेरी आयु तेरे हाथ में है, मेरे शत्रुओं और मेरे सताने वालों के हाथ से मुझे छुड़ा ले।

16अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका, अपनी करुणा से मेरा उद्धार कर।

17हे यहोवा, मुझे लज्जित न होने दे क्योंकि मैं तुझे पुकारता हूं; दुष्ट लज्जित हों और वे अधोलोक में चुपचाप पड़े रहे।

18झूठ बोलने वाले वे होंठ मूक हो जाएं जो धर्मी के विरुद्ध अहंकार और अपमानपूर्वक धृष्टता से बोलते है।

19तेरी भलाई कितनी महान् है, जो तूने अपने भय मानने वालों के लिए संचित कर रखी है, और मनुष्यों के सामने उन पर की है जो तेरी शरण में आते है।

20तू उन्हें मनुष्यों के षड्यंत्रें से बचाकर अपनी उपस्थिति के गुप्त स्थान में छिपाए रखता है; तू उन्हें अपने शरण-स्थान में रखकर झगड़ालू जीभ से बचाता है।

21धन्य हो यहोवा, क्योंकि उसने सेना से घिरे हुए नगर में भी मुझ पर अपनी करुणा अद्भुत रीति से प्रकट की है।

22मैंने तो घबराहट में कहा था, “मैं तेरी दृष्टि से दूर कर दिया गया हू।” फिर भी जब मैंने तुझे पुकारा तो तूने मेरी दुहाई सुन ली।

23हे यहोवा के सब भक्तो, उससे प्रेम करो! यहोवा सच्चे मनुष्यों की तो रक्षा करता है, परन्तु अहंकारी को पूरा-पूरा बदला देता है।

24हे यहोवा पर आशा रखने वालो, तुम सब हियाव बांधो और तुम्हारे हृदय दृढ़ रहे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)