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नया नियम · रोमियों · अध्याय 1 / 16

रोमियों 1

1पौलुस की ओर से, जो मसीह यीशु का दास है, और प्रेरित होने के लिए बुलाया गया, और परमेश्वर के उस सुसमाचार के लिए पृथक किया गया है,

2जिसकी प्रतिज्ञा उसने पहले ही से अपने नबियों द्वारा पवित्रशास्त्र में,

3अपने पुत्र के विजय में की, जो शरीर के अनुसार दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ।

4पवित्रता के आत्मा के अनुसार मृतकों में से जीवित हो उठने के द्वारा सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र घोजित हुआ, अर्थात् यीशु मसीह हमारा प्रभु,

5जिसके द्वारा हमें अनुग्रह और प्रेरिताई मिली, कि उसके नाम के लिए सब गैरयहूदियों में विश्वास से आज्ञाकारिता उत्पन्न करें,

6जिनमें तुम भी यीशु मसीह के बुलाए हुओं में से हो;

7उन सबको जो रोम में परमेश्वर के प्रिय हैं और पवित्र होने के लिए बुलाए गए हैं: हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह में तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिले।

8पहले तो मैं तुम सबके लिए मसीह यीशु के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि तुम्हारे विश्वास की चर्चा समस्त संसार में हो रही है।

9क्योंकि परमेश्वर, जिसकी सेवा मैं अपनी आत्मा में उसके पुत्र के सुसमाचार-प्रचार में करता हूँ, मेरा साक्षी है कि मैं तुम्हें किस प्रकार निरन्तर स्मरण करता हूँ,

10तथा सदैव अपनी प्रार्थनाओं में विनती करता हूँ, कि कम से कम अब मैं परमेश्वर की इच्छा से तुम्हारे पास आने में सफल हो जाऊ।

11क्योंकि मैं तुमसे मिलने की लालसा करता हूँ, जिससे कि तुम्हें कुछ आत्मिक वरदान दे सकूँ कि तुम दृढ़ हो जाओ;

12अर्थात् जब मैं तुम्हारे मध्य होऊं तो हम आपस में एक दूसरे के विश्वास से प्रोत्साहित किए जाए।

13भाइयो, मैं नहीं चाहता कि तुम इससे अनजान रहो कि मैंने बार-बार तुम्हारे पास आने की योजना बनाई-और अब तक रोका जाता रहा-जिससे कि मुझे तुम्हारे बीच में भी कुछ फल मिले, जैसा कि शेज गैर-यहूदियों के बीच मिला।

14मैं यूनानियों और बर्बरों, बुद्धिमानों और निर्बुद्धियों, दोनों का ट्ठणी हूँ।

15इसलिए, जहां तक मेरा सम्बन्ध है, मैं तुम्हें भी जो रोम में हो सुसमाचार सुनाने के लिए उत्सुक हूँ।

16मैं सुसमाचार से लज्जित नहीं होता, क्योंकि यह प्रत्येक विश्वास करने वाले-पहले यहूदी और फिर यूनानी-के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर का सामर्थ्य है।

17क्योंकि इसमें परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास से और विश्वास के लिए प्रकट होती है; जैसा कि लिखा है, “परन्तु धर्मी मनुष्य विश्वास से जीवित रहेगा।”

19परमेश्वर से सम्बन्धित ज्ञान मनुष्यों पर प्रकट है, क्योंकि परमेश्वर ने इसे उन पर प्रकट किया है। इसलिए परमेश्वर का प्रकोप मनुष्यों की समस्त अभक्ति और अधार्मिकता पर स्वर्ग से प्रकट हो रहा है, क्योंकि वे सत्य को अधर्म से दबाए रखते है।

20क्योंकि जगत की सृष्टि से ही परमेश्वर के अदृशय गुण, अनन्त सामर्थ्य और परमेश्वरत्व उसकी रचना के द्वारा समझे जाकर स्पष्ट दिखाई देते हैं, इसलिए उनके पास कोई बहाना नही।

21क्योंकि, यघपि वे परमेश्वर को जानते थे, फिर भी उन्होंने उसे न तो परमेश्वर के उपयुक्त सम्मान, और न ही धन्यवाद दिया; वरन् वे अनर्थ कल्पनाएं करने लगे, और उनका निर्बुद्धि मन अन्धकारमय हो गया।

22बुद्धिमान होने का दावा करके वे मूर्ख बन गए,

23उन्होंने अविनाशी परमेश्वर की महिमा को नशवर मनुष्य, पक्षियों, चौपायों और रेंगनेवाले जन्तुओं की मूर्ति की समानता में बदल डाला।

24इसलिए परमेश्वर ने उन्हें उनके मन की वासनाओं की अशुद्धता के लिए छोड़ दिया, कि उनके शरीरों का आपस में अनादर हो।

25क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की सच्चाई के बदले झूठ को अपनाया और सृष्टि की आराधना और सेवा की-न कि उस सृष्टिकर्त्ता की जो सर्वदा धन्य है, आमीन।

26इस कारण परमेश्वर ने उन्हें नीच कामनाओं के वश में छोड़ दिया; क्योंकि उनकी स्त्रियों ने स्वाभाविक संसर्ग को अस्वाभाविक संसर्ग में बदल डाला।

27इसी प्रकार पुरुष भी स्त्रियों के साथ स्वाभाविक संसर्ग छोड़ कर आपस में एक दूसरे के प्रति कामाग्नि में जलने लगे, पुरुषों ने पुरुषों के साथ अशलील कार्य करके अपने ही में अपने दोष का उचित दण्ड पाया।

28जब उन्हें परमेश्वर को स्वीकार करना और अधिक उचित न लगा, तब परमेश्वर ने भी उन्हें उनके भ्रष्ट मन के वश में छोड़ दिया, कि वे अनुचित कार्य करें,

29अतः वे सब प्रकार की अधार्मिकता, दुष्टता, लोभ, द्वेष से तथा सारी ईर्ष्या, हत्या, झगड़े, छल और डाह से भर गए। वे बकवादी,

30निन्दक, परमेश्वर से घृणा करने वाले, ढीठ, हठी, डींगमार, बुराई करनेवाले, माता-पिता की आज्ञा न माननेवाले,

31समझ-रहित, विश्वासघाती, प्रेम-रहित और दया-रहित हो गए।

32यघपि वे परमेश्वर की विधि जानते हैं कि जो इस प्रकार का आचरण करते हैं वे मृत्यु के योग्य हैं, फिर भी वे न केवल स्वयं ही यह कार्य करते हैं, परन्तु ऐसा आचरण करने वालों का हृदय से समर्थन भी करते है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)